मुंबई

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कोख में ही मारना चाहती थी मां, घर से भागी तो पिता ने किया अंतिम संस्कार

गोरी सावंत सेक्स वर्कर्स की बेटियों को बेहतर जिंदगी देने के प्रयास में जुटी हैं।

Dainik Bhaskar

Feb 07, 2018, 06:03 PM IST
Special Story on struggling life of Gauri Sawant

मुंबई. विक्स के एक एडवरटाइजमेंट से सुर्खियों में आई मुंबई की ट्रांसजेंडर गौरी सावंत को 7 जुलाई को महराष्ट्र के जलगांव जिले में संत बहिणाबाई अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। उन्हें ये अवॉर्ड उनके द्वारा समाज में किए जा रहे उत्कृष्ट कार्यों को देखते हुए दिया गया है। फिलहाल गौरी सेक्स वर्कर्स की बेटियों को बेहतर जिंदगी देने के प्रयास में जुटी हुई हैं। इसके लिए उन्होंने एक मुहिम भी शुरू की है। गौरी ने DainikBhaskar.com से खास बातचीत की और अपने लाइफ के उतार-चढ़ाव शेयर किए। मां ने गर्भ में मारने की कोशिश की...

- 36 साल की गौरी सावंत बताती हैं- "बचपन में मेरा नाम गणेश नंदन था। मैं पुणे के भवानीपीठ में एक मराठी फैमिली में पैदा हुई थी। मेरे पिता सहायक पुलिस आयुक्त (एसीपी) थे और मेरी मां एक हाउस वाइफ थी।"

- उन्होंने बताया- "मेरे माता-पिता बेटी को जन्म नहीं देना चाहते थे। मेरी मां ने सातवें महीने में अबार्शन कराने की कोशिश की। तब डॉक्टर ने उन्हें समझाया था कि भ्रूण अब नष्ट नहीं हो पाएगा।"

5 साल की थी तब मां की मौत हो गई

- "डॉक्टर ने मेरी मां को समझाया अगर भ्रूण के साथ छेड़छाड़ की गई तो उनकी भी जान को खतरा हो सकता है। मेरे पिता दूसरे बच्चे के लिए तैयार थे। आखिरकार मेरी मां ने मुझे जन्म देने का फैसला लिया। मैं 5 साल की थी तब मेरी मां की डेथ हो गई।" उन्होंने बताया कि जब मैंने घर छोड़ा था तब पिता ने मेरा अंतिम संस्कार कर दिया और मेरे साथ सारे रिश्ते खत्म कर दिए।

आगे की स्लाइड्स में जानें कैसे गौरी के घरवालों को होना पड़ता था शर्मिंदा...

Special Story on struggling life of Gauri Sawant

बचपन में घरवालों को होना पड़ा शर्मिंदा

 

- गौरी बताती हैं- "मुझे स्कूल टाइम में ही ये बात पता चल गई थी कि मैं दूसरे लडकों जैसी नहीं हूं। जब दस साल की थी तब मेरी चाची ने मुझसे पूछा कि तुम बड़े होकर क्या बनना चाहते हो? तो मैंने जवाब दिया था कि 'मैं एक मां बनना चाहती हूं। तब मुझे समझाया गया कि तुम मां नहीं बल्कि पिता बन सकते हो।"

 

- "मैं जैसे–जैसे बड़ी होने लगी। मुझे पता चलने लगा कि मेरे अंदर सामान्य लड़कों जैसे लक्षण नहीं हैं। एक दिन स्कूल में कुछ बच्चों से मेरा झगड़ा हो गया था। मैंने गुस्से में लड़की के अंदाज में उनका जवाब दिया था।"

 

- "इसके बाद मेरे प्रिंसिपल ने मेरी शिकायत पापा से कर दी। स्कूल में मेरे बिहेवियर को लेकर मेरे पापा को शर्मिंदा होना पड़ा था। पापा ने कई दिनों तक मुझसे अच्छे से बात नहीं की।"

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17 साल की उम्र में छोड़ना पड़ा घर

 

- गौरी बताती हैं कि- "मेरे पिता मेरे बिहेवियर को लेकर मुझसे अक्सर नाराज रहते थे। वो बात–बात पर मुझे फटकार लगाते रहते थे। फिर मैंने 17 साल की उम्र में घर छोड़ने का फैसला कर लिया।"

 

