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रसरंग में कवर स्टोरी:3 सवालों में उलझी वुहान वायरस लीक थ्योरी

डाॅ. रहीस सिंह13 दिन पहले
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कड़ी सुरक्षा व्यवस्था में चीन के वुहान स्थित वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी।   कोरोना वायरस के लीक होने संबंधी आरोपों के चलते यह इंस्टीट्यूट इस समय विवादों में है। - Dainik Bhaskar
कड़ी सुरक्षा व्यवस्था में चीन के वुहान स्थित वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी। कोरोना वायरस के लीक होने संबंधी आरोपों के चलते यह इंस्टीट्यूट इस समय विवादों में है।

विश्व व्यवस्था जब-जब संक्रमण से गुजरी है, दुनिया की कुछ ताकतें उसमें नए स्पेस निर्मित करने और स्वयं को विजयी बनाने के लिए तरह-तरह के खेल खेलती रही हैं, जो प्रायः मानवता के विरुद्ध सिद्ध हुए। इतिहास ने इसे बार-बार दोहराया है। तो क्या वॉशिंगटन-बीजिंग के बीच कोरोना वायरस के वुहान लीक थ्योरी पर चल रहा टकराव इतिहास दोहराने के लिए विवश करेगा? हालांकि वायरस लीक को लेकर जितने शोध और अध्ययन आ रहे हैं, सभी चीन के दोषी होने की संभावनाएं व्यक्त करते हैं, लेकिन अभी किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जा सकता है। फिर भी यह शंका प्रबल हो रही है कि वुहान वायरस लीक थ्योरी निष्कर्ष तक पहुंचते-पहुंचते किसी युद्ध या शीतयुद्ध से दुनिया का साक्षात्कार न करा दे। यहां ऐसे में तीन अहम सवाल उठ रहे हैं :

पहला सवाल...
अमेरिका ने फिर से जांच क्यों शुरू की?

अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने वुहान वायरस लीक के सच का पता लगाने के लिए अपनी खुफिया एजेंसी को 90 दिन का समय दिया है। क्या 90 दिन का कोई विशिष्ट मतलब है या फिर यह सामान्य कार्य शैली का हिस्सा है? राष्ट्रपति बाइडन ने पद संभालने के बाद ट्रंपकालीन जांच पर रोक लगा थी, इसका संदेश बेहद गलत गया था। शायद अब वे इस गलती को सुधारना चाहते हैं। इसका सबसे बड़ा रणनीतिक पहलू यह लगता है कि बाइडेन 90 दिन की अवधि निर्धारित कर यह संदेश देना चाहते हैं कि अमेरिकी प्रशासन दुनिया की चिंताओं के प्रति बेहद संवेदनशील है और अमेरिका मानवीय हितों के लिए चीन के खिलाफ किसी भी हद तक जा सकता है। संभवतः इसके जरिए वे वुहान लीक थ्योरी पर पनप रहे चीन विरोधी सिंड्रोम का इस्तेमाल चीन के विरुद्ध एक हथियार के रूप में करना चाहते हैं। इसके अलावा सहयोगी देशों द्वारा वुहान लीक थ्योरी की जांच की मांग पर इस तरह का निर्णय नई एकजुटता का आधार बन सकता है। चूंकि अमेरिका इस मामले में पिछले चार वर्षों से कमजोर पड़ता दिख रहा है। इसलिए बाइडेन इस अवसर को हर हाल में भुनाना चाह रहे हैं।

दूसरा सवाल ...
क्या चीन जैविक युद्ध की तैयारी कर रहा है?

वाॅल स्ट्रीट जर्नल से पहले ही वीकेंड ऑस्ट्रेलियन में प्रकाशित एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि चीन ने 2015 से ही सार्स कोरोना वायरस को जैविक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने संबंधी संभावनाओं को तलाशना शुरू कर दिया था। ‘अननैचुरल ओरिजन ऑफ सॉर्स एंड न्यू स्पेसीज ऑफ मैनमेड वायरस’ वाले शीर्षक से छपी इस रिपोर्ट में चीन की वैश्विक महत्वाकांक्षाओं को स्पष्ट करते हुए बताया गया है कि चीन के वैज्ञानिक और उसकी सेना जिन जैविक हथियारों पर विश्वसनीयता के साथ भरोसा कर सकती है, उनमें कोरोना वायरस हो सकता है। इस रिपोर्ट में जो साक्ष्य पेश किए किए हैं, उनके अनुसार चीन तीसरे विश्व युद्ध की तैयारी कर रहा है जो बायोलॉजिकल और जेनेटिक हथियारों से लड़ा जाएगा। वैसे चीन के लिए कुछ भी नहीं कहा जा सकता। वह वास्तव में न ही लोकतंत्र की मर्यादाओं मंे बंधा है और न नैतिकता की। उसे कई अवसरों पर मानवीय हितों के परे जाकर काम करते हुए देखा गया है। इसलिए उस पर लग रहे आरोपों को सिरे खारिज तो नहीं किया जा सकता है। फिर भी अभी इस निष्कर्ष को स्वीकार करना मुश्किल है कि चीन तीसरे विश्वयुद्ध की तैयारी में है क्योंकि इसके बाद चीन भी और उसकी अर्थव्यवस्था भी खत्म हो जाएगी।

तीसरा सवाल...

क्या न्यूयाॅर्क-वुहान के बीच भी कनेक्शन है?

