अन्नू कपूर का खास कॉलम 'कुछ दिल ने कहा':जब ‘चोरी की फ़िल्म’ को अवार्ड नहीं देने पर अड़ गए थे विजय आनंद!

अन्नू कपूर12 दिन पहले
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विजय आनंद अपने भाई देव आनंद के साथ। आज ही स्वर्गीय विजय आनंद का जन्मदिवस है। 22 जनवरी 1935 को गुरदासपुर में इनका जन्म हुआ था। - Dainik Bhaskar
विजय आनंद अपने भाई देव आनंद के साथ। आज ही स्वर्गीय विजय आनंद का जन्मदिवस है। 22 जनवरी 1935 को गुरदासपुर में इनका जन्म हुआ था।

हर किसी के सामने फैला नहीं इसलिए दामन मेरा मैला नहीं। (- डॉ. वासिफ़ यार)

वरिष्ठ पत्रकार अली पीटर जॉन के लगातार आग्रह के बाद स्क्रीन अवार्ड्स की जूरी के अध्यक्ष का पदभार संभालने के लिए प्रतिभाशाली, संवेदनशील, ढेर सारी सफल व अनूठी फिल्मों के निर्देशक, लेखक, अभिनेता विजय आनंद ने स्वीकृति दे दी, परंतु अग्रिम ही चेता दिया कि वे इस समिति के निर्धारित नियमानुसार एवं समस्त जूरी की सामूहिक सहमति के साथ ही निर्णय देंगे। नियम पुस्तिका में पुरस्कार देने के नीति-निर्देश स्पष्ट हैं। सो आप अपने बॉसेस से बोल दीजिए कि उसमें कोई समझौता या पोल-पट्टी नहीं होगी। स्क्रीन पत्रिका के बॉसेस ने सारी शर्तें स्वीकार कर लीं। लेकिन किसी को भी आगे होने वाली घटनाओं का रत्ती भर भी आभास नहीं था! प्रतियोगिता में भाग लेने वालीं सभी फिल्मों की स्क्रीनिंग/अवलोकन विजय आनंद के केतनव स्टूडियो के मिनी थिएटर में आयोजित किया गया। आदित्य चोपड़ा द्वारा निर्देशित और उनके पिता यश चोपड़ा द्वारा निर्मित ‘दिल वाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ हर व्यक्ति की सबसे प्रियतम और जिसे इंग्लिश में हॉट फेवराइट कहते हैं, वो फिल्म थी। फिल्म स्टार जितेंद्र भी इस जूरी के सदस्य थे, जिन्होंने केवल पहली मीटिंग में भाग लेकर निर्णय भी दे दिया कि उनके सारे वोट ‘दिल वाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ को ही दे दिए जाएं।

‘दिल वाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ को ब्रिटिश टेलीविज़न फिल्म ‘Romance on the Orient Express’ की शत-प्रतिशत नकल मानते हुए प्रतियोगिता से निष्कासित कर दिया गया था।
‘दिल वाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ को ब्रिटिश टेलीविज़न फिल्म ‘Romance on the Orient Express’ की शत-प्रतिशत नकल मानते हुए प्रतियोगिता से निष्कासित कर दिया गया था।

अब जूरी को प्रतियोगिता में आई इस फिल्म का अवलोकन करने के बाद मूल्यांकन करना था। फिल्म की जब स्क्रीनिंग शुरू हुई, तो उसके कुछ देर बाद विजय आनंद ने फिल्म रोकने को बोला और उन्होंने जूरी सदस्यों को सूचना दी कि ये फिल्म 1985 में लॉरेंस गॉर्डन क्लार्क द्वारा निर्देशित ब्रिटिश टेलीविज़न फिल्म ‘Romance on the Orient Express’ की शत-प्रतिशत नकल है तथा निर्माता और निर्देशक ने किसी भी आभार, प्रेरणा या कॉपीराइट्स का हवाला न देकर इसे अपना मौलिक सृजन करार दिया है जो अवॉर्ड समिति द्वारा निर्धारित नियमों के विपरीत है। इसमें स्पष्ट दिशा-निर्देश हैं कि इस प्रतियोगिता में केवल वही फिल्म भाग ले सकती हैं, जो किसी फिल्म की नकल नहीं हो और जिसका सृजन मौलिक हो और अगर कोई फिल्म नकल है असल नहीं है, तो उसे प्रतियोगिता से निष्कासित कर दिया जाएगा! ये नियम स्क्रीन अवार्ड्स समिति के बॉस लोगों ने ही बनाए थे, इसलिए विजय आनंद ने नियमानुसार ‘दिल वाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ को प्रतियोगिता से बाहर निकाल दिया। जूरी के बाकी सदस्यों का समर्थन उनके साथ था।

