रसरंग में मायथोलॉजी:राधा के प्रति किसका कैसा नज़रिया, यह हर भक्त पर निर्भर

देवदत्त पटनायक22 दिन पहले
  • कॉपी लिंक
बरसाना स्थित राधा रानी मंदिर जो राधा को समर्पित है। - Dainik Bhaskar
बरसाना स्थित राधा रानी मंदिर जो राधा को समर्पित है।

'क्या आप जानती हों कि मैंने कालिया को अपने पैरों से क्यों कुचला?/ क्योंकि उसने अपनी पूंछ के साथ आपके बालों की चोटी की बराबरी करने की हिम्मत की / और मैंने कंस का धनुष क्यों तोड़ा?/ क्योंकि धनुष ने आपकी भौंहों की बराबरी करने की कोशिश की / मैंने अपनी कनिष्ठिका से गोवर्धन पर्वत को क्यों उखाड़ा?/ क्योंकि उसने अपने शिखर के साथ आपके शरीर की बराबरी करने की हिम्मत की।'

तेलुगु में लिखे गए ये शब्द कथित रूप से कृष्ण ने राधा से कहे। 18वीं सदी में तंजावुर में प्रसिद्ध मराठा राजा प्रतापसिंह का राज था। उनके दरबार में तंजनायकी नामक एक अत्यंत प्रतिभाशाली गणिका थी। उपरोक्त शब्द तंजनायकी की पोती मुद्दुपलनी द्वारा लिखे गए 'राधिका संत्वनमु' नामक संग्रह में पाए जाते हैं।

20वीं सदी की शुरुआत में एक और प्रसिद्ध गणिका बंगलौर नागरत्नम्मा ने इस संग्रह को फिर से प्रकाशित किया। उन्होंने ही संगीतकार-संत त्यागराज के सम्मान में कर्नाटिक संगीत समारोह की शुरुआत की थी। उनके संस्करण पर प्रतिबंध लगा दिया गया क्योंकि उसमें कामुकता पर स्पष्ट बातें की गई थीं और ख़ासकर इसलिए भी कि उस समय के पुरुष महिला रचियताओं को ‘चरित्रहीन’ समझते थे। उन संस्करणों को प्राथमिकता दी गई जिनमें ग़ैर-कामुक भक्ति और प्रेम कविताएं थीं।

गीतों के इस संग्रह में राधा, जो तब मध्यवय की थीं, अपनी भतीजी ईला-देवी को कृष्ण की दुल्हन बनने की सलाह देती हैं। किसी युवती के साथ सौम्य व्यवहार कैसे करना चाहिए, इसकी सलाह भी वे कृष्ण को देती हैं।

ईला और कृष्ण को एक साथ देखकर राधा अपने प्रेम के लिए तरसती हैं। एक तोता राधा को बताता है कि कैसे ईला कोशिश करती है कि कृष्ण राधा को पूरी तरह भूल जाए। इसे राधा का दिल टूट जाता है। उन्हें लगता है कि कृष्ण ने उन्हें त्याग दिया है। लेकिन कृष्ण राधा के पास लौटकर उन्हें मनाते हैं और कहते हैं कि वे केवल उनसे ही सच्चा प्रेम करते हैं।

12वीं सदी में जयदेव ने गीत गोविंद लिखा। इसके बाद राधा और कृष्ण के रिश्ते पर चर्चा होती रही। दो प्रमुख विचारधाराएं उभरीं : स्वकीय, जिसके अनुसार राधा कृष्ण की पत्नी थीं और परकीय, जिसके अनुसार राधा उनकी पत्नी नहीं थीं। चंडीदास और विद्यापति जैसे कवियों ने अक्सर परकीय विचारधारा का समर्थन किया। वे मानते थे कि जो प्रेम नियम या प्रथा से बंधा नहीं होता, वही सच्चा प्रेम होता है।

अधिक सांकेतिक विचारधाराएं मुख्यधारा का हिस्सा बन गईं। अधिक स्पष्ट विचारधाराएं बाउल और सहजिया जैसे गुप्त और परिधीय आंदोलनों का हिस्सा बन गईं, जिनमें राधा को अपनी स्वतंत्रता के लिए बहुत सम्मान दिया जाता था।

कृष्ण विवाह के माध्यम से रुक्मिणी से और विवाह के बाहर वे राधा से बंधे थे। वैसे ही इन विचारधाराओं ने राधा को देवी माना, जो विवाह के बाहर कृष्ण से और विवाह के माध्यम से अयाना (विभिन्न लेखनों में इनका नाम भिन्न है) से बंधी हुई थीं। यदि हम विवाह का शाब्दिक अर्थ लें तो हमारी शुद्धतावादी भावना को ठेस पहुंच सकती है। या हम विवाह को सामाजिक रीति-रिवाज़ों का रूपक मान सकते हैं, जो हमारा व्यवहार निर्धारित करते हैं और हमें सहज और ख़ुद के प्रति सच्चा बनने से रोकते हैं।

राधा को कैसे देखना है, यह हर भक्त पर निर्भर है: जैसे मुद्दुपलनी ने देखा, जैसे स्वकीयों ने देखा, जैसे परकीयों ने देखा या जैसे सहजियों ने देखा। यह राधा के बारे में कुछ नहीं कहता, बल्कि जीवन और समाज के प्रति हमारे दृष्टिकोण के बारे में बहुत कुछ कह जाता है।

खबरें और भी हैं...