रसरंग में क़िस्सागोई:विजया राजे न कभी मुख्यमंत्री बनीं न भाजपा अध्यक्ष, एक पुजारी ने दी थी ऐसी सलाह

रशीद किदवई4 महीने पहले
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राजमाता विजया राजे सिंधिया - Dainik Bhaskar
राजमाता विजया राजे सिंधिया

भाजपा की संस्थापक सदस्य राजमाता विजया राजे सिंधिया साल 1967 से पहले तक कांग्रेस में थीं। पंडित जवाहरलाल नेहरू के आग्रह पर उन्होंने 1957 और 1962 में कांग्रेस के टिकट पर दो बार लोकसभा का चुनाव (गुना और ग्वालियर) भी जीता। लेकिन इसके बाद उनका कांग्रेस से मोहभंग होने लगा था और 1967 के आम चुनावों की तारीख़ों की घोषणा होेते-होते उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी थीं। उन्होंने लोकसभा का चुनाव सी. राजगोपालाचारी द्वारा गठित स्वतंत्र पार्टी के टिकट पर लड़ा। इसी दौरान मप्र विधानसभा के चुनावों की तारीखें भी घोषित हो गईं। राजमाता ने विधानसभा का चुनाव भी लड़ने का निश्चय किया और वे जनसंघ के टिकट खड़ी हुईं। राजमाता ने दोनों चुनावों में दमदार तरीके से जीत हासिल कीं, लेकिन बाद में उन्होंने लाेकसभा की सदस्यता से इस्तीफा देकर विधानसभा की सीट अपने पास रखी और जनसंघ में शामिल हो गईं।

विधानसभा में विजया राजे के प्रवेश करते ही कांग्रेस को पहली बार बड़ी बगावत का सामना पड़ा। गोविंद नारायण सिंह की अगुवाई में कांग्रेस के 36 विधायकों ने पाला बदल लिया। इससे द्वारकाप्रसाद मिश्र की सरकार अल्पमत में आ गई और उन्हें मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा देना पड़ा। कांग्रेस की इस बगावत के पीछे राजमाता का ही दिमाग माना गया। अब कांग्रेस पार्टी से अलग हुए गुट और विपक्षियों दलों के पास मिलकर संयुक्त विधायक दल की सरकार बनाने का मौका था। इस समय विजया राजे चाहतीं तो वे मुख्यमंत्री भी बन सकती थीं। लेकिन उन्होंने यह पद लेने से इनकार कर दिया। उस समय उन्होंने इसकी कोई वजह भी नहीं बताई थी। राजमाता के पद की होड़ से हटने के बाद कांग्रेस के पूर्व नेता गोविंद नारायण सिंह को मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया गया।

बाद में 1980 के दशक में जब विजया राजे को भाजपा का अध्यक्ष बनने को कहा गया, तब उन्होंने लालकृष्ण आडवाणी को बताया था कि उन्हें पितम्बरा पीठ के मुख्य पुजारी पूज्यपाद स्वामीजी महाराज ने कोई भी सार्वजनिक पद नहीं लेने की सलाह दी थीं। इसीलिए वे पहले न मुख्यमंत्री बनने को राजी हुईं और न बाद में भाजपा का अध्यक्ष। इसका उल्लेख आडवाणी की पुस्तक माय कंट्री, माय लाइफ़ में भी मिलता है।

राजमाता के नाम पर रचा गया था 'राग' : साल 1975 में आपातकाल के दौरान आयकर अधिकारियों और अन्य कई एजेंसियों ने सिंधिया परिवार के ग्वालियर स्थित महल जय विलास पैलेस पर छापे मारे थे। एक रिपोर्ट के अनुसार इन छापों के दौरान आयकर अधिकारियों ने पैलेस से 53 क्विंटल चांदी का सामान और आभूषणों से भरे कई बक्से बरामद किए थे। टैक्स अफसरों को छापे के दौरान उस्ताद अलाउद्दीन खान द्वारा रचित नए राग के नोटेशन भी मिले थे जो कुछ संकेतों में अंकित थे। इस राग का नाम राजमाता के नाम पर 'विजया राजे' रखा गया था। उस्ताद ने इस राग की रचना ग्वालियर में सिंधिया परिवार द्वारा उनकी एक सर्जरी को प्रायोजित करने पर आभार स्वरूप की थी। अफसर इन संकेतों को गुप्त तहखानों के सीक्रेट कोड्स समझकर अपने साथ ले गए थे। लेकिन बाद में इस राग का क्या हुआ, कहीं पता नहीं चला।

- रशीद किदवई, वरिष्ठ पत्रकार एवं पुस्तक 'द हाउस ऑफ़ सिंधियाज' सहित कई पुस्तकों के लेखक।

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