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241 साल पहले राजपरिवार में हुआ था घमासान, भाई ने भाई का बहाया था खून / 241 साल पहले राजपरिवार में हुआ था घमासान, भाई ने भाई का बहाया था खून

पांचगांव के मैदान में भोसले राजपरिवार के संस्थापक रघुजी भोंसले के पुत्रों की सेनाएं आपस में भीड़ी थी।

bhaskar news

Jan 27, 2016, 12:07 AM IST
महाराजा रघुजी प्रथम। महाराजा रघुजी प्रथम।
नागपुर (महाराष्ट्र)। मराठा साम्राज्य के शासनकाल में नागपुर की महत्वपूर्ण भूमिका रही। नागपुर के राजपाट को लेकर कई युद्ध हुए, जिसमें पाचगांव का विशेष महत्व है। यह युद्ध भोंसले राजपरिवार के आपसी युद्ध की दास्तां है। जो 26 जनवरी 1774 को पाचगांव के मैदान में हुआ था।
हजारों की संख्या में थी सेना...
- पांचगांव के मैदान में भोसले राजपरिवार के संस्थापक रघुजी भोंसले के बेटों की सेनाएं आपस में भीड़ी।
- जैसा कि हर युद्ध का अंजाम होता है, इस युद्ध में एक भाई मारा गया और एक के हाथ में राजगद्दी आई।
- 241 साल पहले इस युद्ध में दोनों पक्षों से हजारों की संख्या में सैनिकों के बीच जंग हुई।
- तोप, बंदूक, तलवार, तीर, भाले, हाथी, घोड़ों से लैस सेनाएं इस दौरान एक दूसरे के खून के प्यासे रहे।
मुधोजी विजयी हुए
नागपुर के इतिहासकार व मॉरिस कॉलेज के इतिहास विभाग के पूर्व अध्यक्ष डॉ. बी. आर. अंधारे ने अपनी पुस्तक में पाचगांव युद्ध का विस्तृत रूप से उल्लेख किया है। इसमें उन्होंने बताया है कि पाचगांव युद्ध एक ही पिता अर्थात रघुजी प्रथम के दो पुत्रों की राजगद्दी के लिए किया गया युद्ध था। युद्ध में नागपुर के शासक जानोजी की हत्या उनके उत्तराधिकारी रघुजी द्वितीय के पिता मुधोजी ने बंदूक से गोली मारकर की थी। इस युद्ध में मुधोजी विजयी हुए।
राजपरिवार के भीतर आपसी रंजिश का युद्ध
शासन की बागडोर मुधोजी के हाथ में आ गई। भले ही राजगद्दी पर मुधोजी के बेटे रघुजी द्वितीय विराजते रहे हों, लेकिन कम उम्र होने के कारण राजगद्दी और शासन पर नियंत्रण मुधोजी का ही रहा। बताया जाता है कि यह भोसले राजपरिवार के भीतर आपसी रंजिश का युद्ध था। बाद में मुधोजी ने जानोजी के साथियों को अपने साथ मिला लिया था, जिससे आगे विद्रोह आदि नहीं हो पाया। मुधोजी ने अंग्रेजों के साथ हाथ मिलाया, जो रघुजी द्वितीय के कालखंड तक जारी रहा। 1816 तक रघुजी द्वितीय का राज रहा।
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महल के महारानी सती काशीबाई साहेब भोसले स्थित छत्री। महल के महारानी सती काशीबाई साहेब भोसले स्थित छत्री।
ऐसे हुआ पांचगांव का युध्द 
मुधोजी की सेना में मो. युसुफ गार्दी की दो हजार पैदल सेना व अन्य योद्धाओं द्वारा जमा किए गए हजारों की संख्या में पैदल सैनिकों, घुड़सवारों आदि का समावेश था। वे दादासाहब द्वारा दिया गया हाथी जिसका नाम कान्हा था के हौद में जाकर बैठ गए। मो. युसुफ गार्दी वह शख्स था, जिसने पेशवा नारायणराव की हत्या 30 अगस्त 1773 में गणेश उत्सव के दौरान की थी। वह भी पाचगांव के इस युद्ध में शामिल था।
 
इधर साबाजी के पास सरदार मजीद खान रोहिले, मो. अमीनखान, जागोजी यादव, पाटणकर, नारोजी जाचक, विठ्ठल बल्लाड़ सुभेदार, गोविंदराव त्रिंबक, मानसिंह मोहिते, यशवंत पागे, भवानी शिवराम पागे व अन्य योद्धाओं के साथ हजारों सैनिकों, घुड़सवारों के साथ आगे बढ़े।
 
आगे की सलाइड्स में पढ़ें रघुजी प्रथम की दो पत्नियां थीं...
महाराजा रघुजी प्रथम। महाराजा रघुजी प्रथम।
गद्दी पर बैठाया 
पुरातत्वविद व इतिहासकार चंद्रशेखर गुप्त बताते हैं कि रघुजी प्रथम की दो पत्नियां थीं। पहली पत्नी से जानोजी व साबाजी थे। दूसरी से मुधोजी व खंडोजी हुए, लेकिन पेशवाओं की पुणे दरबार से जानोजी को नागपुर के राजपाट की गद्दी पर बैठाया गया। जानोजी ने मुधोजी के पुत्र रघुजी द्वितीय को अपना उत्तराधिकारी चुना था। मुधोजी अपने ही बेटे की देखरेख रेजिडेंट के तौर पर कर रहे थे। उनकी नियुक्ति सेना धुरंधर (सेनापति) के तौर पर की गई थी, लेकिन शासन पूरी तरह अपने हाथ में आ जाए, इसके लिए भोंसले परिवार के बीच जो युद्ध हुआ वह ऐतिहासिक पाचगांव की लड़ाई के नाम से जाना गया। 
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महाराजा रघुजी प्रथम।महाराजा रघुजी प्रथम।
महल के महारानी सती काशीबाई साहेब भोसले स्थित छत्री।महल के महारानी सती काशीबाई साहेब भोसले स्थित छत्री।
महाराजा रघुजी प्रथम।महाराजा रघुजी प्रथम।
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