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शेयर बाज़ार:बढ़त से आम आदमी को भी क्यों खुश होना चाहिए?

अजीत कुमार3 महीने पहले
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लॉकडाउन की शुरुआत के समय यानी पिछले साल मार्च में आई भारी गिरावट के बाद से भारतीय शेयर बाजार में तेज रिकवरी देखी गई है। मार्च के निम्नतम स्तर (24 मार्च - सेंसेक्स : 25,638, निफ्टी : 7,511) से सेंसेक्स व निफ्टी में 90 फीसदी से ज्यादा का उछाल आ चुका है। सेंसेक्स तो 50 हजार के मार्क को भी छू आया है, जबकि निफ्टी भी 15 हजार के आस-पास पहुंच गया है। हालांकि अब भी देश में केवल 9 से 10 करोड़ खुदरा निवेशक ही या तो डीमैट व ट्रेडिंग अकाउंट से अथवा म्यूचुअल फंड के जरिए शेयर बाजार में निवेश कर रहे हैं जो कुल आबादी का महज 7-8 फीसदी ही है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि अगर आबादी का इतना छोटा-सा हिस्सा ही सीधे शेयर बाजार से जुड़ा है तो फिर शेयर बाजार के गिरने या उठने से देश की अर्थव्यवस्था या आम आदमी को इतना फर्क क्यों पड़ना चाहिए? और क्यों हमें हमेशा शेयर बाजार में तेेजी की ही कामना करनी चाहिए? जानते हैं यहां कुछ प्रमुख वजहें :

1. कारोबार का विस्तार होगा, बढ़ेंगे रोजगार के अवसर

शेयर बाजार से फिलहाल तकरीबन 7,500 कंपनियां जुड़ी हुई हैं (बीएसई में 5,442 कंपनियां जबकि एनएसई में 1,959 कंपनियां लिस्टेड हैं)। इनमें से कई कंपनियां दोनों एक्सचेंज पर लिस्टेड हैं। ये कंपनियां शेयर बाजार के जरिए (आईपीओ, एफपीओ, राइट्स इश्यू वगैरह के जरिए) फंड जुटाती हैं और उसी फंड से वे अपने कारोबार में विस्तार करती हैं। लेकिन फंड जुटाना आसान और फायदे का सौदा तब होता है, जब शेयर बाजार में तेजी होती है। जब एक कंपनी अपना कारोबार बढ़ाती है तो इस पर निर्भर अन्य कंपनियों को भी विस्तार का मौका मिलता है। कारोबार विस्तार का मतलब है बड़ी संख्या में रोजगार का सृजन। कंपनियों के विस्तार और प्रॉफिट बढ़ने से सरकार को भी ज्यादा राजस्व की प्राप्ति (कॉरपोरेट टैक्स के रूप में) होती है। बाजार में तेजी होने पर सरकार को सिक्योरिटी ट्रांजैक्शन टैक्स (एसटीटी), कैपिटल गेन टैक्स वगैरह से मिलने वाले राजस्व में भी बढ़ोतरी होती है। जाहिर है इसका पूरा असर अर्थव्यवस्था पर और अंतत: आम लोगों पर पड़ता है। जब शेयर बाजार में तेजी होती है, तब फाइनेंशियल मार्केट सेक्टर में भी रोजगार के अवसर बढ़ते हैं। इसके विपरीत जब शेयर बाजार लगातार गिरता है तो कंपनियों के लिए फंड जुटाना आसान नहीं रहता। परिणामस्वरूप कंपनियों को निवेश आकर्षित करने में, कर्ज अदायगी में दिक्कत होने लगती है। कंपनियों के अधिग्रहण और विलय पर असर पड़ता है। विस्तार रुक जाता है। छंटनी और कर्मचारियों के वेतन में कटौती होने लगती है जो अर्थव्यवस्था के लिए घातक साबित होता है।

2. ईपीएफ ब्याज पर भी पड़ता है असर

प्रत्येक नौकरीपेशा व्यक्ति (चाहे वह सरकारी हो या गैर सरकारी), ईपीएफ यानी कर्मचारी भविष्य निधि में योगदान देता है। जिस कंपनी में 20 से अधिक कर्मचारी कार्यरत हैं, उसका पंजीकरण ईपीएफओ में होना अनिवार्य है। देश में फिलहाल 6 करोड़ से ज्यादा एक्टिव ईपीएफ खाताधारक हैं। इस फंड को मैनेज करने वाला संगठन यानी ईपीएफओ अपने एनुअल कॉर्पस का 15 फीसदी हिस्सा शेयर बाजार में एक्सचेंज ट्रेडेड फंड के जरिए निवेश करता है। इसलिए अगर शेयर बाजार चढ़ता है तो इसका असर ईपीएफओ के कॉर्पस (फंड) पर भी पड़ता है। अगर ईपीएफओ के पास ज्यादा कॉर्पस होगा तो वह अपने सदस्यों को ज्यादा सुविधाएं दे सकेगा। कॉर्पस कम या ज्यादा होने का सबसे ज्यादा असर ब्याज पर पड़ता है। वित्त वर्ष 2019-20 में ईपीएफओ को 1.03 लाख करोड़ के इक्विटी में निवेश पर 8.3 % का नुकसान उठाना पड़ा था। इसीलिए ईपीएफओ को सदस्यों के लिए ब्याज की राशि घटाकर 8.50 % करनी पड़ी, जो पिछले सात सालों में सबसे कम है।