- "मेरे पिता एक दिन मेस से खाने का टिफिन लेने के लिए बाहर गए थे तभी मैंने मौका देखकर घर छोड़ दिया। तब मेरे जेब में 60 रुपये थे। उस दिन मंगलवार था तो मैं सिद्धि विनायक मंदिर गईं और प्रसाद के रूप में मिले दो लड्डूओं को दोपहर के भोजन के रूप में खाया और शाम को दादर स्टेशन पर पेटिज खाकर पेट भरने की कोशिश की।"

 

- "इसके बाद मेरी एक दोस्त ने मुझे अपने घर पर रखा। तब एक दिन मुझे पता चला कि मेरे जाने के बाद मेरे पिता सदमे में आ गये थे और टिफिन के उस डिब्बे को तीन दिनों तक पकड़कर बैठे रहे।"

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लाइफ में ऐसे आया यू टर्न

 

- गौरी बताती हैं कि "मैं इतनी सुंदर नहीं थी कि सेक्स वर्कर के तौर पर काम करती, इसलिए मुझे कभी किसी ने इस धंधे की पेशकश नहीं की गई। कुछ समय बाद मुझे मेरे दोस्त ने हमसफर ट्रस्ट तक पहुंचाया।"

 

- "हमसफर ट्रस्ट भारत के सबसे पुराने एलजीबीटीक्यू संगठनों में से एक है। इस संस्था से जुड़ने के कारण मेरी कभी भीख मांगने की नौबत नहीं आई। मुझे ट्रांसजेंडर्स से मिलवाया गया। मैंने एक महीने में 1,500 रुपये कमाए।"

 

- "यहां मैंने अपना नाम गणेश से बदलकर गौरी रख लिया। मैं वास्तविकता जानती थी इसलिए मैं महिला नहीं बनना चाहती थी। मैंने नाम बदलकर रहने का फैसला किया।"

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पिता ने जिंदा रहते किया अंतिम संस्कार

 

- गौरी ने बताया कि- "घर से भागकर जाने के बाद मेरे पिता ने मेरा अंतिम संस्कार कर दिया था। उनका कहना था कि गणेश मेरे लिए मर चुका है। इसके बाद मैंने भी कभी अपने पापा से सम्पर्क करने की कोशिश नहीं की। मैं समाज सेवा के कार्यों से जुड़ गई।"

 

- गौरी के मुताबिक- "एक बार मैंने एक सेक्स वर्कर की बेटी को गलत हाथों में जाने से बचाया फिर उसकी बेटी गायत्री को गोद लेने का फैसला किया। तब मेरी काफी आलोचना भी हुई थी। वो बच्ची अब 11वीं में पढ़ती है। विक्स के ऐड में मेरी और गौरी की कहानी दिखाई गई है।"

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ट्रांसजेंडर के लिए कर रही हैं ये काम

 

- गौरी बताती हैं- "जब मुझें सेक्स वर्कर की लड़कियों की समस्याओं के बारे में पता चला तो मैंने ने इन्हें सुरक्षित माहौल देने के लिए शेल्टर बनाने का फैसला किया। मैं मिलाप संस्था की सहायता से इस काम के लिए पैसे जुटा रही हूं।"

 

- "मेरे एक दोस्त और एलजीबीटी कार्यकर्ता हरीश अय्यर ने मिलाप संस्था से सहयोग लेने का सुझाव दिया था। इससे मुझें 20 लाख रुपए जमा होने की उम्मीद है, जिसमें से अब तक 8.2 लाख रुपए मुझे मिल चुके हैं।"

 

- "मैं अब घर से भागे हुए ट्रांसजेंडर्स के लिए मलाड के मलवाणी में 'सखी चार चौगी' नाम से आश्रय स्थल चलाती हूं। मैं चाहती हूं कि जो परेशानियां मैंने झेली वो दूसरे ट्रांसजेंडर्स ना झेलें। अगली पीढ़ी को स्वीकार्यता, शिक्षा और रोजगार सब कुछ मिले।"

 

- उन्होंने बताया- "मैंने 2009 में ट्रांसजेंडर्स को मान्यता दिलाने के लिए अदालत में पहला हलफनामा दाखिल किया था। नाज फाउंडेशन ने मेरी अपील को आगे बढ़ाया, जिसे नेशनल लीगल सर्विसेज अथॉरिटी ने जनहित याचिका का रूप दे दिया। इस याचिका की सुनवाई के बाद ही सुप्रीम कोर्ट ने ट्रांसजेंडर्स को कानूनी पहचान दी।"

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