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रसरंग में चिंतन:सच्चाई के धरातल पर रहना मुश्किल क्यों हो गया है?

गुणवंत शाह4 दिन पहले
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हमारी अखंड सौभाग्यवती किडनी अब डायलिसिस की शरण में पहुंच गई। अब तो आई बैंक, त्वचा बैंक, लिवर बैंक तक तैयार हो गए, साथ ही प्रजनन के अवयवों की दुकानें भी खुल गईं।

आभासी वास्तविकता यानी वर्चुअल रियलिटी जीवन में जब प्रवेश करती है, तब आप किसी एक्ट्रेस के साथ बैठकर उसकी तरह मुस्करा सकते हैं। आपको सुखी होना है, तो केवल एक ही काम करो - हमेशा-हमेशा के लिए झूठ के संसार में रहना शुरू कर दो। जीवन यानी क्या? जीवन यानी भ्रम के संसार का फूलदान। भ्रम सुखदायिनी है। वास्तविकता बहुत ही दुखदायी है। सच्चाई के धरातल पर अधिक समय तक रहना मुश्किल होता है।

वैज्ञानिक आजकल दार्शनिक चर्चा कर रहे हैं। किसका महत्व अधिक है? उपकरणों का उपयोग करने वाले इंसान का या इंसान का उपयोग करने वाला उपकरणों का? डेनियल बेल नामक विचारक ने टेक्नोलॉजी को तेजी से बढ़ने वाली मानवीय कल्पना की कसरत निरूपित किया है। कार्ल मार्क्स ने टेक्नोलॉजी को आदर्श समाज व्यवस्था (यूरोपिया) बताया है। आज टेक्नोलॉजी हमारे सपने को सहलाती-दुलारती है। कुछ साल बाद ही हम देखेंगे कि हमारे आसपास ही सड़क किनारे छोटे से कमरे में बने ऑफिस में कोई बुजुर्ग व्यक्ति चंद्र या मंगल के लिए अंतरिक्ष यात्रा की काॅमर्शियल एडवांस बुकिंग कर रहा होगा।

सुखी होने की चाहत का झरना अनजाना होता है। सभी नदी को पहचानते हैं, पर झरने का कोई नाम नहीं होता। मित्रता की चाहत ही इंसान को जिंदा रखती है। मैत्री स्वाभाविक रूप से धर्मनिरपेक्ष होती है। भगवान बुद्ध ने ब्रह्मविहार के चार सोपान बताए हैं - मैत्री, करुणा, मुदिता और उपेक्षा। सारांश में कहा जाए तो तथागत ने ब्रह्मविहार को पहले सोपान में रखकर उसका आदर ही किया है। मोबाइल फोन आज की मैत्री भावना का पवित्र खिलौना है। जब सारी राष्ट्रीय सीमाएं टूट जाती हैं, तब मैत्री भाव का पवित्र झरना हवा में बहने लगता है। झरने को कभी किसी सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता।

कई बार मैत्री भी किसी कवि की कविता में अमर होकर परिंदे की तरह घायल हो जाती है। घायल मानव हृदय को पृथ्वी पर स्थित परोक्ष मंदिर माना जा सकता है। घायल हृदय की अंतहीन पीड़ा को ही शायर "दर्द" की संज्ञा देते हैं। हर शायर स्वभावत: दर्द का शहजादा ही होता है। उसकी शायरी तो घायल हृदय का प्रसाद है।

महान दार्शनिक गुरजिएफ के पिता भी अपने पुत्र से कम नहीं थे। उदारमना पिता की समाधि पर उत्कीर्ण शब्द हैं:-

मैं जो हूं, वही तुम हो

तुम जो हो, वही मैं हूं।

वह हमारा है, हम उसके हैं

इसलिए हम सब पड़ोसी बनकर रहें।

हम जैसे साधारण लोगों के जीवन में तो एक फिल्मी पंक्ति भी प्रेरणादायी हो सकती है- आप जैसा कोई मेरी जिंदगी में आए, तो बात बन जाए। मित्रता के पवित्र झरने को शत्रुता के अपवित्र पोखर से बचाने का समय आ चुका है।

तथागत ही दे सकते थे ऐसा जवाब...

महाभिनिष्क्रमण के बाद वर्षों बीत गए। पत्नी यशोधरा भी बौद्ध संघ में शामिल होकर भिक्षुणी बन गईं। एक बार विश्राम के पलों में यशोधरा ने तथागत से प्रश्न किया- भगवन! आपकी साधना के दौरान क्या आप मेरा स्मरण करते थे? तथागत का उत्तर समझने लायक है। वे बोले- हे! यशोधरा, तुम मुझे याद आती थी, जब शरद पूर्णिमा की रात को चंद्र की शीतल किरणें नदी के स्वच्छ जल पर परावर्तित होती थीं। उस समय बने चमकीले बिम्ब से होकर तुम गुजरती थी, सफेद पाल की नाव की तरह तुम मेरे हृदय से गुजर जाती थी।

ऐसा उत्तर तथागत के अलावा और कौन दे सकता है?

- गुणवंत शाह, पद्मश्री से सम्मानित वरिष्ठ लेखक, साहित्यकार और विचारक

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