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मायथोलॉजी:अर्द्धनारीश्वर भी क्यों कहलाते हैं शिव?

3 महीने पहलेलेखक: देवदत्त पटनायक
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हिमाचल प्रदेश के मंडी में स्थित अर्द्धनारीश्वर मंदिर। इसे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित किया गया है। (फोटो साभार : अरण्या कार) - Dainik Bhaskar
हिमाचल प्रदेश के मंडी में स्थित अर्द्धनारीश्वर मंदिर। इसे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित किया गया है। (फोटो साभार : अरण्या कार)

शिव अर्द्धनारीश्वर हैं। अक्सर माना जाता है कि यह छवि समानता का प्रतीक है। लेकिन इस छवि का ताल्लुक समानता से भी ज़्यादा तटस्थ विचारों के निरूपण से है।

हिंदू पौराणिक शास्त्र में भगवान उस मानवीय कल्पना का प्रतीक है जो या तो स्वतंत्र शिव के रूप में पूजे जा सकते हैं या भरोसेमंद विष्णु के रूप में। उधर देवी प्रकृति का प्रतीक है। मानवीय कल्पना को प्रकृति की ज़रूरत है, लेकिन इसका विपरीत सच नहीं है। इसलिए भगवान या ईश्वर का आधा भाग देवी में बदलता है, लेकिन देवी का आधा भाग कभी देव में नहीं बदलता। अर्द्धनारीश्वर की प्रतिमाओं की तुलना में उनकी कहानियां कम पाई जाती हैं। ऐसी दो कहानियां मैं साझा कर रहा हूं :

लिंग पुराण के अनुसार सृष्टि की शुरुआत में एक कमल खिला। उसके अंदर ब्रह्मा बैठे थे। जागरूक होने पर उन्हें अकेलापन महसूस हुआ। लेकिन वे इस प्रश्न में उलझ गए कि किसी का साथ पाने के लिए किसी और जीव का निर्माण कैसे कर सकते हैं। अचानक उन्हें अपनी आंखों के सामने शिव का आभास हुआ। शिव का दाहिना हिस्सा पुरुष का था और बायां हिस्सा स्त्री का। इससे प्रेरित होकर ब्रह्मा ने अपने आप को दो हिस्सों में बांट दिया। दाएं हिस्से से सभी पुरुष जीव आए और बाएं हिस्से से स्त्री जीव।

नाथ जोगियों की मौखिक परंपरा में कहते हैं कि जब वे (जोगी) शिवजी से मिलने कैलाश पर्वत पर गए, तब यह देखकर हैरान रह गए कि शिव पार्वती के साथ आलिंगन में इतने तल्लीन थे कि उन्होंने जोगियों की ओर ध्यान तक नहीं दिया। फिर वे समझ गए कि शिव और पार्वती के आलिंगन को रोकना शरीर के दाएं हिस्से को बाएं हिस्से से अलग करने जैसा होगा। इसलिए उन्होंने शिव को प्रणाम कर उन्हें अर्द्धनारीश्वर के रूप में कल्पित किया।

दक्षिण भारत के मंदिरों में शिव की ओर स्नेह से देखता हुआ भृंगी नामक व्यक्ति दिखाई देता है। भृंगी शिव के दूसरे उपासकों से अलग है - वह दुर्बल है। दरअसल उसकी सिर्फ़ हड्डियां नजर आती हैं और उसके दो नहीं, बल्कि तीन पैर हैं। कहते हैं कि भृंगी शिव का परम भक्त था। एक दिन कैलाश पर्वत पर आकर उसने शिव की प्रदक्षिणा करने की इच्छा व्यक्त की। इस पर पार्वती ने कहा कि भृंगी उनके इर्द-गिर्द भी जाए। लेकिन भृंगी तो शिव से इतना मोहित था कि उसे पार्वती के इर्द-गिर्द घूमने की कोई इच्छा नहीं हुई। इसे देखकर पार्वती शिव की गोद में जा बैठीं और इस वजह से भृंगी अब दोनों के इर्द-गिर्द जाने को मजबूर था। लेकिन उसे तो सिर्फ़ शिव की प्रदक्षिणा करनी थी, इसलिए उसने अब सांप का रूप धारण कर शिव और पार्वती के बीच से खिसकने की कोशिश की।

शिव को यह मज़ेदार लगा और पार्वती को अपने शरीर का आधा हिस्सा बनाकर वे अर्द्धनारीश्वर में बदल गए। लेकिन भृंगी ने अपनी हठ नहीं छोड़ी। वह कभी चूहे और कभी मधुमक्खी का रूप लेकर शिव व पार्वती के बीच से जाने की कोशिश करता। इससे पार्वती इतनी चिढ़ गईं कि उन्होंने भृंगी को श्राप दे दिया कि वह अपनी मां से मिले शरीर के सभी भाग खो देगा। भृंगी के शरीर से तुरंत मांस और खून गायब हो गया। सिर्फ़ हड्डियां बच गईं। वह ज़मीन पर ढेर हो गया।

तब भृंगी पर तरस खाकर शिवजी ने उसे एक तीसरा पैर दे दिया, ताकि वह तिपाई की तरह खड़ा हो सके। यह घटना दर्शाती है कि ईश्वर के स्त्रैण भाग को ना पूजने का क्या खामियाजा भुगतना पड़ता है।

वहीं, उत्तर भारत के पहाड़ी इलाक़ों की एक लोककथा के अनुसार जब पार्वतीजी ने गंगा को शिवजी के सिर पर देखा तो वे बहुत क्रोधित हो गईं। उन्होंने सोचा कि उनके होते हुए शिव अपने सिर पर किसी और स्त्री को कैसे रख सकते हैं। तब उन्हें शांत करने के लिए शिवजी ने दोनों का शरीर एक कर दिया और इस तरह वे अर्द्धनारीश्वर बन गए।

(देवदत्त पटनायक प्राचीन भारतीय धर्मशास्त्रों के आख्यानकर्ता और लेखक हैं। )

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