पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

Install App

Ads से है परेशान? बिना Ads खबरों के लिए इनस्टॉल करें दैनिक भास्कर ऐप

‌भास्कर 360:विरोध पर भी राजद्रोह! हमेशा से विवादित रहा है अंग्रेजों के जमाने का यह कानून

भास्कर रिसर्च8 दिन पहले
  • कॉपी लिंक
2012 में कुडनकुलम परमाणु संयंत्र का विरोध कर रहे 9000 लोगों पर भी राजद्रोह का मामला लगा था। - Dainik Bhaskar
2012 में कुडनकुलम परमाणु संयंत्र का विरोध कर रहे 9000 लोगों पर भी राजद्रोह का मामला लगा था।

कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों के आंदोलन के बीच आईपीसी की धारा-124 (ए) यानी राजद्रोह कानून एक बार फिर से चर्चा में है। बीते मंगलवार को ही दिल्ली की एक अदालत ने किसान आंदोलन के दौरान सोशल मीडिया पर फेक वीडियो पोस्ट कर अफवाह फैलाने और राजद्रोह के मामले के दो आरोपियों को जमानत दी है। साथ ही कोर्ट ने इस कानून पर टिप्पणी करते हुए कहा है कि उपद्रवियों का मुंह बंद कराने के बहाने असंतुष्टों को खामोश करने के लिए राजद्रोह का कानून नहीं लगाया जा सकता। हालांकि ऐसा पहली बार नहीं है जब कोर्ट ने इस कानून के दुरुपयोग को लेकर कोई टिप्पणी की हो। सुप्रीम कोर्ट और विधि आयोग भी इसके दुरुपयोग को लेकर टिप्पणी कर चुके हैं। दरअसल 150 साल पहले 1870 में जब से यह कानून प्रभाव में आया है तभी से इसके दुरुपयोग के आरोप लगने शुरू हो गए थे। अंग्रेजों ने उनके खिलाफ उठने वाली आवाजों को दबाने के लिए इस कानून का उपयोग किया। इस धारा में सबसे ताजा प्रकरण किसान आंदोलन टूल किट मामले से जुड़ी पर्यावरण कार्यकर्ता दिशा रवि पर दर्ज हुआ है। आजादी के बाद केंद्र और राज्य की सरकारों पर भी इसका दुरुपयोग करने के आरोप लगते रहे हैं। कहा जा रहा है कि केंद्र में भाजपा की सरकार आने के बाद से राजद्रोह के मामले बढ़ गए हैं। हालांकि इसके पहले की सरकारों में भी विरोध पर राजद्रोह के मामले चर्चित रहे हैं। साल 2012 में तमिलनाडु के कुडनकुलम में परमाणु संयंत्र का विरोध करने पर 9000 लोगों पर एक साथ राजद्रोह की धारा लगाई गई। इसी तरह 2017 में झारखंड में पत्थलगड़ी आंदोलन से जुड़े करीब 10 हजार आदिवासियों पर राजद्रोह का मामला लगाया गया था। 2019 में ये मामले वापस ले लिए गए। पत्थलगड़ी आदिवासियों ने ग्रामसभाओं के सबसे शक्तिशाली होने की बात कही थी। खास बात यह है कि हमारे देश में ब्रिटिश दौर का यह कानून जारी है पर ब्रिटेन ने 2009 में इसे अपने देश से खत्म कर दिया है।

ऐसे समझिए राजद्रोह कानून के बनने, इसके इस्तेमाल और विरोध के सफर को

क्या है राजद्रोह : कोई भी व्यक्ति देश विरोधी सामग्री लिखता, बोलता है या ऐसी सामग्री का समर्थन करता है, या राष्ट्रीय चिन्हों का अपमान करने के साथ संविधान को नीचा दिखाने की कोशिश करता है, तो उसे आजीवन कारावास या तीन साल की सजा हो सकती है ( आईपीसी 124-ए)।

