मुंबई / फिल्म 'चिड़ियाखाना' को यू सर्टिफिकेट न दिए जाने पर हाईकोर्ट ने कहा- सेंसर बोर्ड शुतुरमुर्ग की तरह सोच रहा

Bombay HC raps censor board
X
Bombay HC raps censor board

  • खंडपीठ ने यह भी कहा- सेंसर बोर्ड यह तय नहीं करेगा कि कौन क्या देखेगा
  • कोर्ट ने सेंसर बोर्ड की भूमिका को नए सिरे से दोबारा परिभाषित की भी बात कही
  • खंडपीठ के सामने चिल्ड्रन फिल्म सोसायटी की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई की गई

Jul 06, 2019, 01:06 PM IST

मुंबई. बॉम्बे हाईकोर्ट ने बाल फिल्म ‘चिड़ियाखाना’ को यूनिवर्सल (यू) प्रमाणपत्र न दिए जाने को लेकर केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सेंसर बोर्ड) को कड़ी फटकार लगाई है। हाईकोर्ट ने कहा कि बोर्ड यह तय नहीं करेगा कि कौन क्या देखना चाहता है और क्या नहीं। कोर्ट ने बोर्ड को 'शुतुरमुर्ग' तक कह दिया। कोर्ट ने सेंसर बोर्ड की बौद्धिकता पर भी सवाल उठाए हैं।

 

ये भी पढ़ें

Yeh bhi padhein

 

न्यायमूर्ति एससी धर्माधिकारी और न्यायमूर्ति गौतम पटेल की खंडपीठ ने कहा कि हम सेंसर बोर्ड की भूमिका को नए सिरे से दोबारा परिभाषित करेंगे। क्योंकि वह महसूस करता है कि उसे ही सबके लिए फैसला करने का अधिकार है।

 

चिल्ड्रन फिल्म सोसायटी की याचिका पर हो रही है सुनवाई

कोर्ट ने चिल्ड्रन फिल्म सोसायटी की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई की। याचिका में फिल्म सोसायटी ने मांग कि है कि फिल्म ट्रिब्यूनल बोर्ड को निर्देश दिया जाए कि वह उसकी यू सर्टिफिकेट दिए जाने की मांग को लेकर दायर आवेदन पर सुनवाई करे। सेंसर बोर्ड ने चिल्ड्रेन फिल्म सोसायटी की फिल्म ‘चिड़ियाखाना’ को यूए प्रमाणपत्र दिया है। जबकि फिल्म सोसायटी यू प्रमाणपत्र चाहती है।

 

यह है सेंसर बोर्ड की आपत्ति

सेंसर बोर्ड के अनुसार, फिल्म में गाली-गलौच वाले संवाद और कुछ आपत्तिजनक दृश्य हैं, इसलिए इस फिल्म को यूए प्रमाणपत्र दिया गया है। जबकि फिल्म सोसायटी की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता यशोदीप देशमुख ने इसका खंडन करते हुए फिल्म के लिए यू सर्टिफिकेट की मांग की ताकि वह इसे स्कूलों में बच्चों को दिखा सकें। उन्होंने कहा कि हम सेंसर बोर्ड की आपत्तियों के अनुसार वह दो दृश्य-संवाद हटाने के लिए तैयार हैं। इस पर खंडपीठ ने कहा कि ‘क्या सेंसर बोर्ड को यह महसूस होता है कि फिल्म से आपत्तिजनक दृश्य-संवाद हटा लेने से वह चीज समाज से पूरी तरह खत्म हो जाएगी? क्या आप (सेंसर बोर्ड) शुतुरमुर्ग हैं जो अपनी चोंच बालू में गडाकर सोचते हैं कि उसके आसपास कोई खतरा नहीं है।’ 

 

आपत्तिजनक दृश्य हटाने पर अड़ा सेंसर बोर्ड

सुनवाई के दौरान सेंसर बोर्ड के वकील ने कहा कि हम आपत्तिजनक दृश्य हटाने के बाद भी फिल्म को ‘यूए’ प्रमाणपत्र ही देंगे। इस पर खंडपीठ ने कहा कि बोर्ड ऐसे कैसे कह सकता है? सेंसर बोर्ड सिर्फ प्रमाणनन बोर्ड है उसके पास सेंसरशिप का अधिकार नहीं है। वह यह तय नहीं कर सकता है कि कौन क्या देखना चाहता है। किसी ने बोर्ड को बौद्धिक नैतिकता तय करने का अधिकार नहीं दिया है जो बोर्ड यह तय करे कि कौन क्या देखेगा? ऐसा लगता है कि हमें बोर्ड की भूमिका को दोबारा परिभाषित करना पड़ेगा।

 

अदालत ने आगे कहा कि बोर्ड ने तय कर लिया है कि सारी आबादी बचकानी और मूर्ख है। सिर्फ बोर्ड ही बौद्धिक रूप से सबके लिए यह तय करने के लिए सक्षम है कि कौन क्या देखेगा। यदि फिल्म में नस्लवाद, भेदभाव बाल मजदूरी और नशे के दुष्परिणाम को मुद्दा बनाया गया है तो फिल्म में इन मुद्दों को समझाना भी पड़ेगा। बिना दृश्यों के यह मुद्दे बच्चों को कैसे समझाए जाएंगे। क्या यह बच्चों को बताना जरूरी नहीं है कि नस्लवाद और भेदभाव गलत चीजें हैं। 

 

सुनवाई 5 अगस्त तक के लिए स्थगित

फिलहाल, खंडपीठ ने मामले की सुनवाई 5 अगस्त तक के लिए स्थगित कर दी है। अगली सुनवाई के दौरान सेंसर बोर्ड के क्षेत्रीय अधिकारी (आरओ) को हलफनामा दायर करने का निर्देश दिया है। हलफनामे में आरओ को बाल फिल्म को प्रमाणपत्र जारी करने को लेकर तय की गई नीति की जानकारी देने के लिए कहा गया है। चिड़ियाखाना फिल्म में मूल रूप से एक बिहार के एक लड़के की कहानी दिखाई गई है जो फुटबाॅल खेलने के सपने को पूरा करने के लिए मुंबई आया है।

आज का राशिफल

पाएं अपना तीनों तरह का राशिफल, रोजाना