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अगले 10 साल:विश्व व्यवस्था में कहां होगा भारत?

डाॅ. रहीस सिंह8 दिन पहले
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दुनिया ने नए साल के साथ ही नए दशक में भी प्रवेश कर लिया है। यह दशक इसलिए भी अहम है क्योंकि इससे पहले 1990 के दशक में दुनिया ने मोटे तौर पर अमेरिका को सुपरपाॅवर मानकर उसी के नेतृत्व में आगे बढ़ने का निर्णय लिया था। लेकिन आज कोई भी सुपरपाॅवर नहीं है। दरअसल वर्ष 2008 के सबप्राइम संकट ने अमेरिका से सुपरपॉवर का खिताब छीन लिया था और अब कोविड की वजह से उसकी कप्तानी पर भी संकट खड़ा हो गया है। इसलिए विश्व व्यवस्था इस समय संक्रमण के दौर से गुजर रही है। ऐसे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि आने वाले समय में वैश्विक राजनीति व रणनीति और विश्व अर्थव्यवस्था किसके नेतृत्व में आगे बढ़ेगी और भारत इसमें किस प्रकार की भूमिका निभाएगा?

अगर अमेरिकी कप्तानी चली गई तो क्या होगा?

नए दशक में हम जिस दुनिया और जिस विश्व व्यवस्था से रूबरू हो रहे हैं, वहां कोई सुपरपॉवर तो नहीं है पर कप्तानी अभी अमेरिका के पास ही है। लेकिन यदि नए राष्ट्रपति जो बाइडेन निवर्तमान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति पर न चलकर चीन को साथ लेकर चलने की कोशिश करेंगे, तब स्थिति बदलेगी। उस स्थिति में यूरोप के अधिकांश देश अमेरिका को छोड़कर चीन के पीछे चलने के लिए तैयार हो जाएंगे। तब स्थिति भारत के लिए काफी पेचीदा हो जाएगी। ऐसे में भारत के लिए यह जरूरी हो जाएगा कि वह क्वैड (भारत-अमेरिका-जापान-आॅस्ट्रेलिया रणनीतिक चतुर्भुज) के साथ-साथ नई दिल्ली-वॉशिंगटन-मॉस्को के बीच बेहतर साम्य स्थापित करे।

यूरोप को समझाना होगा कि भारत से ले सहयोग

कोरोना वायरस का नया स्ट्रेन अगर वाकई गंभीर हो गया तो यह वैश्विक अर्थव्यवस्था को भी रिवर्स गियर में डाल देगा। ऐसे में चीन की रणनीति अमेरिका से कप्तानी छीनने और यूरोपीय यूनियन को अपनी टीम के रूप में इस्तेमाल करने की है। यूरोप इस अवधारणा को स्वीकार कर चुका है कि चौथी औद्योगिक क्रांति का अगुआ चीन बनेगा। भारत को इस यूरोपीय मनोदशा को भंग करने की रणनीति पर काम करने की जरूरत होगी। भारत को खुले मन से स्वीकारने के लिए यूरोपीय देशों को समझाना होगा। हमें यह भी एहसास कराना होगा कि आज भारत एक ‘सबकांटिनेंटल पाॅवर’ है और यदि अमेरिका व यूरोप वाकई चीन को रोकना चाहते हैं तो फिर यह भारत के सहयोग के बिना संभव नहीं है।

भारत, ईयू और अमेरिका के बीच बने स्ट्रैटेजिक ट्राइंगल

दुनिया चौथी औद्योगिक क्रांति के युग में प्रवेश कर रही है। इतिहास गवाह है कि पूंजीवाद से जुड़ी प्रत्येक क्रांति विश्व व्यवस्था को नई दिशा और नया नेतृत्व देती है। ब्रिटेन और अमेरिका इसका उदाहरण हैं। लेकिन चौथी औद्योगिक क्रांति के आते-आते यूरोप अपनी आभा खो चुका है और अमेरिका की दावेदारी भी मजबूत नजर नहीं आ रही। यह भी सत्य है कि चौथी औद्योगिक क्रांति की कल्पना हम चीन के बगैर नहीं कर सकते। ऐसे में अमेरिका और यूरोप के लिए ही नहीं, भारत के लिए भी यह अहम होगा कि चीन किसी भी हालत में वैश्विक नियमों को चुनौती देने की स्थिति में न पहुंच पाए। यह तभी संभव होगा जब भारत, यूरोपीय यूनियन और अमेरिका के बीच एक मजबूत स्ट्रैटेजिक ट्राइंगल बने।

