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आपस की बात:'हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए'

राजकुमार केसवानी3 महीने पहले
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भारतीय समाज में औरत का बखान त्याग मूर्ति के रूप में ज़्यादा और अदम्य साहस और इच्छा शक्ति की प्रतीक के तौर पर ज़रा कम होता है। और जो होता भी है वह गीतों में, कविता में, तक़रीरों में ही होता है। असल जीवन में औरत को क्या समझा जाता है और किस तरह का व्यवहार होता है, इसके लिए हर रोज़ अख़बारों में छपने वाली ख़बरें काफ़ी हैं।

'मदर इंडिया' जैसी फ़िल्मों की पुण्याई यह है कि यह हमें औरत के आला ज़र्फ़ और आला किरदार की याद दिलाती है। कहानी की बुनियाद में है एक घटना जो धीरे-धीरे एक विराट रूप ले लेती है। एक विधवा मां के पास एक बेटा और थोड़ी सी खेती की ज़मीन है। बेटे की शादी के लिए ज़मीन गांव के बनिए सुखी लाला के पास गिरवी रखनी पड़ती है। लाला की चौपड़ी में लिखे अक्षर के साथ माई का अंगूठा लगा है। माई नहीं जानती कि लाला अंगूठा लगवाते वक़्त ही अंगूठा काटकर अपने पास रख लेता है। ग्रामीण भारत में ज़मीन और अंगूठा हमेशा साथ होते हैं। जिसके पास अंगूठा, ज़मीन भी उसकी। वजह कि अंगूठा लगाने वाला अक्षर नहीं जानता। पीढ़ियां गुज़र जाती हैं अपनी ज़मीन को वापस पाने लेकिन लाला के लिखे अच्छर लाला के अलावा कोई नहीं पढ़ सकता।

फ़िल्म में एक सीक्वेंस है जहां राधा (नरगिस) अपने छोटे बेटे बिरजू (मास्टर साजिद) को गांव के मास्टरजी पंडित लालता प्रसाद की कक्षा में दाख़िला दिलाने के लिए ले जाती है। बिरजू को उन्हें सौंपते हुए कहती है; '... बस पंडित जी, इतनी चौपड़ियां पढ़ा दो कि बड़ा होकर सुक्खी लाला के सारे चौपड़े पढ़ डाले।'

मास्टर : सुक्खी लाला के चौपड़े तो अंगरेज़ गोरमेंट भी नहीं पढ़ सकती।

नन्हे से बिरजू को यह मंज़ूर नहीं। वह बड़े पुरज़ोर अंदाज़ में कहता है : 'मैं पढ़ूंगा!'

इस फ़िल्म के डायलाग अद्भुत हैं। वजाहत मिर्ज़ा चंगेज़ी के साथ अली रज़ा ने आम आदमी की ज़बान में जीवन की कड़वी-कसैली सच्चाइयों को ख़ूब उजागर किया है। वह भी बिना शब्दों में कड़वाहट घोले। इसी सीक्वेंस में आगे के डॉयलाग सुनिए। नए दौर के न सही लेकिन पुराने दौर के मुझ से लोगों को बहुत कुछ याद आने लगेगा। मास्टर बिरजू से कहता है -

मास्टर : जा,जा। अपनी जगह बैठ। नहीं तो मुर्गा बना दूंगा

राधा : मेरे बिरजू को मुर्गा-वुर्गा नहीं बनाना ...

