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मेरे पास खेलने का टाइम नहीं है... बाल मजदूरों का दर्द दिखाती 10 तस्वीरें

1 मई है लेबर डे। गोवा के स्टूडेंट ने की चाइल्ड लेबर पर रिसर्च, सामने आई ये तस्वीर।

Dainik Bhaskar

May 01, 2018, 07:26 AM IST
Child labour photos on labour day

मुंबई. 1 मई का दिन मजदूर दिवस (लेबर डे) के रूप में ऑब्जर्व किया जाता है। हमारे देश की एक बड़ी समस्या है चाइल्ड लेबर। देशभर में कई बच्चे अपना बचपन जीने की जगह मजदूरी कर पैसा कमाने में लगे हैं। इनके पास न खेलने का टाइम है और न पढ़ाई का। गोवा यूनिवर्सिटी में पीएचडी कर रहे शिलिम खान ने इसी टॉपिक पर अपनी थीसिस तैयार की थी। उनकी रिसर्च रिपोर्ट के मुताबिक ये मासूम दिन के 12 से 14 घंटा मजदूरी करते हैं। इनमें से कुल 6 प्रतिशत बच्चों को काम के दौरान ब्रेक लेने की इजाजत मिलती है।

कभी चाय तो कभी जूस पिलाते मिलते हैं ये बच्चे

- बाल मजदूरी हमारे आसपास ही होती है, लेकिन हम कभी इस तरफ ध्यान नहीं देते।
- कई घरों में झाड़ू-पोंछा से लेकर खाना पकाने, बच्चे संभालने और बर्तन धोने जैसे कामों के लिए बच्चों को ही रख लिया जाता है। पढ़े-लिखे वर्ग के घरों में भी ये बाल मजदूर काम करते नजर आते हैं।
- शिलिम खान की रिपोर्ट के मुताबिक अकेले गोवा में हर साल 7 हजार बच्चे मजदूरी के लिए अन्य राज्यों से लाए जाते हैं। इन बाल मजदूरों में 38 फीसदी बच्चे यूपी और 33.4 फीसदी बच्चे कर्नाटक से लाए जाते हैं।
- इस थीसिस के लिए शिलिम ने 300 बाल मजदूरों, 200 इम्प्लॉयर्स और 100 पेरेंट्स या गार्जियन से इस टॉपिक पर इंटरव्यू किए।

आगे की स्लाइड्स में जानें, चाइल्ड लेबर से जुड़े 10 फैक्ट जो शिलिम खान की थीसिस में सामने आए...

अधिकतर बाल मजदूर लंच शाम 4 बजे और डिनर रात 12 के बाद कर पाते हैं। अधिकतर बाल मजदूर लंच शाम 4 बजे और डिनर रात 12 के बाद कर पाते हैं।
अधिकतर बाल मजदूरों को दिन में 12-14 घंटे काम करना पड़ता है। अधिकतर बाल मजदूरों को दिन में 12-14 घंटे काम करना पड़ता है।
दिन की ड्यूटी के साथ कई बच्चों को रात में भी एक्स्ट्रा काम करवाया जाता है। दिन की ड्यूटी के साथ कई बच्चों को रात में भी एक्स्ट्रा काम करवाया जाता है।
महज 6 परसेंट बच्चे मजदूरी के बीच में दो घंटे का आराम कर पाते हैं। महज 6 परसेंट बच्चे मजदूरी के बीच में दो घंटे का आराम कर पाते हैं।
अधिकतर बाल मजदूरों को कोई वीकली छुट्टी नहीं मिलती। जरूरत पड़ने पर छुट्टी भी नहीं दी जाती। अधिकतर बाल मजदूरों को कोई वीकली छुट्टी नहीं मिलती। जरूरत पड़ने पर छुट्टी भी नहीं दी जाती।
इन बच्चों को महीने का 500 से 1000 रुपए तक पेमेंट किया जाता है। इन बच्चों को महीने का 500 से 1000 रुपए तक पेमेंट किया जाता है।
कई बार मालिक इन बाल मजदूरों की 81 फीसदी सैलरी छोटी-सी गलती पर काट लेते हैं। कई बार मालिक इन बाल मजदूरों की 81 फीसदी सैलरी छोटी-सी गलती पर काट लेते हैं।
गोवा में चाइल्ड लेबर की उम्र 7 से 15 उम्र के बीच है। गोवा में चाइल्ड लेबर की उम्र 7 से 15 उम्र के बीच है।
96 फीसदी बच्चों को मजदूरी के दौरान गाली-गलौंच और मारपीट से गुजरना पड़ता है। 96 फीसदी बच्चों को मजदूरी के दौरान गाली-गलौंच और मारपीट से गुजरना पड़ता है।
रेस्टोरेंट में काम करने वाले अधिकतर बाल मजदूर किचन या डाइनिंग एरिया में सोते हैं। रेस्टोरेंट में काम करने वाले अधिकतर बाल मजदूर किचन या डाइनिंग एरिया में सोते हैं।
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Child labour photos on labour day
अधिकतर बाल मजदूर लंच शाम 4 बजे और डिनर रात 12 के बाद कर पाते हैं।अधिकतर बाल मजदूर लंच शाम 4 बजे और डिनर रात 12 के बाद कर पाते हैं।
अधिकतर बाल मजदूरों को दिन में 12-14 घंटे काम करना पड़ता है।अधिकतर बाल मजदूरों को दिन में 12-14 घंटे काम करना पड़ता है।
दिन की ड्यूटी के साथ कई बच्चों को रात में भी एक्स्ट्रा काम करवाया जाता है।दिन की ड्यूटी के साथ कई बच्चों को रात में भी एक्स्ट्रा काम करवाया जाता है।
महज 6 परसेंट बच्चे मजदूरी के बीच में दो घंटे का आराम कर पाते हैं।महज 6 परसेंट बच्चे मजदूरी के बीच में दो घंटे का आराम कर पाते हैं।
अधिकतर बाल मजदूरों को कोई वीकली छुट्टी नहीं मिलती। जरूरत पड़ने पर छुट्टी भी नहीं दी जाती।अधिकतर बाल मजदूरों को कोई वीकली छुट्टी नहीं मिलती। जरूरत पड़ने पर छुट्टी भी नहीं दी जाती।
इन बच्चों को महीने का 500 से 1000 रुपए तक पेमेंट किया जाता है।इन बच्चों को महीने का 500 से 1000 रुपए तक पेमेंट किया जाता है।
कई बार मालिक इन बाल मजदूरों की 81 फीसदी सैलरी छोटी-सी गलती पर काट लेते हैं।कई बार मालिक इन बाल मजदूरों की 81 फीसदी सैलरी छोटी-सी गलती पर काट लेते हैं।
गोवा में चाइल्ड लेबर की उम्र 7 से 15 उम्र के बीच है।गोवा में चाइल्ड लेबर की उम्र 7 से 15 उम्र के बीच है।
96 फीसदी बच्चों को मजदूरी के दौरान गाली-गलौंच और मारपीट से गुजरना पड़ता है।96 फीसदी बच्चों को मजदूरी के दौरान गाली-गलौंच और मारपीट से गुजरना पड़ता है।
रेस्टोरेंट में काम करने वाले अधिकतर बाल मजदूर किचन या डाइनिंग एरिया में सोते हैं।रेस्टोरेंट में काम करने वाले अधिकतर बाल मजदूर किचन या डाइनिंग एरिया में सोते हैं।
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