3. जितनी होगी तेजी, उतनी बढ़ेगी एनपीएस खाताधारकों की पेंशन

केंद्र सरकार ने 1 जनवरी 2004 को नेशनल पेंशन सिस्टम (एनपीएस) लॉन्च की थी। इस तारीख या इसके बाद ज्वॉइन करने वाले सभी सरकारी कर्मचारियों के लिए यह योजना अनिवार्य है। 1 मई 2009 से यह निजी क्षेत्र में काम करने वाले लोगों सहित सभी नागरिकों के लिए भी स्वैच्छिक आधार पर उपलब्ध है। दिसंबर 2020 तक देश में करीब 1.40 करोड़ एनपीएस खाताधारक थे। चूंकि यह स्कीम मार्केट लिंक्ड है, इसलिए सब्सक्राइबर के कॉर्पस (फंड) का एक बड़ा हिस्सा शेयर बाजार में निवेश किया जाता है। सरकारी कर्मचारी अपने कॉर्पस का अधिकतम 50 फीसदी, जबकि गैर सरकारी कर्मचारी 75 फीसदी तक इक्विटी में निवेश कर सकते हैं। इसलिए शेयर बाजार जितना ऊपर जाएगा, एनपीएस खाताधारकों के कॉर्पस पर रिटर्न उतना ज्यादा मिलेगा और रिटायरमेंट के बाद मैच्योरिटी अमाउंट ज्यादा होगा। वैसे एनपीएस खाताधारक जो अभी रिटायरमेंट के नजदीक हैं, उनको तो शेयर बाजार में तेजी से फायदा ज्यादा ही होगा।

4. निवेशक जितना कमाएंगे अर्थव्यवस्था में उतनी बढ़ेगी मांग

जब शेयर बाजार में तेजी होती है, तब इससे सीधे जुड़े निवेशकों (शेयरधारकों) की आमदनी में बढ़ोतरी होती है। आमदनी ज्यादा होने पर यह स्वाभाविक ही है कि वे और ज्यादा खर्च करते हैं। इस तरह से इकोनॉमी में व्यक्तिगत मांग (प्राइवेट डिमांड) बढ़ जाती है, जिसका फायदा न केवल शेयर बाजार में सूचीबद्ध कंपनियों को होता है, बल्कि जो सूचीबद्ध नहीं हैं यानी सामान्य रूप से कार्यरत व्यापारियों और सेवा प्रदाताओं सभी को होता है। वे अतिरिक्त मांग को पूरा करने के लिए अपने कारोबार/उत्पादन क्षमता को बढ़ाते हैं, जिससे बिजनेस डिमांड में भी तेजी आती है और अर्थव्यवस्था का पहिया और भी तेज गति से घूमने लगता है।

5. आयातित सामान के सस्ते-महंगे होने से सीधा संबंध

शेयर बाजार में बड़ी तेजी तब आती है, जब विदेशी संस्थागत निवेशक भारतीय बाजार में पैसा लगाते हैं। इससे रुपया मजबूत होने लगता है। जब भी रुपया मजबूत होता है, तो आयातित सामान जैसे कार, स्मार्टफोन, कंप्यूटर्स की कीमतें घट जाती हैं। भारत में ही बनने वाले कई जरूरी सामान के लिए भी कच्चा माल और कलपुर्जे विदेशों से आते हैं। इन सबकी कीमत घटने से हमारे यहां उत्पादित सामान जैसे दवाइयां, उर्वरक आदि के दाम नीचे आ जाते हैं जिससे आम लोगों से लेकर किसान तक सभी को फायदा होता है।

शेयर बाजार में तेजी, मगर अर्थव्यवस्था अभी भी लचर ...

अर्थव्यवस्था से संबंधित ज्यादातर इंडिकेटर्स इसी बात की ओर इशारा कर रहे हैं कि घरेलू अर्थव्यवस्था अभी भी मंदी के दौर में ही है। सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के प्रथम अग्रिम अनुमान के मुताबिक:

-पिछले साल (2019-20) के 4.2 फीसदी ग्रोथ के मुकाबले वित्त वर्ष 2020-21 में जीडीपी में 7.7 फीसदी निगेटिव ग्रोथ का अनुमान है, 1952 के बाद सबसे बड़ी गिरावट है।

- सीएमआईई के मुताबिक लॉकडाउन की वजह से नौकरी गंवाने वालों की संख्या दिसंबर 2020 तक 1.89 करोड़ तक पहुंच गई है।

-ईपीएफओ ने 31 दिसंबर 2020 तक कोविड-19 से संबंधित 56.79 लाख एडवांस क्लेम का निपटारा किया है। इससे इस बात का अंदाजा मिलता है कि संगठित क्षे़त्र में काम करने वाले लोगों पर लॉकडाउन का कितना असर पड़ा है।

(लेखक पर्सनल फाइनेंस एक्सपर्ट हैं।)

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