मास्टर : ना बेटी। बिना मुर्गा बने विद्या नहीं आती। कोई अढ़ाई सौ बार तो मैं मुर्गा बना हूं, तब जा के इती विद्या आई है।

सोचता हूं तो हंसी आती है। यार हम किस युग के इंसान हैं? जिस युग में पैदा हुए थे उस युग में तो भोलपन और सादगी का बोलबाला था। क्लास में मुर्गा बनकर भी हंसी ही आती थी। बेवक़ूफ़ी, कम-अक्ली नहीं सादा-दिली समझी जाती थी। तभी तो बेवक़ूफ़ बनाने वाले कम और बनने वाले ज़्यादा थे। इस सब के बावजूद बनने वाले के होंठों की हंसी और लबों के गीतों को कोई लूट नहीं पाता था।

अब तो सारी की सारी दुनिया बदल गई है। लोग स्मार्ट हो गए हैं। भाषा स्मार्ट हो गई है। फ़ोन और टीवी तक स्मार्ट हो गए हैं। सुक्खी लाला की दुकान उठ चुकी है लेकिन स्मार्ट आपरेटरों ने दुनिया मुट्ठी में कर ली है। अब इस मुट्ठी में ही जीना है और मुट्ठी में ही मरना है।

मैं भी न कहां की बात कहां ले जाता हूं। मुझे तो 'मदर इंडिया' की बात करनी है। एक फ़िल्म की जो हमारे गांव की कहानी कहती है। हमारे किसान की बात करती है। यह 63 बरस पुरानी बात हो गई। अब कौन बनाता है गांव और किसान की कहानी पर फ़िल्में। बनती भी हैं तो 'लगान' जैसी स्मार्ट कहानी पर, जिसमें क्रिकेट खेलकर किसान के सारे दल्लदर दूर हो जाते हैं।

चलिए छोड़िये भी इस नए-पुराने का रोना-गाना। आप तो इस फ़िल्म के डायलाग सुनिए और ख़ुद ही गुनिए।

गांव एक ऐसी जगह है जहां किसान पहले और सूरज बाद में घर से निकलता है। ऐसी ही एक सुबह जब किसान अपने खेत की तरफ़ और गांव की औरतें पानी भरने सिर पर पीतल की गगरी या माटी का मटका लेकर पनघट की तरफ़ जा रही हैं तब सुक्खी लाला उकड़ूं बैठा आराम से दतौन कर रहा है और अपनी मैली नज़रों से औरतों को घूर रहा है। तभी नई दुल्हन राधा (नरगिस) भी अपनी सहेली कमला के साथ वहां से गुज़रती है। लाला का छिछोरपन उबाल मारता है।

सुक्खी लाला : अरे कमला रानी ! ज़रा सम्भल के चला कर। कहीं पैर न फ़िसल जाए।

कमला : सुक्खी लाला! यह मर्द का नहीं औरत का पैर है ...

राधा : चलो भौजी ...

सुक्खी लाला : अरे लो बहू को बुरा लग गया। मैं तो गगरी को कह रहा था। मिट्टी की है। फ़ूट न जाए।

कमला : जब तक तुम ज़िंदा रहोगे, तांबे की गगरी किसके सिर पर रह सकती है?

सुक्खी लाला : अरे मैं तो चाहता हूं तुम्हारे सिरों पर पर सोने की गगरी चमके। लेकिन मेरी कोई सुनता ही नहीं। भलाई का जमाना ही नईं है।

राधा : चलो ना

आगे बढ़ते हुए कमला कहती है : है तो गांव का बनिया, पर नज़र का बड़ा मैला है।

प्रकृति के कानून की तरह ही कहानी से चाची का प्रस्थान होता है और राधा का किरदार मां बनकर उभरता है और कहानी पर छा जाता है। महबूब ख़ान की राधा महज़ श्याम की राधा भर नहीं है। उसमें सीता और सावित्री एक साथ समाहित हैं तो सदा की तरह समय आने पर दुर्गा का रूप भी है। पति और सास से विरासत में मिली भूख, ग़रीबी, लाचारी और शोषण से घिरी यह औरत अकेले ही हर मुश्किल से लड़ती है। उसका मंत्र है : 'ज़िन्दा है जो इज़्ज़त से वो इज़्ज़त से मरेगा।'

काबिले ज़िक्र बात यह है कि जिस वक़्त यह फ़िल्म बन रही थी, उस वक़्त नरगिस की उम्र बमुश्किल 27 बरस थी। 27 बरस की यह अदाकारा अपने से मात्र 5 दिन छोटे सुनील दत्त और 50 दिन छोटे राजेंद्र कुमार की मां बनी है और हर लम्हा वो मां ही दिखाई दी है।

