रसरंग में मायथोलॉजी:जन्म एवं मृत्यु के चक्र से ऊपर होते हैं नैसर्गिक तरीके से पैदा न होने वाले

देवदत्त पटनायकएक महीने पहले
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कर्नाटक के हम्पी स्थित करीब 1500 साल पुराना ससिवेकालु गणेश मंदिर। - Dainik Bhaskar
कर्नाटक के हम्पी स्थित करीब 1500 साल पुराना ससिवेकालु गणेश मंदिर।

बौद्ध और हिंदू पुराणशास्त्र के अनुसार स्त्री के शरीर से जन्म लेने वाला व्यक्ति जीवन और मृत्यु के चक्र अर्थात संसार का भाग बन जाता है। इस प्रकार गर्भ से जन्मा व्यक्ति अर्थात योनिज जन्म और मृत्यु दोनों का अनुभव करता है। राम ने कौशल्या के गर्भ से तो कृष्ण ने देवकी के गर्भ से जन्म लिया था और इसलिए दोनों को मृत्यु का अनुभव करना पड़ा।

पौराणिक साहित्य में हम अयोनिज की धारणा से परिचित हैं। अयोनिज यानी वह जिसने गर्भ से बाहर जन्म लिया है और फलस्वरूप जन्म एवं मृत्यु के चक्र से ऊपर उठने में सक्षम बना है। गणेश इसका प्रमुख उदाहरण हैं, क्योंकि उनका जन्म उनकी माता पार्वती के गर्भ से नहीं हुआ था। गणेश के जन्म की कहानी बड़ी रोचक है। एक दिन जब शिव बाहर गए थे, तब पार्वती को अकेलापन महसूस हुआ। इसलिए उन्होंने अपने शरीर पर लगे चंदन को इकट्ठा कर उससे गणेश को ढाला, ताकि उन्हें किसी की संगत मिल सकें। फिर जब पार्वती अंदर नहाने गईं तब उन्होंने गणेश को बाहर पहरा देने के लिए कहा। जब शिव बाहर से लौटे तब गणेश ने उन्हें अपने ही घर में प्रवेश करने से रोक दिया। इस पर क्रोध में आकर शिव ने गणेश का सिर काट दिया। यह देखकर पार्वती विलाप करने लगीं। तब उनके कहने पर शिव ने गणेश के सिर की जगह हाथी का सिर बिठाकर उन्हें पुनर्जीवित कर दिया।

इसी तरह शिव के दूसरे पुत्र कार्तिकेय का जन्म भी मां के शरीर से बाहर हुआ था। शिव, जो क्षणभर के लिए विचलित हुए थे, ने अपने शुक्र की एक बूंद को आग में गिरने दिया। लेकिन वह बूंद इतनी तीक्ष्ण थी कि उसने अग्निदेव को भी जला दिया। अग्निदेव ने वायुदेव से विनती की कि वे उस बूंद को पकड़ लें। लेकिन वायुदेव भी बूंद को शांत नहीं कर सकें। इसलिए वायु ने उसे गंगा नदी में गिरा दिया। नदी उबलने लगी और नदी के किनारे के ईखों में आग लग गई। आग बुझ जाने पर ईखों की राख से छह बालक निकले। फिर पार्वती ने आकर उन बालकों को संभाला। जब पार्वती ने छह बालकों को गले लगाया, तब वे एक बालक के रूप में रूपान्तरित हो गए। यही कार्तिकेय कहलाए।

पुराणशास्त्र में कुछ अन्य पात्र भी अयोनिज हैं। इक्ष्वाकु वंश के राजा और राम के पूर्वज मांधाता की कहानी प्रसिद्ध है। युवनाश्व नामक एक राजा ने ग़लती से अपनी पत्नी को गर्भवती करने वाली जादुई औषधि पी ली, जिससे वे स्वयं गर्भवत बन गए। युवनाश्व के शरीर में गर्भ या योनिमार्ग नहीं था, जिस कारण उनके बच्चे मांधाता को उनके शरीर के बाज़ू से जन्म लेना पड़ा। इस प्रकार चूंकि मांधाता का जन्म एक विशेष तरीक़े से हुआ था, वह एक विशेष राजा बने।

उत्तरकालीन बौद्ध कथाओं में सुझाया गया है कि बुद्ध का जन्म भी नैसर्गिक तरीक़े से नहीं हुआ था। उनका जन्म भी उनकी मां की बाज़ू से हुआ था। इस प्रकार के जन्म का विचार यूरोप तक फैला, जहां प्रारंभिक ईसाई चर्च के पादरियों के अनुसार ईसा का जन्म भी गर्भ से नहीं हुआ था। इस प्रकार स्त्री का शरीर मृत्यु और पुनर्जन्म के चक्र से जोड़ा जाने लगा। महाभारत में मृत्यु को तो स्त्री के रूप में भी कल्पित किया गया है। लेकिन मृत्यु के देवता यम जो पुनर्जन्म को नियंत्रित करते हैं, पुरुष हैं।

हालांकि पुराणशास्त्र में अयोनिज की धारणा महत्वपूर्ण है, स्वयंभू की धारणा भी लोकप्रिय है - वह व्यक्ति जो स्व-निर्मित है। मृत्यु पाने वाले सभी जीवित प्राणियों का जन्म एक स्त्री के शरीर से होता है। लेकिन दिव्य व्यक्ति स्वयंभू है, जो किसी स्त्री से जन्म नहीं लेता है और इस प्रकार, जिसका कोई स्रोत नहीं है; वह स्व-निर्मित है।

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