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  • The Crisis In India Aggravated Due To The Perception Of Victory Over Corona, The Problem Of The Youth Was Also Affected.

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कोविड-19:कोरोना पर विजय की धारणा से भारत में बढ़ा संकट युवाओं के भी प्रभावित होने से पेचीदा हुई समस्या

नैना बजेकल4 दिन पहले
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  • महामारी-विशेषज्ञों ने कहा, सरकार ने चेतावनी मिलने के बाद भी जरूरी कदम नहीं उठाए

दिल्ली में 26 अप्रैल की शाम ढल रही थी। एक उपनगर में छोटे से विश्रामघाट में सात चिताएं जल रही थीं। स्थानीय रहवासी गौरव सिंह कहते हैं, मैं यहां वर्षों से रह रहा हूं। लेकिन, मैंने कभी इतने शव एक साथ जलते नहीं देखे थे। देश में सामूहिक मौतों के दृश्य आम हो गए हैं। कई विशेषज्ञों का कहना है सरकार की बेफिक्री और बीमारी पर जीत पाने की धारणा ने संकट बढ़ाया है। संकट से निपटने में राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी साफ नजर आती है।

कुछ माह पहले ऐसे विनाश की कल्पना करना मुश्किल था। स्कूलों में बच्चों की वापसी हो रही थी, राजनेता चुनाव अभियान में व्यस्त हो गए और शादियों में लोग नाच रहे थे। रिजर्व बैंक ने कहा था, हमारे मुश्किल भरे दिन जल्द खत्म होंगे। जनवरी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक भाषण में कहा, सकारात्मक सोच-विचार के नतीजे भी सकारात्मक होते हैं। फरवरी में मोदी की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी ने एक प्रस्ताव पारित कर कोरोना वायरस से लड़ाई में भारत को विजय दिलाने के लिए प्रधानमंत्री मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व की प्रशंसा की थी। लेकिन 21 अप्रैल से भारत में एक सप्ताह तक रोज तीन लाख से अधिक मामलों का ग्लोबल रिकॉर्ड दर्ज किया गया।

कोरोना से देश में दो लाख से अधिक मौतें हो चुकी हैं। मिशीगन यूनिवर्सिटी की महामारी विद भ्रमर मुखर्जी कहती हैं मृतकों की वास्तविक संख्या दोगुनी से अधिक होगी। भारत ने सितंबर 2020 में एक दिन में 93 हजार मामलों का चरम स्पर्श कर लिया था। संक्रमण में उतार आ गया था। ऐसी धारणा बनी कि भारत ने अपनी युवा आबादी के कारण सामूहिक इम्यूनिटी चुपचाप हासिल कर ली होगी। यह आशावाद दो कारणों से पेचीदा हो गया है- अब बड़ी संख्या में युवा प्रभावित हो रहे हैं और संक्रमण बिहार, उत्तरप्रदेश जैसे गरीब राज्यों में फैल रहा है।

विशेषज्ञों ने मार्च से स्थिति गंभीर होने के प्रति आगाह कर दिया था: विशेषज्ञ कहते हैं, यदि सरकार ने पहले कदम उठाए होते तो तमाम कमजोरियों के बावजूद मौजूदा संकट टाला जा सकता था। सैनफोर्ड बर्नहम प्रेबिस मेडिकल इंस्टीट्यूट, कैलिफोर्निया में संक्रामक बीमारियों के विशेषज्ञ सुमित चंदा का कहना है, वर्तमान संकट वायरस के साथ अन्य कारणों से भी है। यह आत्मसंतुष्टि और अक्षमता का नतीजा है। बड़ी संख्या में भारतीयों ने मास्क पहनना छोड़ दिया था। भ्रमर मुखर्जी कहती हैं, जब वायरस ने फैलना शुरू किया तो ऐसे लोग नए शिकार थे। सुमित चंदा कहते हैं, सरकार द्वारा मिशन पूरा हो गया की मानसिकता को बढ़ावा देने की वजह से लोग बेफ्रिक हो गए।

सबसे बड़ा सुपर स्प्रेडर साबित होगा कुंभ मेला

ब्राउन यूनिवर्सिटी में पब्लिक हेल्थ स्कूल के डीन डा. आशीष झा ने भविष्यवाणी की थी कि कुंभ मानव इतिहास का सबसे बड़ा सुपरस्प्रेडर सिद्ध होगा। भारतीय नेताओं ने अन्य देशों में फैल रहे वायरस के नए स्वरूपों और आंकड़ों की चेतावनी की अनदेखी की। झा का कहना है, मार्च की शुुरुआत में स्थिति स्पष्ट होने लगी थी। हमने चेतावनी की लाल रोशनी दिखाना शुरू कर दिया था। फिर भी, सरकार ऐसे काम कर रही थी जैसे कोई गंभीर बात नहीं है।

तीसरी लहर रोकने के लिए वैक्सीनेशन जरूरी

मोदी महामारी से निपटने में विफलता को स्वीकार करने के इच्छुक नहीं हैं लेकिन विदेशों से मदद के बाद उनके लहजे में नरमी आई है। तीसरी लहर रोकने के लिए वैक्सीनेशन जरूरी है। सीरम को मई तक अन्य देशों को दस करोड़ वैक्सीन सप्लाई करनी है। अब तक केवल दो करोड़ डोज दी हैं। अप्रैल में जब संक्रमण बढ़ रहे थे तब सरकार ने टि्वटर और फेसबुक को सरकार की आलोचना करने वाले पोस्ट हटाने का ऑर्डर दिया।

{साथ में नीलांजना भौमिक/ नई दिल्ली, एलिस पार्क / न्यूयॉर्क और बिली पेरिगो / लंदन।

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