नरगिस के संदर्भ में एक बात कहे बिना रह नहीं सकता। इस फ़िल्म से पहले तक इस अद्भुत अदाकारा की पहचान महज़ राज कपूर की हीरोइन बल्कि माशूक़ा वाली ज़्यादा थी जो एक अच्छी एक्ट्रेस भी है। 'मदर इंडिया' ने नरगिस को अभिनय के हिमालय की चोटी बना दिया। आज भी हर अभिनेत्री का क़द इसी ऊंचाई से नापा जाता है।

नन्हे साजिद की बात तो हो चुकी लेकिन सुक्खी लाला बने कन्हैयालाल की बात अभी बाकी है। यह कन्हैयालाल चतुर्वेदी जी अद्भुत प्रतिभा के धनी इंसान थे। इसी बात से अंदाज़ा लगा लें कि जब महबूब ख़ान ने अपनी पुरानी फ़िल्म 'औरत'(40) को दुबारा बनाने का फ़ैसला किया तो यह भी तय किया कि उसके रीमेक 'मदर इंडिया' में किसी कलाकार को रिपीट नहीं करेंगे। बाकी किरदारों के लिए तो कलाकार मिल गए लेकिन सुक्खी लाला के किरदार के लिए उन्हें भी कोई दूसरा कलाकार नज़र नहीं आया। लिहाज़ा कन्हैयालाल को ही दुबारा लेना पड़ा। और दूसरी बार में इस इंसान ने वह कारनामा कर दिखाया जिसकी दूसरी कोई मिसाल ढूंढने में भी वक़्त लग जाए। 'मदर इंडिया' की कहानी को विश्वसनीय बनाने में कन्हैयालाल के अभिनय का योगदान बहुत बड़ा है। सो अगली बार जो बात होगी तो उसमें उनकी भी ज़रा तफ़्सीली बात होगी।

और...

राही मासूम रज़ा की बात मेरे लिए बड़ी मायने रखती है। कोई चालीस बरस पहले उन्होंने अपने एक आलेख में महबूब ख़ान और 'मदर इंडिया' की बात करते हुए एक बात लिखी थी जो वाकई क़ाबिल-ए-ग़ौर है।

'उनकी (महबूब ख़ान की) 'औरत' या 'मदर इंडिया' में समाजी ना-इंसाफ़ी के ख़िलाफ़ एक झल्लाहट ज़रूर है लेकिन यह कहना दुश्वार है कि इन फ़िल्मों में उनकी समाजी और सियासी शऊर की कारफ़र्माई है। महबूब साहब फ़िल्मों के जोश मलीहाबादी हैं, जिनके अंदाज़-ए-बयां में बड़ी ताकत है, लेकिन हर ताकत शऊर की देन नहीं, बल्कि समाजी ना-इंसाफ़ी पर एक शरीफ़ आदमी की झल्लाहट का नतीजा है।'

राही इस झल्लाहट को महत्वपूर्ण तो मानते हैं लेकिन मंज़िल नहीं। और हां फिर इसी सिरे को आगे ले जाकर वो एक हसीन बात और कह जाते हैं।

'महबूब ख़ान मरहूम की यह झल्लाई हुई रिवायत काफ़ी दिनों के सन्नाटे के बाद अब सलीम जावेद की लिखी हुई फ़िल्मों में नज़र आने लगी है।'

यह इशारा है 'मदर इंडिया' के बिरजू के सलीम जावेद की फ़िल्मों में नज़र आने वाले बहु-प्रचारित 'एंग्री यंग मैन' वाले अवतार की तरफ़। बात सच्ची है और अच्छी भी। हमारे दौर के मायानाज़ शायर दुष्यंत कुमार त्यागी भी कह गए हैं :

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही

हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए

जय-जय

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