शख्सियत / देसी खाने से जंक फूड को टक्कर दे रहीं 40 साल की रोशनी, सालाना 10 लाख रु तक कमा रहीं

business: 40-year-old Roshni competing with junk food from village food
रोशनी भुईर। (फाइल फोटो) रोशनी भुईर। (फाइल फोटो)
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business: 40-year-old Roshni competing with junk food from village food
रोशनी भुईर। (फाइल फोटो)रोशनी भुईर। (फाइल फोटो)

  • हुनर को ताकत बनाकर अपनी और परिवार की किस्मत बदल रही हैं पालघर की महिलाएं
  • पिछले साल बांद्रा में लगे मेले में 17 लाख रुपए का बिजनेस किया था

Dainik Bhaskar

Jan 27, 2020, 10:00 AM IST

मुंबई (मनीषा भल्ला). मुंबई का पालघर इलाका...यहां जाकर किसी से भी रोशनी भुईर के बारे में पूछिए, तो उसकी आंखों में चमक और मुंह में पानी आ जाता है। इसकी वजह है 40 साल की रोशनी के हाथों बने खाने का जादू। पिज्जा, बर्गर और पास्ता की दुनिया में रहने वाले जब एक दफा रोशनी भुईर के हाथ की भाखरी, भरवां वांगी, झुनका,प्याज की काली सब्जी और आगरी मसाले में लिपटी मछली का स्वाद चख लेते हैं तो जंक फूड भूल जाते हैं।

इनके हाथ का बना खाना खाने के बाद वे यह जरूर पूछते हैं- रोशनी ताई, गली दफा मेला कहां लग रहा है। मुंबई में पालघर के गांव घरसार में रहने वाली रोशनी भुइर गांव का देसी स्वाद परोस कर साल के 7 से 10 लाख रुपए तक कमा लेती हैं। पिछले साल बांद्रा में लगे मेले में तो उन्होंने 17 लाख रुपए का कारोबार कर लिया था।

रूरल लाइवलीहुड स्कीम से मिली मदद

रोशनी की मेहनत और कमाई देख उनके पति ने भी नौकरी छोड़ दी और अब इस काम में पत्नी का हाथ बंटाने लगे हैं। इन्हें देखकर पालघर में ऐसी महिलाओं की संख्या बढ़ती जा रही हैं और उनकी आय में भी इजाफा हुआ है। रोशनी की इस कामयाबी में केंद्र सरकार की योजना रूरल लाइवलीहुड स्कीम बड़ी मददगार रही है। इसके तहत गांव की महिलाओं को जो काम भी करना आता है उन्हें उसके लिए बाजार दिया जाता है। महाराष्ट्र में ज्यादातर ग्रामीण महिलाओं ने खाना बनाने का काम चुना है। 

50 से ज्यादा डिशेज बनाती हैं

हाल ही में मुंबई से बाहर बेलापुर में यह ग्रामीण मेला लगा था और 17 जनवरी को मुंबई के बांद्रा में भी मेला लगा। ये महिलाएं ज्वार, बाजरा, तांदुल और नाचनी की भाखरी, आगरी और मालवानी मसाले में लिपटी सूरमई, बांगड़ा, पॉपलेट मछली, खलबत्ता स्पेशल मसाला चिकन-मटन, पूरन पोली, महाराष्ट्रीयन सब्जी भरी वांगी, झुनका-भाखरी जैसी 50 से ज्यादा डिशेज बनाती हैं। रोशनी बताती हैं कि पिछले साल बांद्रा में लगे मेले में इन्होंने कुल 17 लाख रुपये का बिजनेस किया था। उन्हें इसमें निवेश की तुलना में करीब तीन गुणा का फायदा होता है। अब तो पक्का मकान भी बना लिया है।


बच्चे कॉलेज की पढ़ाई पूरी कर नौकरी नहीं, यही काम करेंगे
रोशनी खुद निरक्षर हैं, लेकिन अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दे रही हैं। उनका बड़ा बेटा ग्रेजुएशन कर रहा है, लेकिन पढ़ाई पूरी करने के बाद वह नौकरी नहीं ढूंढेगा, बल्कि अपनी मां के साथ इसी काम में जुट जाएगा। रोशनी के साथ ऐसी 9 महिलाएं और हैं, जो यह काम करती हैं। किसी भी मेले में ऐसी 200-250 महिलाएं आती हैं। दूसरी बात यह है कि वे अपनी डिशेज का मसाला घर पर खुद ही बनाती हैं, जिसके बारे में किसी को नहीं बतातीं।

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