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इस बुजुर्ग कपल ने सैनिकों के लिए बेच दिए अपने गहने, कहा- वो हमारे लिए जान दे सकते हैं तो हम मदद क्यों नहीं कर सकते

जब तक एक रोटी सि‍याचि‍न ग्‍लेशि‍यर पहुंचती है उसकी लागत 200 रुपए पहुंच चुकी होती है।

DainikBhaskar.Com | Last Modified - May 01, 2018, 08:07 AM IST

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    सियाचिन ग्लेशियर

    मुंबई.हिमालयन रेंज में मौजूद सियाचिन ग्लेशियर दुनिया का सबसे ऊंचा बैटल फील्ड है। 1984 से लेकर अब तक यहां करीब 900 जवान शहीद हो चुके हैं। इनमें से ज्यादातर की शहादत एवलांच और खराब मौसम के कारण हुई। बता दें की एक दंपत्ति ने वहां पर सैनिकों के लिए एक अहम फैसला लिया है। दरअसल इस कमल ने जवानों की मदद के लिए अपने गहने तक बेच दिए हैं और उन्होंने कहा कि वे सांस न ले पाने वाली जगह पर दिन रात जागकर हमारी रक्षा करते हैं तो हम भी उनकी इतनी सी मदद तो कर ही सकते हैं। ये है पूरा मामला...

    - इस बुजुर्ग दंपत्ति का नाम सुमेधा और उनके पति का नाम योगेश है।
    - सुमेधा आर्मी वेलफेयर सोसायटी के लिए 1999 से काम कर रही हैं और वे कॉलेज में लेक्चरार भी हैं। उनके पति भारतीय वायुसेना से रिटायर हैं।
    - उनके मुताबिक सियाचिन में ऑक्सीजन की कमी के कारण वहां के सैनिकों की मदद के लिए उन्होंने 1.25 लाख रूपए इकट्ठे किए हैं। ताकि उनके ऑक्सीजन संयंत्र में कुछ मदद हो सके।
    - वे भी यंगस्टर्स को आर्मी में भर्ती होने के लिए प्रेरित करती रहती हैं।
    - पति के मुताबिक फिलहाल सियाचिन में सिर्फ एक ऑक्सीजन संयंत्र है। जिससे ही हमारी सेना के जवान वहां सांसें ले रहे हैं। और जब वे हमारे लिए अपनी जान तक की परवाह नहीं करते तो हम भी उनकी कुछ मदद कर सकते हैं।

    आर्मी के लिए क्यों अहम है सियाचिन?

    - सियाचिन ग्लेशियर में 1984 से लेकर अब तक यहां करीब 900 जवान शहीद हो चुके हैं। इनमें से ज्यादातर की शहादत एवलांच और खराब मौसम के कारण हुई।
    - सियाचिन से चीन और पाकिस्तान दोनों पर नजर रखी जाती है। विंटर सीजन में यहां काफी एवलांच आते रहते हैं। सर्दियों के सीजन में यहां एवरेज 1000 सेंटीमीटर बर्फ गिरती है। मिनिमम टेम्परेचर माइनस 50 डिग्री (माइनस 140 डिग्री फॉरेनहाइट) तक हो जाता है।
    - यहां हर रोज आर्मी की तैनाती पर 7 करोड़ रुपए खर्च होते हैं। यानी हर सेकंड 18 हजार रुपए। इतनी रकम में एक साल में 4000 सेकंडरी स्कूल बनाए जा सकते हैं। अगर एक रोटी 2 रुपए की है तो यह सियाचिन तक पहुंचते-पहुंचते 200 रुपए की हो जाती है।


    अब तक 883 शहीद

    - सियाचिन ग्लेशियर में भारत ने सबसे पहले वर्ष 1984 में अपनी सेना भेजी थी।
    - तब से लेकर आज तक सियाचिन ग्लेशियर में हर महीने सेना का एक जवान शहीद हो जाता है।
    - लोकसभा में पेश आकंड़ों के मुताबिक, ग्लेशियर में 1984 से दिसंबर 2015 के बीच तैनात कुल 883 भारतीय सैनिक शहीद हो चुके हैं।
    - साल 2012-13 और 2014-15 के बीच कपड़े और पर्वतारोहण उपकरणों पर देश का 6,566 करोड़ रुपए खर्च आया है।
    - शहीद हुए जवानों में 33 अधिकारी, 54 जूनियर कमीशंड अधिकारी और 782 अन्य रैंक के अधिकारी शामिल हैं।

    भारत हर दि‍न खर्च करता है 5 करोड़

    - दोनों देश यहां अपनी पोजीशन मेनटेन करने की भारी कीमत चुका रहे हैं। डि‍फेंस रि‍व्‍यू रि‍पोर्ट के मुताबि‍क, भारत हर दि‍न 5 से 7 करोड़ रुपए का खर्च उठाता है।
    - एक कैलकुलेशन के मुताबि‍क, जब से इस इलाके को लेकर दोनों देशों में जंग हुई तब से लेकर अब तक 5 अरब डॉलर खर्च हो चुके हैं।
    - जब तक एक रोटी सि‍याचि‍न ग्‍लेशि‍यर पहुंचती है उसकी लागत 200 रुपए पहुंच चुकी होती है। एक अकेले सैनि‍क का साजोसामान 1 लाख रुपए में आता है।

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    सियाचिन पाकिस्तान और चीन से घिरा हुआ है।
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    कपल्स ने ज्वेलरी बेच कर 1.25 लाख रूपए इकट्ठा किए।
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    लोकसभा में पेश आकंड़ों के मुताबिक, ग्लेशियर में 1984 से दिसंबर 2015 के बीच तैनात कुल 883 भारतीय सैनिक शहीद हो चुके हैं।
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    सियाचिन ग्लेशियर में भारत ने सबसे पहले वर्ष 1984 में अपनी सेना भेजी थी।
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    डि‍फेंस रि‍व्‍यू रि‍पोर्ट के मुताबि‍क, भारत हर दि‍न 5 से 7 करोड़ रुपए का खर्च उठाता है।
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