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पुलिस पर रंगभेद का आरोप:ट्रम्प के गोरे समर्थकों को जानबूझकर मनमानी की छूट

7 दिन पहले
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  • श्वेतों की तुलना में अश्वेत प्रदर्शनकारियों के प्रति पुलिस का रवैया हमेशा बहुत सख्त रहता है
  • 6 जनवरी को अमेरिकी संसद भवन में राष्ट्रपति समर्थकों की हिंसा पर कानूनी एजेंसियों के रुख की आलोचना

अमेरिका की राजधानी वाशिंगटन में संसद भवन (केपिटल बिल्डिंग) की रक्षा के लिए तैनात पुलिस पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के हिंसक समर्थकों से नरमी बरतने का आरोप है। पूर्व पुलिस अधिकारियों ने पुलिस की ढील को पक्षपात और रंगभेद बताया है। उनका कहना है, अश्वेत प्रदर्शनकारियों से पुलिस बेहद सख्ती से पेश आती है। लेकिन, 6 जनवरी को हिंसा करने वाले अधिकतर लोग गोरे थे इसलिए पुलिस ने कारगर कार्रवाई नहीं की।

इस बीच वरिष्ठ सांसदों ने पुलिस की विफलता के लिए जिम्मेदार लोगों को निकालने की मांग की है। केपिटल पुलिस के प्रमुख स्टीवन सुंड गुरुवार को इस्तीफा दे चुके हैं। पुलिस अफसरों की यूनियन ने उन्हें हटाने की मांग की थी। केपिटल पुलिस के रिटायर्ड अधिकारी थ्योरटिस जोन्स कहते हैं, यदि अश्वेतों के आंदोलन-ब्लैक लाइव्स मैटर के प्रदर्शनकारी होते तो वे बिल्डिंग की सीढ़ियां तक चढ़ नहीं पाते। पिछले सप्ताह श्वेत राष्ट्रवादियों, दक्षिणपंथी उग्रपंथियों और स्वघोषित हथियार बंद गुटों ने ट्रम्प की अपील पर वाशिंगटन पहुंचने की घोषणा की थी।

इन लोगों ने चार घंटे तक संसद के दोनों सदनों की इमारत केपिटल बिल्डिंग में घुसकर जमकर तोड़फोड़ और हिंसा की थी। जोन्स कहते हैं, मैं यह जानकर स्तब्ध हूं कि बिल्डिंग के चारों तरफ पुलिस अधिकारियों के कई घेरे नहीं बनाए गए। पहले यह आमतौर पर होता था। 6 जनवरी की घटना के बाद पुलिस की भूमिका की कड़ी आलोचना हो रही है। आरोप है, उसने प्राउड ब्वॉयज जैसे उग्रपंथी गुटों की धमकियों को गंभीरता से नहीं लिया।

नागरिक अधिकार संगठनों ने ट्रम्प समर्थक गोरों और अश्वेतों के खिलाफ पुलिस की कार्रवाई में अंतर की आलोचना की है। 2020 में अश्वेत जार्ज फ्लॉयड की पुलिस के हाथों मौत के बाद अमेरिका में व्यापक प्रदर्शन हुए थे। फ्लॉयड की मौत के बाद पहले दस दिनों में दस हजार से अधिक प्रदर्शनकारी बंदी बनाए गए थे। देशभर में ब्लैक लाइव्स मैटर प्रदर्शनकारियों की जमकर पिटाई हुई थी। उन पर काली मिर्च का स्प्रे छोड़ा गया। रबर की गोलियां चलाई गई। कारें चढ़ाकर घायल कर दिया गया था।

वाशिंगटन डीसी पुलिस के पूर्व प्रमुख चार्ल्स रेमसे का कहना है, और अधिक दंगाइयों को घटनास्थल पर ही गिरफ्तार किया जाना था। रेमसे कहते हैं, श्वेत और अश्वेत के बीच भेदभाव की अनदेखी नहीं की जा सकती है। भीड़ में अधिकतर लोग गोरे थे। वे हमेशा कहते हैं कि हम पुलिस को प्यार करते हैं। पुलिस को विश्वास था कि वे हमला नहीं करेंगे। यदि भीड़ अश्वेतों की होती तो पुलिस अलग तरीके से तैयारी करती। केपिटल पुलिस का कहना है कि उसने हिंसा करने वालों के खिलाफ 174 मामले दायर किए हैं।

भेदभाव के आरोप में मुकदमे

केपिटल पुलिस फोर्स को बीते सालों में भेदभाव के आरोपों में कई मुकदमों का सामना करना पड़ा है। केपिटल ब्लैक पुलिस एसोसिएशन सहित कई संगठनों ने उस पर नस्लभेद के आरोप लगाए हैं। पुलिस विभाग में भर्ती और प्रमोशन में नस्ल के आधार पर भेदभाव पर लंबे समय से चिंता जताई जा रही है।

जनता के प्रति जवाबदेही का अभाव

अमेरिकी पुलिस बलों में श्वेत राष्ट्रवादियों और गोरों की सर्वोच्चता का अध्ययन करने वाली कानूनी विशेषज्ञ विडा जॉनसन कहती हैं, केपिटल पुलिस को अमेरिकी कांग्रेस द्वारा दी गई स्वतंत्रता के कारण वह जनता के प्रति जवाबदेह नहीं है। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान के शिक्षक डॉ. माइकेल फानट्रॉय ने बताया कि वे दंगाइयों को रोकने की बजाय उनकी मदद करने वाले पुलिस कर्मियों के खिलाफ मुकदमे दायर करेंगे।

किंबरले डोजियर, मेलिसा चान

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