रसरंग में ऑटो टॉक:ईवी कार ले रहे हैं तो किन बातों का रखें ध्यान?

औरित्रो गांगुली20 दिन पहले
  • कॉपी लिंक

कुछ साल पहले तक वाहनों की काली प्लेट्स पर सफेद अक्षर लिखे होते थे। फिर आई सफेद/पीले रंग की प्लेट्स जिन पर काले अक्षर लिखे जाने लगे। अब वाहनों पर सफेद अक्षर लिखी हरी प्लेट्स भी नजर आने लगी हैं। ये नए जमाने के इलेक्ट्रिक व्हीकल्स की प्लेट्स हैं। हालांकि अभी इनकी संख्या कम है, लेकिन धीरे-धीरे इनका प्रभुत्व बढ़ता जा रहा है।

सवाल यह है कि क्या वाकई इनका प्रभुत्व या दायरा बढ़ता जा रहा है या ये केवल एक बुलबुला है जो जल्दी ही फूट जाएगा? यह सवाल इसलिए भी पूछा जा रहा है, क्योंकि बड़े कार निर्माता भी भविष्य में इलेक्ट्रिक वाहनों पर ही फोकस कर रहे हैं और वह भी काफी महत्वाकांक्षी लक्ष्य के साथ। साल 2030-35 तक पूरी तरह इलेक्ट्रिक होने का भी लक्ष्य कई कार कंपनियों ने रखा है। सवाल यह भी है कि क्या धरती के पास इतने संसाधन हैं कि इन वाहनों की बैटरियों में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल की आपूर्ति हो सके? ईवी के प्रति रुझान बढ़ने की एक सबसे बड़ी वजह प्रदूषण है। पेट्रोल या डीजल को बर्न करने वाला इंटरनल कम्बस्टन इंजन काफी घातक गैस रिलीज करता है और ईवी कारें इससे मुक्त हैं। हालांकि ईवी के लिए जो बैटरी इस्तेमाल में लाई जा रही हैं, उनके लिए भी कोबाल्ट, निकल, लिथियम, जिंक जैसी धातुओं की जरूरत है और इस कार्य के लिए भारी पैमाने पर जो खनन होगा, उसका पर्यावरण पर कितना असर पड़ेगा, यह एक अलग विवाद का विषय है। खैर आज हम इस बात की चर्चा नहीं कर रहे हैं कि कौन-सा वाहन अधिक इको-फ्रेंडली होगा। हां, इसमें कोई दो राय नहीं है कि इलेक्ट्रिक व्हीकल्स चलाने में सस्ते होंगे, ठीक-ठाक स्पीड भी होगी। न उसमें से धुआं निकलेगा और न शोर का प्रदूषण होगा। वाइब्रेशन भी नहीं के बराबर होगा। तो कुल मिलाकर ईवी व्यक्तिगत स्तर पर तो कम्फर्टेबल रहेगी।

ईवी स्कूटर: भारत में ईवी कार की तुलना में सड़कों पर ई-बाइक या ई स्कूटर की मौजूदगी ज्यादा तेज गति से बढ़ती जा रही है। भारत में सौ से भी अधिक कंपनियां हैं। इनमें से अधिकांश वे हैं, जो सीधे-सीधे चीन से ही ई-स्कूटर या बाइक आयात कर रही हैं, क्योंकि चीन के पास न केवल उन्नत बैटरी तकनीक है, बल्कि काफी सस्ती भी है। भारतीय कंपनियां बस इन चाइनीज स्कूटर्स या बाइक की री-ब्रांडिंग कर उन्हें बेच रही हैं। फिर भी इन्हें खरीदने में अधिक समझदारी है, क्योंकि वे सुपर किफायती है, चार्ज करना आसान है और इनका मैंटनेंस भी काफी सस्ता है।

ईवी कार: भारत में इलेक्ट्रिक टू व्हीलर की तुलना में इलेक्ट्रिक कार का मार्केट अब भी धीमा है और इसकी सबसे बड़ी वजह तो यही है कि ये काफी महंगी हैं। अगर आप ईवी कार खरीदना चाह रहे हैं तो उसका सही चुनाव करने से पहले हमेशा इन पहलुओं को भी ध्यान में रखें:

1. रेंज की चिंता करें, क्योंकि बैटरी मौसम और उसकी बढ़ती उम्र के साथ अलग-अलग व्यवहार कर सकती है।

2. बैटरी चार्ज करने की गति और समय का ध्यान रखें। इस तथ्य का ध्यान रखें कि चाहें कंपनियां कितने भी दांवे कर लें, चार्जिंग में काफी वक्त लगता है। चलते समय चार्जर की उपलब्धता का भी ध्यान रखें।

3. बैटरी पैक की वजह से ईवी कारें सामान्य कारों की तुलना में 15 से 18 फीसदी तक भारी होती है। इसलिए ये सड़क पर सीधे चलने में तो अच्छी हैं, लेकिन मोड़ पर इनकी हैंडलिंग अपेक्षाकृत कठिन होती है।

4. ध्यान रखें कि इसकी रिसेल वैल्यू काफी कम होती है, क्योंकि इनकी बैटरी हर साल अपग्रेड होती है और पेट्रोल/डीजल कार की तुलना में ईवी कार के नए मॉडल ज्यादा तेजी से आते हैं।

नेक्सॉन कार के दो वर्जन की तुलना

भारत में सबसे अधिक बिकने वाली इलेक्ट्रिक कार टाटा नेक्सॉन है। हमने इसकी दो जनरेशन की कारों का रिव्यू किया। इसके नतीजे इस प्रकार हैं:

नेक्सॉन का पुराना वर्जन

रैंज: 200 किमी

चार्जिंग टाइम : 5% से 100% होने में 3.3kW चार्जर से 9-10 घंटे का समय।

नेक्सॉन का नया वर्जन

रैंज: 300 किमी

चार्जिंग टाइम: 5% से 100% होने में 3.3kW चार्जर से 12-13 घंटे का समय। 7 kW चार्जर से 6 घंटे।

खबरें और भी हैं...