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अमेरिका में वैक्सीनेशन:अमेरिका के वैक्सीन अभियान में समस्याएं; पैसे की कमी, अश्वेतों के पिछड़ने का खतरा

2 महीने पहले
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  • पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के शासनकाल की अव्यवस्था की छाया महसूस की जा रही है
  • कई राज्य श्वेतों,अश्वेतों और अन्य वर्गों के लोगों को वैक्सीन लगाने की जानकारी नहीं दे रहे हैं

कोरोना वायरस के प्रकोप से सबसे अधिक प्रभावित अमेरिका में वैक्सीन लगाने की मुहिम में कई समस्याएं आ रही हैं। जनवरी के पहले पखवाड़े तक वैक्सीनेशन बहुत धीमी गति से चल रहा था। केंद्र और राज्यों के स्तर पर तालमेल का अभाव था। वितरण में भी दिक्कत थी। पैसे की कमी से कई समस्याएं सामने आई हैं। राज्यों में स्टाफ की कमी महसूस की जा रही है। आबादी के विभिन्न वर्गों के बीच ‌वैक्सीन लगाने में असमानता सामने आ रही है।

कुछ राज्यों ने श्वेतों,अश्वेतों और अन्य वर्ग के लोगों को वैक्सीनेशन की जानकारी नहीं दी है। हालांकि 20 जनवरी को नए राष्ट्रपति जो बाइडेन के पद संभालने के बाद स्थिति में थोड़ा सुधार हुआ हैै। स्थानीय स्वास्थ्य अधिकारियों के अनुसार पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की सरकार ने वैक्सीन लगाने और वितरण का काम पूरी तरह राज्यों पर छोड़ दिया था। इससे स्वास्थ्य विशेषज्ञों, सरकारी और सैनिक अधिकारियों के बीच संवादहीनता,अविश्वास की स्थितियां पैदा हो गई थीं। वैक्सीन पहुंचाने में समस्याएं खड़ी हो गई। पैसे की कमी और कोविड-19 की टेस्टिंग, कांटेक्ट ट्रेसिंग और महामारी पर काबू पाने में जुटे स्वास्थ्य कर्मचारियों पर जरूरत से ज्यादा बोझ से भी मुश्किलें पैदा हुई हैं।

कई राज्यों में दूरदराज के इलाकों से जानकारी नहीं मिली है कि कितने लोगों को वैक्सीन लग चुकी है और कितने लोगों को नहीं। डेटा के अभाव में हर वर्ग को लोगों को वैक्सीन लगाए जाने की प्रक्रिया को धक्का लगेगा। कई राज्य महत्वपूर्ण जानकारियां दर्ज नहीं कर रहे हैं जैसे कि आबादी के किस वर्ग को वैक्सीन लगाई गई, किस शहर, स्थान पर लगी है। उदाहरण के लिए आयोवा और मिनेसोटा के डेटा में नहीं बताया गया कि कितने श्वेतों,अश्वेतों या अन्य नस्ल के लोगों को वैक्सीन लगाई गई है।

डेटा में गड़बड़ी से पैदा हुई समस्याएं पिछले कुछ महीनों की स्थितियों से समझी जा सकती हैं। पिछले साल जब अमेरिका में बड़े पैमाने पर वायरस की टेस्टिंग शुरू हुई थी तब कई राज्यों ने नस्ल और समूह के आधार पर जानकारी धीमी गति से दी थी। नतीजतन अश्वेतों और अन्य वंचित समुदायों की मौतों और संक्रमित होने की सही तस्वीर सामने नहीं आ सकी थी। जानकारी देने वाले कुछ राज्यों में आबादी के विभिन्न वर्गों के बीच वैक्सीनेशन का अंतर स्पष्ट हुआ है।

उदाहरण के लिए वर्जीनिया में विभिन्न नस्लों के लोगों-श्वेत,अश्वेत, हिस्पैनिक- के बीच वैक्सीन लगाने में असमानता है लेकिन इस संबंध में जानकारी अधूरी है। बोस्टन यूनिवर्सिटी में स्वास्थ्य अर्थशास्त्री ब्रुक निकोल्स का कहना है, यदि वैक्सीन अभियान में कुछ समुदाय छूट जाएंगे या कम वैक्सीनेशन होगा तो वायरस उनके बीच सक्रिय रहेगा। ट्रम्प की सरकार महामारी से संबंधित जरूरी डेटा छिपा रही थी। लेकिन, नए राष्ट्रपति जो बाइडेन ने बीमारी और वैक्सीनेशन से संबंधित जानकारी देने का सिस्टम बेहतर बनाने का आदेश जारी किया है। बाइडेन ने राज्यों को हर हफ्ते एक करोड़

टेस्टिंग के अभियान जैसी गलतियां सामने आ रही हैं

वैक्सीन अभियान शुरू करने में अमेरिका में ऐसी ही गलतियां दोहराई गईं जो पिछले साल वायरस की टेस्टिंग में हुई थीं। स्वास्थ्य अधिकारियों और विशेषज्ञों ने टाइम को बताया, वैक्सीन लगाने और उसके वितरण में समन्वित योजना का अभाव वैसा ही है जैसा कि टेस्टिंग के अभियान में दिखाई पड़ा था। बीमारी नियंत्रण सेंटर (सीडीसी)के पूर्व डायरेक्टर डॉ. टॉम फ्रीडमैन कहते हैं, यह वैक्सीनेशन प्रोग्राम पेचीदा है। पिछले 11 महीनों के दौरान केन्द्र सरकार की विफलता की थोड़ी सी झलक मौजूदा अभियान में मिलती है।

ट्रम्प के समय काम पिछड़ा

पूर्व ट्रम्प सरकार ने 1 जनवरी तक दो करोड़ अमेरिकियों को वैक्सीन लगाने का दावा किया था। लेकिन नए साल की शुरुआत में केवल 35 लाख लोगों को वैक्सीन लगी थी। अब वैक्सीनेशन ने गति पकड़ी है। सीडीसी द्वारा 19 जनवरी को जारी डेटा के अनुसार राज्यों को भेजी गई तीन करोड़ 10 लाख डोज में से केवल एक करोड़ 57लाख डोज लगाई गई थी। कई राज्यों में वैक्सीन लगाने के लिए स्टाफ की कमी महसूस की जा रही है।

अलेजांड्रो गार्जा, क्रिस विलसन

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