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रसरंग में मायथोलॉजी:दो हजार साल पुरानी तुलुव संस्कृति का शिव और शक्ति से नाता

देवदत्त पटनायक4 दिन पहले
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यक्षगान तुलुव संस्कृति का मुख� - Dainik Bhaskar
यक्षगान तुलुव संस्कृति का मुख�

पिछले 2,000 सालों या शायद उससे भी पहले से तुलुव लोग तुलु-नाडु में अलवा खेड़ा के तटीय राज्य में रहते आए हैं। किसी काल में औप राजा इस क्षेत्र पर शासन करते थे। हमें प्राचीन रोमिय नाविकों के विवरणों में भी इन लोगों का उल्लेख मिला है। इस राज्य के प्रतीक के तौर पर जुड़वां मछलियां हैं। यह प्रतीक पांड्य राजाओं के प्राचीन मछली के प्रतीक से बहुत मिलता-जुलता है। यह क्षेत्र गोवा के दक्षिण से दक्षिणी कर्नाटक से होते हुए उत्तरी केरल तक फैला हुआ है। यह पहाड़ी और जंगली क्षेत्र चावल, नारियल, सुपारी और जंगली सूअर व बाघों के लिए मशहूर है। मोगावीरा, बिल्लव और बंट समुदाय यहीं से आते हैं। तुलुव भूमि नृत्य के यक्षगान रूप, कोटि और चेन्नया की किंवदंती, नगरधने नामक नागों की पूजा और भूत-कोलं के लिए मशहूर है। भूत-कोलं इस भूमि के ‘भूत’ नामक शरारती स्थानीय देवताओं का आवाहन करने के लिए किए गए नृत्य हैं।

तुलु-नाडु में आज भी ‘स्थान’ नामक विशेष मंदिरों में ‘भूतों’ के धातु और लकड़ी के मुखौटों की पूजा की जाती है। यह मंदिर किसी खेत के किनारे पर या किसी घर के कोने में एक झूला या एक मंच जैसा कुछ मामूली सा हो सकता है। विशेष समारोहों में विशेष नर्तक-पुजारी यह मुखौटे पहनते हैं और फिर वे अध-बेहोश स्थिति में प्रवेश करते हैं। कभी-कभार कलाकार मुखौटे पहनने के बजाय अपने चेहरों को रंगीन कर लेते हैं। वे घास के बने लहंगे पहनते हैं और उनके चारों ओर एक पवित्र प्रभामंडल की तरह लकड़ी का एक विशाल फ्रेम होता है। वे अपने हाथों में घंटियां और तलवारें पकड़कर रातभर संगीत की धुन पर झूलते हैं। इस अवस्था में उनका शरीर देवता के लिए पात्र बन जाता है। इस परिवर्तन का प्रमाण वे कई ऐसे करतब करके देते हैं जो सामान्य लोग आसानी से नहीं कर सकते, जैसे आग पर चलना, अंकुश पर लटककर झूलना और भारी वस्तुएं उठाना। फिर वे भक्तों से चावल, सुपारी, मांस, शराब और कभी-कभार मछली के रूप में भी उपहार और बलि प्राप्त करते हैं। लोगों के परिवार संबंधी विवादों को सुलझाने में या स्वास्थ्य और वित्तीय समस्याओं को हल करने में ये ‘भूत’ मदद करते हैं।

‘भूतों’ को शिव और पार्वती के गण माना जाता है, जिन्हें धरती पर भेजा गया है। विभिन्न प्रकार के ‘भूत’ होते हैं, कुछ सूअर (पंजुरली) के रूप में तो कुछ बाघ (पिलिचमुंडा), बैल (नंदीगोना) और कुछ उभयलिंगी रूप में (जुमाड़ी), पुरुष के सिर और स्त्री के शरीर के साथ। ज़्यादातर ‘भूत’ कोबरा-मुकुट पहनकर अपनी जीभ बाहर निकालते हैं। उनका नृत्य जोशीला होता है और संगीत अपरिष्कृत व तात्त्विक होता है।

यहां कुछ कहानियां भी बहुत प्रचलित हैं। एक कहानी के अनुसार एक मादा पक्षी ने शिव को एक अंडा दिया, अपने पति को बचाने का उपहार। अंडे से एक बाघ (पिलि) निकला जो फल और बेर खाता था। उसे शिव के मवेशियों की रक्षा करने का कार्य सौंपा गया, लेकिन एक दिन उसने भूल से एक गाय खा ली। इसलिए उसे पृथ्वी पर जाकर ‘भूत’ के रूप में तुलुव लोगों के मवेशियों की रक्षा करने के लिए कहा गया। एक अन्य कहानी में एक राक्षस से लड़ते हुए शक्ति को बहुत भूख लगी और उन्होंने शिव से भोजन मांगा। शिव द्वारा दिया गया भोजन अपर्याप्त था और इसलिए उन्होंने शिव को ही निगल लिया। शिव का केवल सिर बच गया। वे दोनों आपस में मिल गए और जुमाड़ी के रूप में उन्होंने राक्षस का वध किया।

एक और कहानी कहती है कि सुअर पार्वती का पालतू प्राणी था। एक दिन उसने शिव के बैल पर हमला कर दिया जिस कारण शिव ने उसे भस्म कर दिया। बाद में शिव ने सुअर और बैल दोनों को पुनर्जीवित कर दिया। दोनों को पृथ्वी पर जाकर तुलुव लोगों के खेतों और मवेशियों की रक्षा करने के लिए कहा गया। हिमाचल की कुल्लू घाटी के मोहर-मुखौटों, तिब्बत के मुखौटेदार बॉन देवता, केरल का थेय्यम या श्रीलंका के सन्नी मुखौटों जैसे तुलु-नाडु के ये मुखौटेदार देवता एक प्राचीन विरासत का भाग हैं। बौद्धों, जैनों और ब्राह्मणों की स्थानीय सोच के संगठित और वर्गीकृत होने से बहुत पहले मुखौटों की इन परंपराओं ने स्थानीय सोच को आकार दिया।

- देवदत्त पटनायक, प्राचीन भारतीय धर्मशास्त्रों के आख्यानकर्ता और लेखक

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