ये समाचार जंगल की आग की तरह पूरे फिल्म जगत में फैल गया। कई लोग इस फैसले को बर्दाश्त नहीं कर पाए। यश चोपड़ा को तो जैसे बिजली का झटका लगा हो। उन्होंने विजय आनंद को समझाने की कोशिश भी की, परंतु विजय आनंद अपने निर्णय पर अडिग थे जो नियमानुसार उपयुक्त था। सुना है यश चोपड़ा तीन दिनों तक बीमार भी पड़ गए थे।

आमिर ख़ान की फिल्म ‘अकेले हम अकेले तुम’ भी ‘Kramer V/S Kramer’ फिल्म की कॉपी थी। इसलिए इसे भी प्रतियोगिता से बाहर निकाल दिया गया।
आमिर ख़ान की फिल्म ‘अकेले हम अकेले तुम’ भी ‘Kramer V/S Kramer’ फिल्म की कॉपी थी। इसलिए इसे भी प्रतियोगिता से बाहर निकाल दिया गया।

बात यहीं नहीं रुकी, बल्कि बहुत आगे बढ़ गई क्योंकि इसी प्रतियोगिता में आमिर ख़ान की फिल्म ‘अकेले हम अकेले तुम’ भी शामिल थी, जिसे डायरेक्ट किया था मंसूर ख़ान ने। ये फिल्म भी कॉपी थी। मूल फिल्म थी ‘Kramer V/S Kramer’। तो हिंदी की ये फिल्म नकल थी, चोरी का माल थी, मौलिक नहीं थी इसलिए इसे भी प्रतियोगिता से बाहर निकाल दिया गया। आमिर ख़ान को इतना आघात पहुंचा कि उन्होंने शपथ ले ली कि अब वे किसी अवॉर्ड समारोह या प्रतियोगिता में शामिल नहीं होंगे (कालांतर में ऑस्कर अवॉर्ड के समारोह में ‘लगान’ फिल्म के लिए जरूर गए लेकिन भय्या वो तो गोरी चमड़ी है ना! जिन्होंने राज किया हम पर, सो उनके लिए एक विशेष रियायत तो देनी पड़ेगी ना)। इस फिल्म के निर्देशक महोदय तो इस सदमे से ऐसे आहत हुए कि फिल्मी दुनिया सदा के लिए छोड़कर तमिलनाडु में ऊटी के पास बसे कुन्नूर में दूध दही पनीर के उत्पादन में जुट गए।

स्क्रीन अवार्ड्स के बॉस लोग अपने ही बनाए हुए नियम-जाल में फंस गए थे, क्योंकि उन्हें बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी कि कोई व्यक्ति उन्हीं के बनाए हुए नियम-क़ायदों का गंभीरता और ईमानदारी के साथ अनुसरण कर अपने कर्त्तव्य का पालन करेगा। अगर ध्यान से देखा जाएं तो ये समस्या केवल फिल्म जगत से जुड़ी नहीं है, क्योंकि ये फिल्मी दुनिया हमारे भारतीय समाज का एक अभिन्न अंग है, वो समाज जो अधिकांश रूप में भ्रष्ट है, आडंबरी है, अनुशासनहीन है। जिस समाज में विधि और नीति निर्माण करने वाले ही सबसे पहले कानून तोड़ते हैं और ज्यादातर बच भी जाते हैं, परंतु जिस समाज में गरीब को न्याय मिल पाना एक चमत्कार से कम नहीं होता।

