रसरंग में मायथोलॉजी:अलग-अलग धर्मों में इच्छामृत्यु को लेकर क्या अवधारणाए हैं?

देवदत्त पटनायक4 महीने पहले
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पश्चिमी देशों में इच्छामृत्यु के विरोध और समर्थन में प्रदर्शन और आंदोलन सालों से किए जाते रहे हैं। (फाइल फोटो) - Dainik Bhaskar
पश्चिमी देशों में इच्छामृत्यु के विरोध और समर्थन में प्रदर्शन और आंदोलन सालों से किए जाते रहे हैं। (फाइल फोटो)

इच्छामृत्यु के लिए अंग्रेज़ी शब्द यूथनेशिया है। इसका मूल यूनानी अर्थ ‘अच्छी मृत्यु’ है। इच्छामृत्यु में कोई वृद्ध या बीमार व्यक्ति दर्द और पीड़ा से मुक्त होने के लिए स्वयं को दिए गए उपचार को नकारकर या अपनी मृत्यु को सक्रिय रूप से (उदाहरणार्थ ज़हर देकर) सुविधाजनक बनाने के लिए डॉक्टर से सहायता मांगकर स्वेच्छा से मृत्यु चुनता है। स्वभावतः यह बहुत ही विवादास्पद विषय है।

इस विवाद की जड़ें 19वीं सदी में हुए तर्क-वितर्कों और आत्महत्या के प्रति यहूदी-ईसाई-इस्लामी रवैये में हैं। बाइबिल का मानना है कि आत्महत्या करना गॉड के धर्मादेशों के विरुद्ध है और इसलिए पाप है। यहूदी धर्म में, आत्महत्या करने वालों को एक अलग कब्रिस्तान में अपूर्ण संस्कारों के साथ दफ़नाया जाता था। इस्लाम में मुहम्मद पैग़ंबर ने लोगों को आत्महत्या करने से स्पष्टतया मना किया और आत्महत्या करने वालों के शरीर को दुआ देने से इनकार किया।

ईसाई धर्म के उदय के पहले अधिकांश संस्कृतियां आत्महत्या या सहायक आत्महत्या के प्रति असहिष्णु नहीं थीं। सुकरात और प्लेटो ने इसके बारे में व्यावहारिक तरीक़े से बात की। रोम के लोग अपमानित होने के बजाय ख़ुद को छुरा भोंकने के लिए जाने जाते थे। एंथनी की ख़ुद को छुरा भोंककर और क्लियोपेट्रा की ज़हरीले सांपों से भरी टोकरी में हाथ डालकर की गईं आत्महत्याएं जानी-मानी हैं। जापानवासियों ने आत्महत्या की प्रथा को हारा-किरी या सेपुकु नामक विस्तृत अनुष्ठान में बदल दिया जो समुराई योद्धाओं की बुशिडो नियमावली का हिस्सा था।

हिंदू धर्म, जो पुनर्जन्म की धारणा पर आधारित है, में धर्मादेश नहीं होते। इसलिए उसमें मृत्यु के प्रति दृष्टिकोण बहुत अलग है। यहां हम एकमात्र जीवन नहीं जीते, बल्कि यह कई जीवनों में से एक जीवन है। मनुष्यों को सलाह दी जाती है कि वे अपने जीवन को चार भागों में विभाजित करके जिएं: पहले ब्रह्मचारी बनकर, फिर गृहस्थ बनकर, फिर सेवानिवृत्त व्यक्ति बनकर और अंत में संन्यासी बनकर। पहले चरण में मनुष्य जितना चाहें, उतना खा सकता है। दूसरे चरण में उसे सांसारिक ज़िम्मेदारियां निभानी होती हैं और इसलिए वह अपनी ज़रूरत जितना ही खाता है; तीसरे चरण में वह दूसरे चरण की आधी मात्रा में खाता है और सांसारिक ज़िम्मेदारियों से पीछे हटने पर ध्यान केंद्रित करता है। और अंत में वह भोजन छोड़कर जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्ति पर ध्यान केंद्रित करता है। इस प्रकार, यहां स्वैच्छिक मृत्यु को निहित प्रोत्साहन दिया गया है।

महाभारत में कौरवों के बूढ़े माता-पिता और पांडवों की माता जंगल में गए जहां उन्हें आग ने घेर लिया। पांडव ख़ुद अपने बुढ़ापे में हिमालय गए जहां उनकी गिरकर मृत्यु हुई। इस प्रकार उन्होंने आत्महत्या तो नहीं की, लेकिन ऐसी जगहों पर गए जहां मृत्यु की आशंका अधिक थी। रामायण में सीता के पृथ्वी में प्रवेश करने के बाद राम ने सरयू नदी में समाधि ले ली। 13वीं शताब्दी में पहली बार गीता का संस्कृत से किसी क्षेत्रीय भाषा में अनुवाद करने वाले संत ज्ञानेश्वर और अन्य संतों ने भी समाधि का मार्ग चुना। जैन धर्म में स्वैच्छिक आत्महत्या को स्पष्ट रूप से अपनाया गया है। साधुओं (श्रमण) और सामान्य व्यक्तियों (श्रावक) दोनों को सभी सांसारिक कर्त्तव्यों को पूरा कर और मन से सभी आसक्तियों को निकालकर ख़ुद को धीरे-धीरे भूखा रखने से मृत्यु पाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। इसे संथारा कहते हैं। सम्राट अशोक के दादा चंद्रगुप्त मौर्य ने इस तरह मृत्यु प्राप्त की थी।

बौद्ध धर्म इच्छामृत्यु को प्रोत्साहित या हतोत्साहित नहीं करता, बल्कि आत्महत्या के स्वरूप को समझने की कोशिश करता है। यदि अज्ञानता के कारण आत्महत्या की गई हो तो भविष्य का जीवन निश्चित ही दुख से भरा होगा। यदि गोधिका और वक्कली भिक्षुओं जैसे किसी ने प्रबुद्ध और तटस्थ बनकर आत्महत्या की हो, तो भविष्य के जीवन में निर्वाण प्राप्त हो सकता है।

लेकिन, स्वैच्छिक आत्महत्या की अवधारणा का आसानी से दुरुपयोग किया जा सकता है, जैसा की भारत में सती की प्रथा के साथ हुआ। सती का तथाकथित उद्देश्य युद्ध के दौरान मारे गए सैनिकों की विधवाओं को दुर्व्यवहार से बचाना और महिलाओं द्वारा पतियों के लिए अपना प्रेम व्यक्त करना था। लेकिन समय के साथ यह प्रथा ‘अवांछित’ विधवाओं से छुटकारा पाने के माध्यम में बदल गई। उनके लिए एकमात्र विकल्प मथुरा और काशी के विधवा-घरों में निर्वासित होना रह गया।

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