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अंतरिक्ष में भारत:मील का पत्थर साबित होंगे ये 6 मिशन

एल. एम. गंगराड़े19 दिन पहले
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कोविड 19 की वजह से कई विकास कार्यक्रम एक साल पिछड़ गए हैं। इसमें भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम भी अपवाद नहीं है। इस वजह से 2020 में कोई उल्लेखनीय मिशन लॉन्च नहीं किया जा सका। लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है कि भारतीय अंतरिक्ष वैज्ञानिक हाथ पर हाथ धरे बैठे हुए थे। वे प्रयोगशालाओं में विकास-अनुसंधान के कार्यों में जुटे रहे। अब जबकि कोविड की वजह से छाया अंधेरा छंटने लगा है, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) अपने महत्वाकांक्षी मिशनों को लॉन्च करने की तैयारी में जुट गया है। साल 2021 और आने वाले सालों में इसरो के प्रस्तावित मिशनों से भारत अंतरिक्ष में नई छलांग लगाने को लालायित हो उठा है। इसरो ऐसे तो छोटे-बड़े अनेक मिशनों पर काम कर रहा है, लेकिन उनमें से ये 6 मील का पत्थर साबित होंगे:

1. गगनयान मिशन :

गगनयान की पहली उड़ान दिसंबर 2020 में और दूसरी उड़ान जुलाई 2021 में प्रस्तावित थी। लेकिन कोविड के कारण ये उड़ानें स्थगित करनी पड़ीं। अब पहली उड़ान 2021 में और दूसरी उड़ान 2022 में होंगी। इन उड़ानों में इसरो द्वारा विकसित ह्यमोनाइड रोबोट ‘व्योममित्र’ को भेजा जाएगा। इन दोनों मानवरहित उड़ानों का लक्ष्य पृथ्वी की समीप की कक्षा में दो या तीन व्योमनॉट (अंतरिक्ष यात्रियों) को भेजकर उन्हें सुरक्षित पृथ्वी पर वापस लाने की तकनीक का प्रदर्शन करना होगा। गौरतलब है कि गगनयान भारत का पहला मानव अंतरिक्ष मिशन होगा। इन दोनों उड़ानों की सफलता पर ही यह मानव मिशन निर्भर करेगा। यह अंतरिक्ष मिशन 2022 में होने की संभावना है। इसके लिए भारतीय वायुसेना के चार पायलटों का चयन किया गया है जिनकी ट्रेनिंग रूस में चल रही है।

2. चंद्रयान-3 मिशन :

चंद्रयान-2 की सॉफ्ट लैंडिंग की असफलता के कारण चंद्रयान-3 मिशन की तैयारी शुरू की गई है। चंद्रयान-2 की लैंडिंग भले ही विफल हो गई हो, लेकिन उसके साथ भेजा गया ऑर्बिटर अभी कम से कम 6 से 7 साल तक और काम करेगा। इस कारण चंद्रयान-3 के लिए ऑर्बिटर की जरूरत नहीं होगी। उसके लैंडर और रोवर को ही संभवत: इसी साल के अंत तक चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव आईटकेन बेसिन पर उतारा जाएगा। इसकी तारीख की घोषणा का इंतजार है। चंद्रयान-3 के लैंडर और रोवर जहां उतरेंगे, वहां खासकर उसकी सतह पर बर्फ या पानी काफ़ी मात्रा में मिलने की उम्मीद है। इसका पता रोवर में लगे उपकरणों से लगाया जाएगा। इस खोज से भविष्य में चांद पर मानव को बसाने की संभावना बढ़ जाएगी। गौरतलब है कि साल 2008 में लॉन्च किए गए प्रथम चंद्रयान मिशन ने चांद पर पानी की संभावना की उम्मीद जताई थी।

3. मिशन वीनस :

इसके तहत शुक्र ग्रह की कक्षा में शुक्रयान-1 उपग्रह भेजा जाएगा जो वहां चार साल तक कार्य करेगा और शुक्र ग्रह की जानकारी एकत्र करेगा। इसके लिए यंत्रों के विकास पर कार्य करना शुरू कर दिया गया है। इस योजना में रूस, फ्रांस, स्वीडन और जर्मनी भी भाग लेंगे। शुक्रयान-1 के जून 2023 तक लॉन्च करने की योजना है। लेकिन यदि उसे उस समय लॉन्च नहीं किया जा सका तो फिर शुक्र के पृथ्वी के नजदीक होने का समय 19 महीने बाद आएगा। यानी फिर लॉन्चिंग साल 2025 तक टल जाएगी।