विजय आनंद ने इंग्लिश फिल्म बनाने वाले ‘इस्माइल मर्चेन्ट’ को ‘लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड’ प्रदान करने का भी विरोध किया।
विजय आनंद ने इंग्लिश फिल्म बनाने वाले ‘इस्माइल मर्चेन्ट’ को ‘लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड’ प्रदान करने का भी विरोध किया।

स्क्रीन के बॉस लोगों के साथ मतभेद और बढ़ते चले गए, जब उन्होंने निर्णय लिया कि उस वर्ष का ‘लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड’ प्रदान किया जाएगा इंग्लिश फिल्म बनाने वाले ‘इस्माइल मर्चेन्ट’ को! एक बार फिर विजय आनंद ने अंगद के जैसे पग धर दिए। इस्माइल मर्चेन्ट का हिंदी फिल्म जगत में क्या योगदान है? उन्होंने तो हॉलीवुड के लिए फिल्में बनाई हैं। तो ऐसा व्यक्ति हिंदी फिल्म जगत में योगदान के लिए ‘लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड’ का हकदार कैसे हो सकता है? और अगर नियम भंग हुए तो विजय आनंद अपनी जूरी के सभी माननीय सदस्यों के साथ चलती सभा और चलते कैमरों के सामने बहिष्कार करके निकल जाएंगे। तो फिर इस्माइल भाई को आने से रोका गया और उस वर्ष का ‘लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड’ सर्वसम्मति से नियम का पालन और निर्वाह करते हुए सबसे योग्य व्यक्ति को प्रदान किया गया और वो थे बलदेव राज चोपड़ा (बीआर चोपड़ा)। अपन लोग बड़े जुगाड़ू-तुगाड़ू प्रजाति वाले लोग हैं। सो यश चोपड़ा ने चक्कर चलाकर ‘दिल वाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ के लिए स्क्रीन अवॉर्ड हथिया ही लिया! कई शताब्दी पहले कबीर ने कैसे लिख दिया कि ... कबीरा कलजुग कठिन है, साधो ना मिलिया कोय चोर उचक्के मसखरे, तिनको आदर होय! आज इस कथा वर्णन का प्रयोजन विशेष है, क्योंकि आज ही स्वर्गीय विजय आनंद का जन्मदिवस है। 22 जनवरी 1935 को गुरदासपुर में आपका जन्म हुआ था। आप चेतन आनंद, देव आनंद बंधुओं के सबसे छोटे भाई थे। विलक्षण प्रतिभा से आप्लावित, संवेदनशील, ईमानदार। मित्रों से लगातार धोखे मिले, फिर भी उन्होंने सुपरहिट फिल्में बनाकर उन निर्माताओं के खजाने भर दिए। ऐसी हस्ती का आज मैंने सिमरन किया तो हिया में ठंडक पड़ी! नौ दो ग्यारह, ज्वेल थीफ, तीसरी मंजिल, तेरे मेरे सपने, जॉनी मेरा नाम, गाइड, ब्लैक मेल इत्यादि फिल्मों में उनके निर्देशन का जलवा अवश्य देखें। विवादास्पद बातें सबके साथ जुड़ी रहती हैं। विजय आनंद भी उससे घिरे रहे, लेकिन उसकी चर्चा फिर कभी। आज के कुछ निर्माता-निर्देशक नूतन विचारों को फिल्म माध्यम में ला रहे हैं। प्रार्थना करें कि कला और सिनेमा में मौलिक सृजन हो, चोरी का माल ना आने पाए। ये जिम्मेदारी दर्शकों की भी है। अपने देश का जो शुभ है, मौलिक है, सुंदर है उसकी छटा से विश्व प्रकाशित हो! ये ही मंगल कामना है! जय हिन्द! वंदे मातरम!

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