--Advertisement--

जानलेवा बीमारी को दी मात, अब ये ऑफिसर कर रही ऐसा-आप भी करेंगे सेल्यूट

चार फरवरी को वर्ल्ड कैंसर डे है, इस मौके पर हम आपको कैंसर सर्वाइवर की मोटिवेशनल स्टोरी बता रहे हैं।

Danik Bhaskar | Jan 31, 2018, 12:31 PM IST
रूबी अहलूवालिया मुंबई सेंट्रल रेलवे में फाइनेंसियल एडवाइजर की पोस्ट पर तैनात हैं। रूबी अहलूवालिया मुंबई सेंट्रल रेलवे में फाइनेंसियल एडवाइजर की पोस्ट पर तैनात हैं।

मुंबई. चार फरवरी को वर्ल्ड कैंसर डे है और इस मौके पर DainikBhaskar.com अपने रिडर्स को एक ऐसी लेडी ऑफिसर के बारे में बता रहा है, जिसने कैंसर को मात देकर महिलाओं एक लिए मिसाल पेश है। कैंसर सर्वाइवर रूबी अहलूवालिया मुंबई सेंट्रल रेलवे में फाइनेंसियल एडवाइजर की पोस्ट पर तैनात हैं। कैंसर से जंग जीतने के बाद रूबी ने ‘संजीवनी -लाइफ बियॉन्ड कैंसर’ नाम की एक एनजीओ बनाई। जो अब तक 1 लाख से ज्यादा कैंसर पेशेंट्स की हेल्प करने के साथ उन्हें एम्पावर करने का काम कर चुकी है। 72 शॉर्ट मूवी भी बनाई...

रूबी कैंसर सर्वाइवर के ऊपर अब तक 72 शॉर्ट मूवी भी बना चुकी हैं, जिससे कैंसर पेशेंट्स को मोटिवेट किया जाता है। देश के 8 बड़े शहरों के 9 सरकारी हॉस्पिटल्स में ‘संजीवनी’ अपनी सेवाएं दे रही है। रूबी ने खास बातचीत में लाइफ के एक्सपीरियंस शेयर किए।

ऐसे हुई थी सिविल सर्विसेज में सेलेक्ट

- 54 साल की रूबी बताती हैं- "मेरा जन्म 29 अप्रैल 1963 को देहरादून में हुआ था। पापा प्रकाश चंद अहलूवालिया पुलिस ऑफिसर थे। वे लखनऊ में काफी टाइम तक पोस्टेड रहे।

- "मेरा बचपन काफी अच्छे से बीता। पापा सर्विस में थे, इसलिए कभी कोई फाइनेंसियल प्रॉब्लम फेस नहीं करनी पड़ी। मैंने 12वीं की पढ़ाई लखनऊ के कारमेल कॉलेज से पूरी की। लखनऊ यूनिवर्सिटी से इकोनॉमिक्स में एमए किया। उसके बाद गोविन्द बल्लभ भाई पन्त सोशल साइंस इंस्टीटयूट से पीएचडी की पढ़ाई पूरी की।"

- "1986 में सिविल सर्विसेज के लिए एग्जाम दिया और मेरा सिलेक्शन हो गया। मुझें सेंट्रल रेलवे में चीफ अकाउंटेंट की जॉब मिल गई।"

आगे की स्लाइड्स में जानें कैसे रूबी ने कैंसर को दी मात और कैंसर पेशेंट्स के लिए क्या कर रहीं काम...

हर कीमोथरेपी के बाद बनाती थी दो पेंटिंग

 

 

 

- रूबी बताती हैं कि "2009 में पता चला कि मुझें थर्ड स्टेज का ब्रेस्ट कैंसर है। उस टाइम मुझे थोड़ा डर जरूर लगा था। मेरे लिए खुद को समझा पाना मुश्किल हो रहा था कि मैं अभी और भी जी सकती हूं। हॉस्पिटल में एडमिट होने के दौरान बॉडी में काफी पेन हो रहा था, लेकिन मैंने हिम्मत नहीं हारी।"

 

- "मैंने खुद को समझाया कि मैं ठीक हो सकती हूं। तब मैंने नौकरी छोड़ने की बजाए 3 महीने के लिए ऑफिस से छुट्टी ली और मुंबई के टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल में एडमिट हो गई।"

