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रसरंग में धुनों की यात्रा:‘ये मेरा प्रेम पत्र पढ़कर’... ख़तों के जरिए प्यार की इंतहा लिए सुमधुर गीत

पंकज राग12 दिन पहले
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संगम फिल्म के गीत 'ये मेरा प्रेम पत्र पढ़कर तुम नाराज़ ना होना' में राजेंद्र कुमार और वैजयंती माला। - Dainik Bhaskar
संगम फिल्म के गीत 'ये मेरा प्रेम पत्र पढ़कर तुम नाराज़ ना होना' में राजेंद्र कुमार और वैजयंती माला।

एक ज़माना था जब ख़त ज़िंदगी में प्रेम या रोमांस के प्रचलित माध्यम थे। मुलाकातों पर पाबंदियां थीं तो फिर छुप-छुपाकर खतो-खुतूत का ही सहारा लिया जाता था। खतों/चिट्ठियों के आदान-प्रदान का भाव लिए कई फ़िल्मीं गीत भी कम्पोज़ किए गए और खूब लोकप्रिय भी रहे। आज कुछ ऐसे ही गीतों पर नज़र डालते हैं।

ख़त के माध्यम से नाज़ुक प्रेम उद्गार के गीतों में शायद सबसे खूबसूरत और सबसे मकबूल गीत फ़िल्म 'सरस्वती चंद्र' (1968) के 'फूल तुम्हें भेजा है ख़त में, फूल नहीं मेरा दिल है' (लता, मुकेश) को ही माना जाएगा। गोवर्धनराम माधवराम त्रिपाठी के गुजराती उपन्यास पर आधारित 19वीं सदी के सामंती परिवेश के बीच अवस्थित इस प्रेम कहानी में खतों की महत्वपूर्ण भूमिका थी और निर्देशक गोविंद सरैया चाहते थे कि परिवेश को देखते हुए इसके गीत भी उस ज़माने के हिसाब से मेलोडी प्रधान हों। इंदीवर के लिखे इस गीत में संगीतकार कल्याणजी आनंदजी ने पहाड़ी और मिश्र ख़माज के बड़े कोमल सुर लगाए। इस फ़िल्म के लिए कल्याणजी आनंदजी को 1969 का सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला।

यह भी इत्तफ़ाक है कि ख़त को लेकर कम्पोज़ किया 'हेराफेरी' (1976) का विनोद खन्ना और सुलक्षणा पंडित पर फ़िल्माए और अनजान के लिखे बेहद खूबसूरत गीत 'मुझे प्यार में ख़त किसी ने लिखा है' (आशा) के संगीतकार भी कल्याणजी आनंदजी ही थे। वैसे सुलक्षणा पंडित खुद बहुत अच्छी गायिका थीं, पर हिंदी फ़िल्म जगत की कुछ विसंगतियों और पूर्वाग्रहों की वजह से कई बार उन्हें दूसरी गायिकाओं से प्लेबैक लेना पड़ता था।

कई फ़िल्मी गीतों में ख़तों के माध्यम से प्रेम का बेलौस उल्लास झलकता है। जैसे वसंत देसाई का संगीतबद्ध 'अर्धांगिनी' (1959) का मजरूह सुल्तानपुरी का लिखा और मीना कुमारी पर फ़िल्माया 'तेरा ख़त ले के सनम पाॅव कहीं रखते हैं हम, कहीं पड़ते हैं कदम', लक्ष्मीकांत प्यारेलाल द्वारा स्वरबद्ध 'कच्चे धागे' (1973) का मौसमी चटर्जी पर फ़िल्माया 'हाय हाय एक लड़का मुझको ख़त लिखता है' (लता), 'आए दिन बहार के' (1966) का आशा पारेख पर फ़िल्माया 'ख़त लिख दे साॅवरिया के नाम बाबू' (आशा भोसले) तथा 'शारदा' (1981) का रामेश्वरी पर फ़िल्माया 'आपका ख़त मिला आपका शुक्रिया' (लता) और आर.डी. बर्मन द्वारा संगीतबद्ध व स्मिता पाटिल पर बड़ी अदा से फ़िल्माया 'हमने सनम को ख़त लिखा, ख़त में लिखा... ' (लता) जैसे आनंद बक्शी के लिखे गीत। फ़िल्म 'कन्यादान' (1968) में नीरज के 'लिखे जो ख़त तुझे वो तेरी याद में हज़ारों रंग के नजारे बन गए/सवेरा जब हुआ तो फूल बन गए जो रात आई तो सितारे बन गए' में तो ख़त प्यार और प्रकृति के संगम के रूप में उभरता है। शंकर-जयकिशन का संगीत इस समय तक जै़ज़ के प्रभाव के कारण कुछ लाउड हो चला था, फिर भी मोहम्मद रफ़ी ने शशि कपूर को आवाज़ देते हुए गीत की संवेदना के साथ पूरा न्याय किया है।

