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रसरंग में मायथोलॉजी:वेदों को आज भी सनातन क्यों माना जाता है?

देवदत्त पटनायक16 दिन पहले
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दुनिया भर के विश्वविद्यालयों में यह बात अंतर्निहित रूप से स्वीकार की जाती है कि मानव संस्कृति आदिम से परिष्कृत की ओर बढ़ रही है। देखा जाए तो यह अब्राहमी पौराणिक कथाओं में वर्णित ‘प्रॉमिस्ड लैंड’ की ओर बढ़ने के समान है। लेकिन ये पौराणिक कथाएं किस विकास की बात कर रही हैं - मनोवैज्ञानिक या तकनीकी?

आधुनिक काल को औपनिवेशिक और औद्योगिक काल से बेहतर माना जाता है, जो ईसाई जगत के सामंती काल से भी बहुत बेहतर है। सामंती काल उससे पहले आए ग़ैर-अब्राहमी काल से बेहतर माना जाता है। पश्चिमी देशों में इसी तरह से इतिहास पढ़ाया जाता है, क्योंकि हमारे आज के कानून और तकनीक पहले से बेहतर हैं, इसलिए हमारा वर्तमान हमारे अतीत से बेहतर है।

यही दृष्टिकोण भारत पर भी लागू किया जाता है। 4,000 साल पुराने वेद 3,000 साल पुराने उपनिषदों से कम परिष्कृत हैं। उपनिषद 2,000 साल पुराने पुराणों से कम परिष्कृत हैं। और पुराण 1,000 साल पुरानी भक्ति परंपरा से कम परिष्कृत हैं। इस दृष्टिकोण के अनुसार हिंदू इतिहास में भगवान् की धारणा ‘विकसित’ होती जाती है। इसे और परिष्कृत किए जाने की आवश्यकता है।

लेकिन हिंदू धर्म को समझने का एक और दृष्टिकोण भी है। आइए इसे हम हिंदू दृष्टिकोण कहते हैं और वह यह है कि विभिन्न हिंदू ग्रंथ लोगों तक एक ही विचार को बेहतर रूप से पहुंचाने की कोशिश करते आए हैं। वेदों से लेकर उपनिषदों तक और पुराणों से लेकर भक्ति काव्य तक, हम देख सकते हैं कि एक ही वैदिक विचार को बदलते संदर्भों के लिए उचित और सार्थक तरीक़ों से व्यक्त करने का संघर्ष हो रहा है। तकनीक, कानून और अभिव्यक्ति भले ही बदलती जाए, लेकिन केंद्रीय वैदिक विचार नहीं बदलता है।

वैदिक विचार ‘ह्यूमन कंडीशन’ से संबंधित है, अर्थात हम अपने आस-पास की दुनिया को कैसे समझते हैं और उसके प्रति हमारी क्या प्रतिक्रिया है। वैदिक विचार मानवीय भूख और भय से संबंधित है। वह मानव मनोविज्ञान से संबंधित है। एक साथ रहने के नए तरीक़े विकसित करने और अपने आसपास के वातावरण को नियंत्रित करने के नए तरीक़े खोजने पर भी हमारा मनोविज्ञान नहीं बदला है। 5,000 साल पहले की हमारी भूख और भय आज भी वैसे ही हैं। हम आज भी उतने ही लालची और ईर्ष्यालु हैं जितने हम 5,000 साल पहले थे। परिवहन का ज़रिया चाहे रथ हो या हवाई जहाज़, चीज़ों के लिए हमारी लालसा वैसी ही है और चीज़ें ना मिलने पर हमारी पीड़ा भी।

पश्चिमी विद्वानों का तर्क है कि आधुनिक विचारों की मदद से हम अतीत को समझने की कोशिश कर रहे हैं। उनके अनुसार तकनीक में परिष्करण के साथ बुद्धि में भी परिष्करण होता जाता है। तत्वों पर नियंत्रण बढ़ने से हमारा दिमाग भी विकसित होते जाता है। इस मान्यता का निरीक्षण करना आवश्यक है, क्योंकि यह विज्ञान के लिए उतना ही खतरनाक है जितना कि गैलीलियो के खिलाफ ईसाइयों की निषेधाज्ञा खतरनाक थी। इसके अनुसार अतीत के मनुष्य वर्तमान के मनुष्यों की तुलना में ‘ह्यूमन कंडीशन’ को कम समझते थे।

वेदों की समय के साथ बदलती और विकसित होती हुई मानव तकनीक में कोई दिलचस्पी नहीं है। वे हमारे आस-पास की दुनिया के प्रति मानवीय प्रतिक्रिया में रुचि रखते हैं, जो कानून और तकनीक से परे हैं और जो अनंतकाल से बदले नहीं हैं। इसीलिए वेदों को सनातन धर्म कहा जाता है।

हिंदू संत बनाम पश्चिमी दार्शनिक

पाश्चात्य देश भौतिक और सामाजिक तरक़्क़ी को असली तरक़्क़ी मानते हैं। लेकिन हिंदू दृष्टिकोण में असली तरक़्क़ी मनोवैज्ञानिक (अर्थात आध्यात्मिक) होती है। भौतिक और सामाजिक तरक़्क़ी से कई लोगों को लाभ मिल सकता है, भले ही वे मनोवैज्ञानिक रूप से न बदलें। उधर मनोवैज्ञानिक तरक़्क़ी व्यक्तिगत स्तर पर अत्यंत लाभदायक होती है। यह तरक़्क़ी भले ही पूरी दुनिया को न बदलें लेकिन आसपास के रिश्तों में सुधार अवश्य लाती है। हिंदू संत मानते हैं कि दुनिया को बदलना भ्रमपूर्ण है, लेकिन ख़ुद को बदलना अधिक वास्तविक है। पश्चिमी दार्शनिक मानते हैं कि दुनिया को बदलना अधिक सार्थक है, क्योंकि व्यक्तिगत परिवर्तन से दुनिया में बदलाव नहीं आते।

- देवदत्त पटनायक प्राचीन भारतीय धर्मशास्त्रों के आख्यानकर्ता और लेखक हैं।

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