 

- अहलूवालिया बताती हैं कि "उस समय मेरे हसबैंड और बच्चों ने मुझे काफी मोटिवेट किया।  हर कीमोथेरेपी के बाद हॉस्पिटल से घर आने पर 2 पेंटिंग बनाती थी। हालांकि, मुझे बचपन से ही पेंटिंग का काफी शौक था।"

 

- "हॉस्पिटल में बनाई गई पेंटिंग जल्द ही एक सीरीज के रूप में शामिल हो गई। जब मैं हॉस्पिटल से डिस्चार्ज हो गई तो मैंने अपनी बनाई गई पेंटिंग्स को आर्ट गैलरी में लगाना शुरू कर दिया।"

कैंसर पेशेंट की हेल्प पर डॉक्टर ने किया था ऐसा कमेन्ट

 

- रूबी बताती हैं- "मुंबई के टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल में देश भर से बड़ी संख्या में इलाज कराने के लिए पेशेंट्स आते हैं। मैं जब वहां थी तो मैंने पेशेंट्स को इलाज के लिए काफी प्रॉब्लम्स फेस करते हुए देखा था। कई मरीजों के नाक और मुंह में ट्यूब लगी हुई थी।"

 

- "मरीज के परिजनों हॉस्पिटल में काफी परेशान रहते थे। उन्हें ये नहीं पता होता था कि मरीज का इलाज कब होगा? इलाज में कितना खर्च आएगा? इसके बाद क्या-क्या होगा? वहां पर उस टाइम उनकी कोई हेल्प करने वाला नहीं था?

 

- "मैंने मरीजों और उनके परिजनों के आंखों में आंसू देखे थे। तभी ये डिसाइड किया कि मैं कैंसर से ठीक होने के बाद हॉस्पिटल में आने वाले पेशेंट्स और उनके अटेंडेंट्स की हेल्प के लिए काम करूंगी। मैंने ये बात अपने डॉक्टर को भी बताई थी, लेकिन तब मेरी कंडीशन बहुत ज्यादा खराब थी।"

 

- "डॉक्टर ने कहा था कि पहले खुद ठीक हो जाओ। उसके बाद कैंसर पेशेंट्स के बारे में काम करने के लिए सोचना, लेकिन मैं निराश नहीं हुई। मैंने अपना इरादा नहीं छोड़ा।"

2010 में रिज्वाइन किया ऑफिस


- रूबी बताती हैं- "कैंसर से रिकवर होने के बाद 2010 में मैंने अपनी नौकरी ज्वाइन की। उसके बाद अप्रैल 2012 में काफी रिसर्च के बाद ‘संजीवनी- लाइफ बियॉन्ड कैंसर’ नाम से एक एनजीओ का रजिस्ट्रेशन कराया और कैंसर पेशेंट्स के लिए काम करना शुरू कर दिया।"


- "मैंने देखा कि कैंसर पेशेंट्स के लिए देश भर में कई एनजीओ काम रहे हैं, लेकिन वे केवल फाइनेंसियल हेल्प करते हैं। मैं फिल्ड में जाकर काम नहीं करना चाहती थी। मैंने कुछ अलग करने का सोचा। मैं डॉक्टर और पेशेंट्स के बीच के गैप को भरना चाहती थी।"

ऐसे कर रही कैंसर पेशेंट्स की हेल्प

 

- रूबी बताती हैं- "मैं मानसिक तौर पर उनके साथ जुड़कर उन्हें जिंदगी भर के लिए एम्पावर करना चाहती थी। मैंने अपने इलाज के दिनों में बनाई गई पेंटिंग्स को बेच दिया और कैंसर पेशेंट्स की हेल्प में जुट गई।"

 

-रूबी बताती हैं कि "(संजीवनी- लाइफ बियांड कैंसर) एनजीओ देश भर के 8 बड़े शहरों में संचालित है। इनमें मुंबई, अहमदाबाद, नागपुर, जयपुर, बीकानेर, वर्धा, कोलकाता और पांडिचेरी शामिल हैं।"

- इस समय मैं oncological care giving में सर्टिफिकेट कोर्स और wellness program चला रही हूं।