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रसरंग में टॉकिंग पॉइंट:जब एक युवा पत्रकार के लिए दिलीप कुमार ने रास्ते में रोक दी थी अपनी कार

भावना सोमाया9 दिन पहले
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यह सत्तर के दशक के मध्य की बात होगी। मैं उस दौरान कॉलेज में थी और एक फिल्म जर्नल के साथ इंटर्नशिप कर रही थी। उसी दौरान मुझे एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के लिए भेजा गया। मैं कार्यक्रम स्थल पर थोड़ी देर से पहुंची। तब तक सारी सीटें भरी चुकी थीं। इसलिए मैं मंच के पास आधे रास्ते में ही रुक गई। मंच पर क्या हो रहा, उस ओर देखने लगी। वहां सफेद कपड़े से ढंकी एक लंबी मेच थी जिस पर कुछ गुलदस्ते रखे हुए थे। मेज के दूसरी ओर बीच में दिलीप कुमार बैठे हुए थे। उनसे जैसे ही मेरी आंखें मिलीं, उन्होंने मुझे खड़ा देखकर हल्का-सा इशारा करके आगे की सीट की ओर आने को कहा। मैं बड़े ही हिचकिचाते हुए आगे गई। आगे की पंक्ति में कई सीटें खाली थीं। लेकिन मैं आगे की सीट पर बैठने में असहज थी। मैंने फिर दिलीप कुमार को देखा। उनका इशारा साफ था- बैठ जाओ।

मैं नर्वस होकर किनारे की एक खाली सीट पर बैठ गई और फिर भाषणों को ध्यान से सुनने लगी। अब दिलीप साहब के भाषण की बारी आई। उन्होंने विनम्रता से लेकिन पूरे जोश-ओ-खरोश से अपनी बात कही। वह प्रेस कॉन्फ्रेंस सरकार की किसी नीति के खिलाफ फिल्म बिरादरी की असहमति को लेकर थी और दिलीप साहब फिल्म बिरादरी के समर्थन में आए थे।

अगले दिन शाम को मैं चर्च गेट स्टेशन जाने के लिए सड़क पार कर रही थी कि तभी एक चमचमाती हुई ब्लैक मर्सिडीज मेरे सामने आकर रुकी। जैसे ही मैं कार के करीब गई, दिलीप कुमार ने मेरे लिए कार का दरवाज़ा खोल दिया। मैं भी बिना ज्यादा सोचे-समझे गाड़ी के अंदर चली गई, लेकिन मेरा दिमाग दौड़ रहा था। आखिर उन्होंने मेरे लिए कार क्यों रोकी? क्या मुझे कोई और समझकर कन्फ्यूज हो गए थे? और हम जा कहां रहे थे? मैं अपनी सीट के बिल्कुल किनारे पर बैठ गई। मुझे यकीन है कि वे मेरी बेचैनी से वाकिफ थे, लेकिन इसके बावजूद कैजुअली बात करते रहे। वे इतना धीरे-धीरे बोल रहे थे कि मुश्किल से सुनाई दे रहा था। लेकिन मैं अशिष्ट न दिखूं, इसलिए बीच-बीच में अपना सिर हिला रही थी और मुस्कुरा रही थी।

जब कार पेडर रोड पर आई तो उन्होंने अपने ड्राइवर को एक तरफ रुकने के लिए कहा और मेरी ओर मुड़ते हुए बोले, "मेरी मंजिल आ गई है। आपकी कंपनी के लिए शुक्रिया।' वहां से मैंने एक टैक्सी पकड़ी और अपने गंतव्य तक पहुंची। उस दिन जो कुछ हुआ, उसे सोच-सोचकर आज भी चकरा जाती हूं कि क्या वाकई वैसा ही हुआ था या मेरा मतिभ्रम था! आज मैं अपनी पुरानी स्मृतियों को बड़ी ही मंत्रमुग्धता से देखती हूं। पाती हूं कि अभिनेता भी इंसान होते हैं और परिस्थितियों को समझकर उनके अनुसार बर्ताव करते हैं। हो सकता है दिलीप कुमार ने उस दिन प्रेस कॉन्फ्रेंस में मेरी नर्वसनेस को भांप लिया हो और इसलिए कार की सवारी करवाकर मुझे सहज करना चाहते हो।

इसके बाद एक दशक और बीत गया और इस दौरान मेरी उनके साथ कभी मुलाकात नहीं हो पाई। 1990 में निर्देशक सुभाष घई ने मुझे दिलीप कुमार और राजकुमार को एक साथ शूटिंग करते हुए देखने के लिए 'सौदागर' की शूटिंग पर आमंत्रित किया। जब मैं सेट की ओर जा रही थी, तभी मैंने देखा कि दिलीप कुमार अपनी कॉस्ट्यूम में मुझसे कुछ ही कदम आगे चल रहे हैं। वे सेट में प्रवेश करने ही वाले थे कि अचानक रुक गए। मैं भी वहीं रुक गई। मैंने देखा कि वे राजकुमार को शॉट देते हुए देख रहे थे। अचानक, उन्होंने मुझे देखा। उनके चेहरे पर थोड़ी सख्ती नजर आई। मुझे एहसास हुआ कि मैंने अनजाने में एक अभिनेता की तैयारी में खलल डाल दिया है।

खैर, फिर 2004 आया। इस साल मुगल-ए-आज़म को डिजिटली रंगीन करके फिर से थिएटरों में रिलीज किया गया। डिजिटली रंगीन होने वाली यह पहली फिल्म थी। हमने इस अवसर को स्क्रीन के वार्षिक पुरस्कार समारोह में मील के पत्थर के रूप में सेलिब्रेट किया। उस समय मैं स्क्रीन की संपादक थी। महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख ने दिलीप कुमार का सम्मान किया। और अब बोलने की बारी दिलीप साहब की थी। यह उनके अल्जाइमर के शुरुआती दिन थे। लेकिन उस समय मुझ सहित कई लोगों को उनकी इस बीमारी के बारे मंे मालूम नहीं था। वे कुछ खोए हुए दिखाई दिए और इसलिए मैं झिझक के साथ मंच पर गई और उनके पीछे खड़ी हो गई। मेरी उपस्थिति को भांपकर उन्होंने पूछा, "कौन है भाई।"फिर माइक्रोफ़ोन मेरे हाथों में थमा दिया।

यह लिखते हुए मैं चालीस साल पहले की हमारी पहली मुलाकात के बारे में सोचती हूं तो यह भी सोचती हूं कि क्या आज के समय में ऐसा संभव है? मैं पक्के से कुछ नहीं कह सकती, क्योंकि दिलीप कुमार जैसा अभिनेता भी तो सौ सालों में एक ही बार आता है।

- भावना सोमाया, जानी-मानी फिल्म लेखिका, समीक्षक और इतिहासकार

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