4. आदित्य एल-1 :

सूरज का अध्ययन करने के लिए यह इसरो का पहला मिशन होगा। पहले इसकी उड़ान साल 2020 में प्रस्तावित थी, लेकिन अब 2022 तक इसे लॉन्च किए जाने की योजना है। यह वैज्ञानिक दृष्टि से एक अनोखा प्रयोग होगा। इसके तहत 400 किलोग्राम भार का एक उपग्रह ‘लैगरैंज पॉइंट 1’ (L1) पर स्थापित किया जाएगा, जिसकी दूरी पृथ्वी से करीब 15 लाख किलोमीटर है। वहां से उस उपग्रह पर लगे उपकरण ग्रहण की अवस्था के दौरान भी बगैर बाधा के लगातार सूर्य का परीक्षण कर सकेंगे।

5. एस.एस.एल.वी. का विकास :

छोटे व कम भार के उपग्रहों को प्रक्षेपित करने के लिए एसएसएलवी (स्माल सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल) के विकास का काम भी चल रहा है। इस रॉकेट से 500 किलो तक भार के उपग्रह पृथ्वी की पास की कक्षा में और 300 किलो तक भार के उपग्रह सन सिंक्रोनस कक्षा में छोड़े जा सकेंगे। इसकी पहली डेवलपमेंटल उड़ान मार्च 2021 तक होने की उम्मीद है। इसके लिए अलग से लॉन्चपैड निर्मित करने की तैयारी है। भविष्य में तूतीकोरिन जिले के कुलसेकरापतनम में बन रहा नया स्पेसपोर्ट उपग्रहों की लॉन्चिंग के लिए उपयोग में आएगा। उपग्रहों के प्रक्षेपण के लिए बनाई गई प्राइवेट कंपनी ‘न्यू स्पेस इंडिया लिमिटेड’ एसएसएलवी के उत्पादन और लॉन्चिंग का काम करेगी।

6. फिर से इस्तेमाल होने वाले रॉकेट :

आर.एल.वी. यानी रियूजेबल लॉन्च व्हीकल वह रॉकेट होगा जो उपग्रहों को पृथ्वी की कक्षा में भेजकर वापस आ जाएगा और उसका फिर से दूसरे उपग्रहों को प्रक्षेपित करने में उपयोग किया जा सकेगा। इसके एक प्रोटोटाइप मॉडल, दो स्टेज वाले रॉकेट और एयरोप्लेन टाइप वाले मॉडल का एक परीक्षण साल 2016 में किया जा चुका है। अब इसी साल यानी 2021 में एयरोप्लेन टाइप मॉडल के दूसरे स्टेज का परीक्षण लैंडिंग गियर के साथ चित्रदुर्ग के चालकेरे रन-वे पर हेलीकॉप्टर से चार किमी की ऊंचाई से ड्राप करके किया जाएगा। इसके बाद रेक्स (REX) यानी पृथ्वी की कक्षा से सुरक्षित वापस लाने (री एंट्री) का परीक्षण किया जाएगा। साथ ही उसके स्क्रैमजेट प्रोपल्शन इंजन के परीक्षण की योजना पर भी जल्दी ही काम शुरू होगा।

रूटीन का काम प्राइवेट प्लेयर्स के जिम्मे :

इसरो रूटीन के कामों से मुक्त हो सके और अंतरिक्ष संबंधी भविष्य के अनुसंधान व विकास कार्यों पर ही एकाग्रता से ध्यान दे सके, इस उद्देश्य से इन-स्पेस (इंडियन नेशनल स्पेस प्रमोशन एंड अथॉराइजेशन सेंटर) नाम से एक संगठन गठित किया गया है। इस साल जल्दी ही इसके अध्यक्ष के साथ अंतरिक्ष, सुरक्षा, कानून व सामरिक मामलों के विशेषज्ञों की नियुक्ति किए जाने की उम्मीद है। पीएमओ और विदेश विभाग के अफसर भी इस संगठन के सदस्य होंगे। इस बदलाव से रूटीन का काम यानी छोटे-मोटे उपग्रहों की लॉन्चिंग प्राइवेट प्लेयर्स करेंगे। इस संगठन के जरिए प्राइवेट इंडस्ट्रीज को इसरो के बुनियादी ढांचे और सेवाओं के उपयोग की अनुमति मिलेगी।

(लेखक इसरो में वरिष्ठ वैज्ञानिक रहे हैं। ग्रुप डायरेक्टर (इसरो उपग्रह केंद्र) के पद से रिटायर हुए हैं।)

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