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मुगले आजम में मिला था सलीम के राेल का ऑफर, ये हैं उस्ताद की सीक्रेट बातें

जाकिर हुसैन का घर सैन फ्रांसिस्को में है लेकिन पासपोर्ट आज भी हिंदुस्तान का है।

Danik Bhaskar

Jan 27, 2018, 07:02 AM IST

जयपुर. उन्हें उस्ताद ऐसे ही नहीं कहा जाता। उनकी धुनें सिर्फ उंगलियों या तबले पर नहीं बल्कि रग-रग में दौड़ती हैं। तभी तो अपने सेशन 'अ लाइफ इन म्यूजिक' में जब वो मंच पर चढ़े तो उनकी उंगलियां बिना सोचे हाथ में पकड़ी किताब पर ही बजने लगीं। जब संजॉय रॉय और उन पर लिखी किताब की लेखिका नसरीन मुनी कबीर ने उनका परिचय दिया तो उन्होंने मुंह और गले से भी तबले के स्वर निकाल कर साबित कर दिया कि संगीत का संबंध साज से नहीं बल्कि उसकी आत्मा से होता है। हम बात कर रहे हैं मशहूर तबला वादक जाकिर हुसैन की, जिन्हें 2017 में जैज म्यूजिक के लिए सम्मानित किया गया। जिनका घर सैन फ्रांसिस्को में है लेकिन पासपोर्ट आज भी हिंदुस्तान का है।

- जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में सेशन के दौरान उस्ताद ने बताया, जब मैं पैदा हुआ तो मां ने मुझे पिता उस्ताद अल्लाह रखा की गोद में रखा। दस्तूर के मुताबिक उन्हें मेरे कान में एक प्रार्थना सुनानी थी। पिता बीमार थे, लेकिन फिर भी वो अपने लबों को मेरे कानों के बिल्कुल करीब ले आए और सुर और ताल का शहद घोल दिया। मां नाराज हुईं और कहा कि यह तो अपशकुन है, लेकिन पिता ने जवाब दिया कि संगीत मेरी साधना है और सुरों से मैं सरस्वती और गणेश की पूजा करता हूं इसलिए यही सुर और ताल मेरी दुआ है।

...तो मैं होता मुगले आजम का युवा सलीम
जब मोहन स्टूडियो, जहां पिता रेजीडेंट म्यूजिक कम्पोजर थे, में मुगले आजम के गाने 'जब प्यार किया तो डरना क्या' की शूटिंग चल रही थी तो के. आसिफ ने युवा सलीम का किरदार मुझे देने का सोचा। दिलीप कुमार ने भी सहमति दे दी लेकिन पिता ने कहा कि यह तबला बजाएगा, एक्टिंग से इसका दिमाग सातवें आसमां पर चढ़ जाएगा। इसलिए मधुबाला के साथ काम करने का मौका चूक गया। कुछ सालों बाद हॉलीवुड फिल्म 'हीट एंड डस्ट' में जूली क्रिस्टी के साथ काम करने का मौका मिला।

जब शहर सोता था मेरे पिता रियाज करवाते
जन्म से लेकर तीन सालों तक पिता ने सुरों और सरगम से दोस्ती करवाई, लेकिन उसके बाद अपने हाथ खींच लिए। वो सुर जो दिलो-दिमाग में बस गए थे, उन्हें मेरे हवाले छोड़ दिया। मैं उन्हीं के साथ खेलते हुए बड़ा हुआ। 7 साल की उम्र में स्कूल के कॉन्सर्ट में हिस्सा लेने लगा और जब उन्होंने संगीत के प्रति मेरी दीवानगी को देखा तो मुझसे पूछा, सुबह तीन बजे रियाज कर सकोगे? अगले दिन से रियाज शुरू हुआ। सुबह 6 बजे तक रोज रियाज होता जिसमें वो मुझे कई मंत्र और श्लोक सिखाते। आप ही बताएं, ऐसा कौनसा शख्स होगा जो पिता के साथ वो पल नहीं बिताना चाहेगा जहां शोर न हो, फोन की घंटी न हो, शहर गहरी नींद में हो और आप सुरों के पिता के साए में।

मां डॉक्टर या इंजीनियर बनाना चाहती थीं
मां चाहती थीं कि मैं डॉक्टर या इंजीनियर बनूं, इसलिए तबले से दूर रखने के लिए स्कूल के आखिरी दो सालों में पढ़ने दूर भेज दिया। लेकिन जिनके यहां भेजा उनकी बेटी कथक नृत्यांगना थी। मैं फिर उनके साथ-साथ तबला बजाने लगा। नतीजा यह हुआ कि सुरों से पक्की हो गई लेकिन पास मुश्किल से हुआ।

सारंगी खराब है तो क्या, हाथ तो तुम्हारा है
जाकिर ने बताया कि सीकर में सारंगी के उस्ताद सुल्तान खान के घर हुई संगीत की बैठक के दौरान उनके पिता, पं.हरिप्रसाद चौरसिया, पं.शिव कुमार और अली अकबर खान मौजूद थे। उन्होंने सुल्तान से सारंगी बजाने की गुजारिश की लेकिन वो टूटी हुई थीए इसलिए उन्होंने माफी मांगते हुए इंकार कर दिया। तब अली अकबर ने कहा, सुल्तान साहब, सारंगी खराब है तो क्या, हाथ तो तुम्हारा है। आत्मा तो हाथों में होती है। उन्होंने सारंगी को सुधारा और प्रस्तुति दीए जिसे मेरे एक दोस्त ने रिकॉर्ड किया और रिलीज किया जिसकी बदौलत उन्हें हजारों डॉलर की रॉयल्टी मिली।

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