सर्वाधिक मामले वाले 5 राज्यों में 3 भाजपा के : बीते 10 वर्ष में राजद्रोह के सर्वाधिक मामले जिन पांच राज्यों में दर्ज हुए, उनमें बिहार, झारखंड और कर्नाटक में अधिकांश समय भाजपा या भाजपा समर्थित सरकार रही। इन राज्यों में 2010 से 2014 की तुलना में 2014 से 2020 के बीच हर वर्ष 28% की बढ़ोतरी दर्ज की गई।

अंग्रेजों ने दुरुपयोग किया, सरकारों पर भी लगे आरोप : 1891 राजद्रोह के तहत पहला मामला दर्ज किया गया। बंगोबासी नामक समाचार पत्र के संपादक के खिलाफ ‘एज ऑफ कंसेंट बिल’ की आलोचना करते हुए एक लेख प्रकाशित करने पर मामला दर्ज हुआ।

- 1947 के बाद आरएसएस की पत्रिका ऑर्गेनाइजर में आपत्तिजनक सामग्री के खिलाफ मामला दर्ज किया गया था। सरकार की आलोचना पर क्रॉस रोड्स नामक पत्रिका पर भी केस दर्ज हुआ था। सरकार विरोधी आवाजों और वामपंथियों के खिलाफ भी इसका इस्तेमाल होता रहा।

- 2012 इस कानून के तहत सबसे बड़ी गिरफ्तारी हुई। तब केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी। तमिलनाडु के कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा संयंत्र का विरोध कर रहे लोगों में से 9000 के खिलाफ धारा लगाई गई।

कानून कैसे बना, कितना बदला, अब आगे क्या?

> कब से शुरू हुआ, किसने बनाया- ब्रिटिश काल में वर्ष 1860 में आईपीसी लागू हुई। इसमें 1870 में विद्वेष भड़काने की 124ए धारा जोड़ी गई। थॉमस बबिंगटन मैकाले ने इसका पहला ड्राफ्ट तैयार किया था। मैकाले ने ही भारत की शिक्षा नीति तैयार की थी।

> क्यों बनाया- 1870 के दशक में अंग्रेजी हुकूमत के लिए चुनौती बने वहाबी आंदोलन को रोकने के लिए बनाया गया था।

> पहली बार राजद्रोह कब जुड़ा- बालगंगाधर तिलक पर 1897 में इसके तहत मुकदमा दर्ज हुआ। इसके मामले में ट्रॉयल के बाद सन 1898 में संशोधन से धारा 124-ए को राजद्रोह के अपराध की संज्ञा दी गई।

> आजादी के बाद क्या हुआ- आजादी के बाद भी यह आईपीसी में बना रहा। हालांकि इसमें से 1948 में ब्रिटिश बर्मा (म्यांमार) और 1950 में ‘महारानी’ और ब्रिटिश राज’ शब्दों को हटा दिया गया।

> सजा में क्या बदलाव हुआ- 1955 में कालापानी की सजा हटाकर आजीवन कारावास का प्रावधान किया गया।

> विरोध का क्या हुआ-1958 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इसे असंवैधानिक करार दिया। पर 1962 में सुप्रीम कोर्ट ने वैध ठहराते हुए इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए युक्तिसंगत शर्तें लगा दीं। 2018 में विधि आयोग ने भी इसका दुरुपयोग रोकने के लिए अनेक प्रतिबन्ध लगाने की अनुशंसा की। सुप्रीम कोर्ट के फैसले और विधि आयोग की अनुशंसा लागू करने के लिए संसद के माध्यम से कानून में बदलाव करना होगा।

खबरें और भी हैं...

    आज का राशिफल

    मेष
    Rashi - मेष|Aries - Dainik Bhaskar
    मेष|Aries

    पॉजिटिव- आज जीवन में कोई अप्रत्याशित बदलाव आएगा। उसे स्वीकारना आपके लिए भाग्योदय दायक रहेगा। परिवार से संबंधित किसी महत्वपूर्ण मुद्दे पर विचार विमर्श में आपकी सलाह को विशेष सहमति दी जाएगी। नेगेटिव-...

    और पढ़ें