डोनाल्ड ट्रंप कोरोना वायरस के वुहान लीक मामले में बेहद आक्रामक रहे लेकिन जो बाइडेन के आते ही पिछली जांच रोक दी गई थी। अब जरूर फिर से अपनी खुफिया एजेंसियों को आदेश दिया है कि वे 90 दिनों के अंदर यह पता लगाएं कि कोरोना वायरस कहां से फैला। दरअसल अमेरिकी प्रशासन द्वारा यह कदम ‘वॉल स्ट्रीट जर्नल’ में अमेरिकी इंटेलिजेंस की खुफिया रिपोर्ट के पब्लिश होने के बाद उठाया गया जिसमें कहा गया है कि वर्ष 2019 में वुहान इंस्टीट्यूट आॅफ वायरोलाॅजी की एक लैब के तीन शोधकर्ता सार्स वायरस से संक्रमित हुए थे। चीन ने इसके उलट अमेरिका के खिलाफ ही निशाना साध लिया। उसका कहना है कि फोर्ट डेट्रिक में मौजूद बायोलॉजिकल लैब और दुनिया भर में 200 से ज्यादा बायो-लैब बनाने के पीछे अमेरिका का असल मकसद क्या है, पहले अमेरिका यह बताए क्योंकि इन्हें लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय में चिंता है। ध्यान रहे कि वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी को फंड मुहैया कराने का काम इकोहेल्थ एलायंस ऑफ न्यूयॉर्क (अमेरिका) करता है। यानी न्यूयाॅर्क-वुहान कनेक्शन तो है, लेकिन इसका पूरा सच क्या है, यह अभी आना बाकी है। क्या न्यूयाॅर्क-वुहान कनेक्शन चीन के खिलाफ जांच को तेज करेगा या फिर जांच की औपचारिकता निभाएगा?

सबसे बड़ा सवाल.... क्या अब होगा आगे?

जैसे-जैसे अध्ययन रिपोर्टें आ रही हैं, चीन कठघरे में फंसता जा रहा है और दुनिया जांच का पता लगाने के प्रति गंभीर होती जा रही है। लेकिन सच का पता लगाएगा कौन? कोई वैश्विक संस्था या फिर अमेरिका? वैश्विक संस्थाएं सही अर्थों में तो प्रभावहीन हो चुकी हैं, इसलिए उनसे उम्मीद नहीं की जा सकती। तो क्या अमेरिका जांच करेगा? और क्या चीन उसे ऐसा करने देगा? पहली बात तो यह कि वर्ष 2018 और 2019 में चीन की डाॅ. शी झेंगली को नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एलर्जी एंड इंफेक्शस डिजीज से फंड मिल रहा था। यह अमेरिका के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ का हिस्सा है। डाॅ. शी झेंगली वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी के वैज्ञानिकों की टीम का नेतृत्व कर रही थीं। यानी चीन के एक्सपोज होने से छींटे अमेरिका तक भी पहुंच सकते हैं। फिर तो यह भी संभव है कि अमेरिका जांच की औपचारिकता पूरी करे। दूसरी यह कि यदि चीन रिवर्स इंजीनियरिंग वर्जन से सच छुपाने की कोशिश कर रहा है तो वह किसी भी कीमत पर अमेरिका को जांच नहीं करने देगा।

क्या है कोरोना का वुहान कनेक्शन?

अब तक की पड़ताल और अध्ययनों इस बात के संकेत मिल रहे हैं कि कोरोना वायरस वुहान इंस्टीट्यूट आॅफ वायरोलाॅजी की बीएसएल 2 लैब में बनाया गया और वहीं से लीक हुआ। लेकिन चीन ने इस वायरस को रिवर्स-इंजीनियरिंग वर्जन से छिपाने की कोशिश की जिससे यह लगे कि कोरोना वायरस चमगादड़ से प्राकृतिक रूप से विकसित हुआ है। वैज्ञानिक जर्नल क्वार्टरली रिव्यू आॅफ बायोफिजिक्स डिस्कवरी मंे प्रकाशित शोध अध्ययन भी इसकी पुष्टि करता है। इसमें ब्रिटिश प्रोफेसर एंगस डल्गलिश और नार्वेनियन साइंटिस्ट डाॅ. बिर्गर सोरेनसेन ने उन कड़ियों को जोड़ने में सफलता हासिल की है जो यह बताती हैं कि चीनी विज्ञानियों ने किस तरह से कोरोना वायरस तैयार करने वाले उपकरण बनाए जिसमें कुछ अमेरिकी विश्वविद्यालयों ने भी सहयोग किया। इनका यह भी कहना है कि इसका कोई प्रमाण नहीं है कि नोवेल कोरोना वायरस सार्स-कोव-2 प्राकृतिक रूप से पैदा हुआ है। यह वुहान की लैब में ‘गेन आॅफ फंक्शन’ प्रोजेक्ट पर काम करने वाले चीनी विज्ञानियों द्वारा तैयार किया गया है। उल्लेखनीय है कि शोधकर्ताओं ने कोविड 19 के सैंपल में एक यूनिक फिंगरप्रिंट पाया है जिसके बारे में उन्होंने कहा है कि ऐसा लैब मंे वायरस के साथ छेड़छाड़ करने पर ही संभव हो सकता है।

- डाॅ. रहीस सिंह, विदेश मामलों के विशेषज्ञ

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