भारत को रूस के साथ मजबूत करनी होगी बॉन्डिंग

एक बड़ी अर्थव्यवस्था न होने के बावजूद भावी नई विश्व व्यवस्था में रूस अत्यंत निर्णायक भूमिका निभा सकता है। इसका कारण यह है कि रूस आज भी एक बड़ी सैन्य ताकत है, एक ऐसी ताकत जो पश्चिम एशिया, मध्य एशिया और पूर्वी यूरोप में शक्ति संतुलन के खेल में निर्णायक हैसियत प्राप्त कर चुकी है। व्लादिमीर पुतिन के नेतृत्व में रूस, शंघाई सहयोग संगठन और ब्रिक्स में महत्वपूर्ण स्थिति में तो है ही, सोवियत खंडहरों पर फिर खड़े हो रहे देशों के साथ-साथ वारसा पैक्ट के देशों में अपनी भूमिका बढ़ाने में भी सफल होता नजर आ रहा है। ऐसे में भारत की कोशिश यही होनी चाहिए कि माॅस्को-बीजिंग के बजाय नई दिल्ली-मॉस्को बॉन्डिंग रणनीतिक आकार ले।

भारत नेतृत्व कर सके, इसकी क्या संभावनाएं?

आज वैश्विक कूटनीति में भारत एक मुकाम हासिल कर बढ़त लेने की स्थिति में है। इसलिए भारत को पड़ोसियों और सन्निकट पड़ोसियों के लिए विशेष रणनीति बनाते हुए पश्चिम की तरफ देखने की जरूरत होगी। हमें यह मानकर चलना होगा कि चीन भारतीय हितों को नुकसान पहुंचाने वाला कोई अवसर नहीं छोड़ेगा। चूंकि दुनिया इस निष्कर्ष के करीब पहुंच चुकी है कि ‘चीन मुक्त’ दुनिया की कल्पना अब संभव नहीं है। चीन इसी का फायदा उठाने की कोशिश में है। भारत की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह चीन को इस दिशा में आगे बढ़ने से रोकने में किस हद तक सफल होता है। अब भारत यदि तमाम देशों को यह समझाने में सफल हो जाता है कि हम ऐसी दुनिया स्वीकार नहीं कर सकते जहां चीन सुपरपावर हो और वह वैश्विक संस्थाओं को अपने प्रतिष्ठानों की तरह हैंडल करे। तब भारत दुनिया का नेतृत्व करने की हैसियत में आ जाएगा। अब देखना होगा कि यह पहल किस रूप में शुरू होती हैै।

पॉवर के तीन पैमाने: भारत आज और 10 साल बाद...

1. अर्थशक्ति : आज भारत छठवें स्थान पर है। ड्यूश बैंक के अनुमान के अनुसार भारत इस दशक में सात ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था बन जाएगा। हालांकि पंद्रहवें वित्त आयोग के अध्यक्ष एनके सिंह के अनुसार मजबूत अर्थव्यवस्था बनने के लिए भारत को अगले 10 साल तक हर वर्ष 7-8 फीसदी की विकास दर हासिल करनी जरूरी होगी। वहीं, भारत 2030 तक डेढ़ अरब से ज्यादा लोगों का बाजार बन चुका होगा जो हमारी बड़ी ताकत होगी

2. युवाशक्ति : किसी भी देश के शक्तिशाली बनने में युवाशक्ति भी एक मुख्य कारक माना जाता है। यूनाइटेड नेशन्स पॉपुलेशन फंड (यूएनएफपीए) के अनुसार इस समय भारत में 24 करोड़ युवा आबादी (15 से 25 साल) है जो दुनिया में सबसे ज्यादा है। 2030 तक भी भारत सबसे युवा देश बना रहेगा।

3. सैन्य शक्ति : ग्लोबल फायर पॉवर के अनुसार सैन्य शक्ति इंडेक्स में भारत चौथे स्थान पर है। पहले, दूसरे और तीसरे स्थान पर क्रमश: अमेरिका, रूस व चीन है। अगले 10 साल में भी भारत इसी स्थिति में बरकरार रहेगा। हालांकि स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट के अनुसार सैन्य खर्च के मामले में भारत तीसरे स्थान पर है।

(डाॅ. रहीस सिंह विदेश मामलों के विशेषज्ञ हैं।)

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