पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें

रसरंग में मायथोलॉजी:अर्थव्यवस्था की समृद्धि के लिए किस देवता की कृपा ज़रूरी है?

देवदत्त पटनायक13 दिन पहले
  • कॉपी लिंक
आंध्रप्रदेश के मछलीपटनम स्थित प्राचीन विश्वकर्मा मंदिर। (फोटो साभार : नागामल्ली) - Dainik Bhaskar
आंध्रप्रदेश के मछलीपटनम स्थित प्राचीन विश्वकर्मा मंदिर। (फोटो साभार : नागामल्ली)

गंगा के मैदानी इलाक़ों या असम, बंगाल या ओडिशा में रहने वाले कई शिल्पकार पितृ पक्ष के अंत में और नवरात्रि के पहले दिन, महालय से ठीक पहले विश्वकर्मा की पूजा करते हैं। पितृ पक्ष वो दिन है, जब पूर्वजों या पितरों की पूजा की जाती है। इसलिए उस दिन मृत्यु पर ध्यान केंद्रित किया जाता है। नवरात्रि का त्यौहार पुनर्जन्म से जुड़ा है। इस प्रकार विश्वकर्मा पूजा मृत्यु और पुनर्जन्म के त्यौहारों के बीच में स्थित है। एक तरह से यह उचित भी है क्योंकि विश्वकर्मा दिव्य शिल्पकार और सभी शिल्पकारों के संरक्षक हैं।

यह पूजा कन्या संक्रांति के दिन की जाती है। इस दिन सूर्य कन्या राशि में प्रवेश करता है। ऐसी मान्यता है कि इसी दिन हल का आविष्कार किया गया था और उसे विश्वकर्मा द्वारा मानवता को दिया गया।

विश्वकर्मा को प्रजापति (जो लोगों के नेता हैं), महाराणा (कुशल शिल्पकार हैं), ब्रह्मणस्पति (जो अंतरिक्ष के स्वामी हैं) और दक्ष (जो सक्षम हैं) भी कहा जाता है। उन्हें स्थापत्य-शास्त्र, वास्तु-शास्त्र और शिल्प-शास्त्र से जोड़ा जाता है। इसके अलावा बस्तियां और इमारतें कैसी बनाई जाती हैं, इस पर लिखे विभिन्न ग्रंथों से भी विश्वकर्मा जुड़े हुए हैं। विश्वकर्मा शायद पहले शिल्पकार और विश्वकर्मा जाति या शिल्पकारों की जाति के संस्थापक हैं। बढ़ई और लोहारों का इसी जाति में समावेश होता है। यूनानी परंपरा में हेफ़ेस्टन दिव्य शिल्पकार माने जाते हैं, जबकि रोम परंपरा में वल्कन दिव्य शिल्पकार हैं।

वेदों में इनका नाम त्वष्ट्र है। जब कोई पुरुष किसी महिला के पास जाता है, तो विश्वकर्मा का आवाहन किया जाता है। यह इसलिए कि विश्वकर्मा ही मां के गर्भ में भ्रूण को उचित आकार देते हैं। कुछ लोग उन्हें संपूर्ण जीवन के निर्माता यानी ब्रह्मा से जोड़ते हैं। प्रारंभिक वैदिक ग्रंथों में उन्हें उस जीवाणु के रूप में कल्पित किया गया है, जिससे पांच ऋषि उभरे। विचारों का निर्माण करने वाले सात ऋषियों के विपरीत इन पांच ऋषियों ने वस्तुओं का निर्माण किया और इस प्रकार वे उनसे अलग थे।

कुछ लोग विश्वकर्मा को इंद्र से जोड़ते हैं। ऋग्वेद के अनुसार इंद्र पहले देवता थे, जिन्होंने पृथ्वी को आकाश से अलग किया था। इसलिए इंद्र की तरह प्रतिमाओं में विश्वकर्मा को भी हाथी पर बैठे हुए दिखाया जाता है और उनके हाथों में हथौड़ा, धुरी, छैनी और मापक जैसे विभिन्न उपकरण व यंत्र होते हैं।

दक्षिण पूर्व एशिया में स्वर्ग के निर्माता ब्रह्मा और आकाश के स्वामी इंद्र को एक ही देवता माना जाता है। और इसलिए इंद्र की तरह ब्रह्मा को भी हाथी पर बैठे हुए कल्पित किया जाता है। 1,500 साल पहले भारत के पूर्वी तट के समुद्री व्यापारियों के साथ दक्षिण पूर्व एशिया के घनिष्ठ संबंधों की वजह यह हो सकती है।

यह त्यौहार आम तौर पर बंगाल में मनाया जाता है। विश्वकर्मा की प्रतिमा को बनाने वाले शिल्पकार भी बंगाल से होते हैं। उनकी प्रतिमा और दुर्गा पूजा में कार्तिकेय की प्रतिमा को बनाने के लिए एक ही सांचे का इस्तेमाल किया जाता है। इसलिए लोग विश्वकर्मा की कई प्रतिमाओं और कार्तिकेय की प्रतिमाओं में गड़बड़ा जाते हैं। लेकिन, कार्तिकेय के विपरीत उनका वाहन मोर नहीं बल्कि हाथी है और उनके हाथों में हथियार नहीं बल्कि उनके शिल्प के उपकरण होते हैं। आधुनिक पोस्टर कला में वे कार्तिकेय की तरह कम और ब्रह्मा की तरह ज्यादा दिखते हैं, दाढ़ी के साथ और बूढ़े। वे राजहंस या हंस से जुड़े हुए हैं। हंस एक भारतीय पक्षी है, जबकि राजहंस एक यूरोपीय पक्षी है, जिसे यूरोपीय कला से प्रभावित भारतीय कलाकारों ने लोकप्रिय बनाया था।

विश्वकर्मा ने कई नगरों का निर्माण किया, जैसे देवताओं के लिए अमरावती, असुरों के लिए हिरण्यपुर, यक्षों के लिए अलकापुरी, पांडवों के लिए मायापुर और कृष्ण के लिए द्वारावती। उन्होंने दधीचि की हड्डियों से इंद्र के लिए वज्र का निर्माण किया और सूर्य देवता की रोशनी का एक हिस्सा लेकर विष्णु के लिए सुदर्शन चक्र का निर्माण किया। वे उत्पादन के देवता हैं और इसलिए अर्थव्यवस्था को समृद्ध होने के लिए उनकी कृपा अनिवार्य है।

- देवदत्त पटनायक, प्राचीन भारतीय धर्मशास्त्रों के आख्यानकर्ता और लेखक

खबरें और भी हैं...