बात शंकर-जयकिशन की हो तो हम 'संगम' (1964) का रफ़ी के ही स्वर में हसरत के लिखे और राजेन्द्र कुमार, वैजयंती माला पर फ़िल्माए राग पहाड़ी पर आधारित और उस वर्ष के बिनाका गीतमाला के दूसरे पायदान पर आए युवा वर्ग के पसंदीदा गीत 'ये मेरा प्रेमपत्र पढ़कर कि तुम नाराज़ न होना' को कैसे भूल सकते हैं। कहते हैं कि जयकिशन ने इसी मुखड़े का प्रेमपत्र अपनी होने वाले पत्नी पल्लवी को लिखा था और इसी मुखड़े को हसरत जयपुरी ने विस्तार दिया। शंकर की कम्पोज़ीशन 'दोस्त दोस्त न रहा' हालांकि गुणवत्ता की दृष्टि से बेहतर कम्पोज़ीशन थी, पर वार्षिक बिनाका गीतमाला में इस गीत का स्थान छठा था। लगभग आरम्भ से ही शंकर और जयकिशन अपनी धुनें अलग-अलग बनाते थे, पर उनमें एक समझौता था कि कोई भी सार्वजनिक रूप से यह प्रकट नहीं करेगा कि कौन-सी धुन किसकी थी। लेकिन इस बार जयकिशन ने एक साक्षात्कार में यह स्वीकार लिया कि 'ये मेरा प्रेमपत्र' उनकी कम्पोज़ीशन थी। शंकर ने इसका बहुत बुरा माना और यहीं से शंकर-जयकिशन के संबंधों में दरार की शुरुआत हो गई।

ख़तों की बात हो तो फिर उल्लास नहीं, विरह की बातें भी निहित रहती हैं और ख़तों के ज़रिए प्रियतम को संदेश पहुंचाने की भी। खासकर पुराने गीतों में पत्र के लोकरूप 'पतिया' या 'चिठिया' का ज़िक्र आता है। उदाहरण के तौर पर 'अमर सिंह राठौर' (1957) के 'चिठिया री ओ पतिया री तू बन के सहेली संदेश पिया का पहुंचा देना' (आशा भोसले), 'चकोरी' (1949) के 'चिट्ठियां दर्दभरी चिठियां, मेरी कहियो संदेश तू जा के' (गीता दत्त), 'बंजारिन' (1960) के राग दुर्गा पर आधारित बहुत लोकप्रिय रहे 'चंदा रे मोरी पतियां ले जा, बतियां ले जा, साजन का पहुंचा दे रे' (लता, मुकेश) जैसे गीत ध्यान में आते हैं। बाद की फ़िल्मों में 'अर्थ' (1983) के 'तेरे खुशबू में बसे ख़त में जलाता कैसे' में जगजीत सिंह ने संगीत और गायकी से ख़त को लेकर बने आम गीतों से अलग एक कशिश भरी व्यंजना प्रस्तुत की है। 'दुश्मन' (1998) में आनंद बक्शी के लिखे और उत्तम सिंह द्वारा स्वरबद्ध 'चिट्ठी न कोई संदेश, जानें वो कौन सा देस जहां तुम चले गए' (जगजीत सिंह/लता) तो एक अद्भुत गीत है जो मृत्यु के रूप में दर्द की चरम त्रासदी को अभिव्यक्त करता है। फ़िल्म 'नाम' (1986) के पंकज उधास के गाए 'चिट्ठी आई है वतन से चिट्ठी आई है' में विदेश में रहने वाले भारतीयों की देश की याद तथा 'बॉर्डर' (1997) के 'संदेसे आते हैं हमें तड़पाते हैं, वो चिट्ठी आती है वो पूछे जाती है कि घर कब आओगे' (सोनू निगम, रूप कुमार राठौड़) में घर से दूर सीमा पर खड़े जवानों के भावों की अभिव्यक्ति ऐसे गीतों के बेहद लोकप्रिय उदाहरण हैं। 'मैंने प्यार किया' (1989) का 'कबूतर जा जा जा पहले प्यार की पहली चिट्ठी साजन को दे आ' (लता, बालसुब्रमण्यम) तो लोकप्रियता में 1990 की सालाना बिनाका गीतमाला के तीसरे पायदान का गीत बना। आर.के. फ़िल्म्स की 'हिना' (1991) के पारम्परिक गीत 'चिट्ठियां दर्द फ़िराक वालिए' (लता) के विरह की अभिव्यक्ति का श्रेय राज कपूर को अधिक और संगीतकार रवींद्र जैन को कम जाना चाहिए, क्योंकि इस पारम्परिक धुन की रेकार्डिंग के समय राज कपूर अचानक स्टूडियो पहुंच गए और वहां मौजूद रवींद्र जैन तथा रणधीर कपूर द्वारा अरेंज किए गए विदेशी वाघयंत्रों को हटाकर इस गीत को गीत के परिवेश के अनुसार विशुद्ध लोकरंग के साथ रेकार्ड कराया।

पिछले कुछ दशकों में भी चिट्ठी और ख़त के शब्दों और मुहावरों के साथ कुछ गीत बनते रहे पर अगर विशिष्टता की बात करें तो इधर 2015 में राहत फ़तेह अली खान के ऐलबम 'बैक 2 लव' के गीत 'जरूरी था' को फ़िल्म 'हमारी अधूरी कहानी' में लिया गया। इसमें राहत फ़तेह अली का गाया गीत ख़तों के जलाने के भाव से शुरू होकर प्यार में अलगाव का लगभग औचित्य ही दिखाने लगता है -

लफ्ज़ कितने तेरे पैरों से लिपटे होंगे तूने जब आखिरी ख़त मेरा जलाया होगा तूने जब फूल किताबों से निकाले होंगे देने वाला तुझे याद तो आया होगा।

शब्दों, ख़तों और फूलों के प्रतीकों के साथ यह शायद सूफ़ियाने प्यार की इंतहा ही है।

- पंकज राग, गीत-संगीत के अध्येता, शोध पुस्तक, 'धुनों की यात्रा' के लेखक

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