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इस मंदिर ने तय किया ड्रेस कोड, खुले बाल पर महिलाओं की एंट्री बैन, साड़ी, सलवार और दुपट्‌टा जरूरी है महिलाओं को भगवान के दर्शन के लिए

पुरुषों को जींस-टी शर्ट पहनने पर प्रवेश नहीं, धोती या पैंट और कमर पर अंग-वस्त्र जरूरी

Danik Bhaskar | Apr 12, 2018, 01:41 AM IST

बेंगलुरू. शहर के एक मंदिर ने वहां दर्शन के लिए आने वाले भक्तों के लिए ड्रेस कोड जारी किया है। उन्हें किस तरीके से रहना है, यह भी बताया गया है। सबसे दिलचस्प शर्तें महिलाओं के मंदिर में प्रवेश करने की स्थिति में रखी गई हैं। अब तक तो महिलाओं को जींस-टी शर्ट या बरमूडा पहने होने पर कई जगहों पर एंट्री की खबरें आती रही है। लेकिन यह मंदिर एक कदम आगे निकल गया है। इसमें महिलाओं को बाल खुले होने पर मंदिर में प्रवेश नहीं मिलेगा।

स्थानीय मीडिया के मुताबिक मंदिर में महिलाओं को रबर बैंड या रिबन से बाल बंधे होने पर ही एंट्री मिलेगी। महिलाओं को मंदिर परिसर में स्लीवलेस टॉप, जींस और मिनी स्कर्ट्स पहनकर प्रवेश की इजाजत नहीं मिलेगी। उन्हें सिर्फ साड़ी या चूड़ीदार सलवार-कुर्ती के साथ दुपट्टा ओढ़ने पर ही मंदिर के भीतर जाने की इजाजत होगी।

श्री राजराजेश्वरी मंदिर के बाहर लगा है ड्रेस कोड का बोर्ड

भक्तों को किन शर्तों पर मंदिर में प्रवेश दिया जाएगा, इसे लेकर प्रबंधन ने मंदिर के बाहर बाकायदा एक नोटिस बोर्ड लगा दिया है। इसमें साफ तौर पर महिलाओं और पुरुषों के लिए ड्रेस कोड के बारे में बताया गया है। इसमें लिखा है कि बरमूडा, शॉर्ट्स, मिनी स्कर्ट्स, मिडीज, स्लीवलेस टॉप, लो-वेस्ट जींस और छोटी टी-शर्ट जैसे कपड़े पहने भक्तों को मंदिर परिसर में इजाजत नहीं है। महिलाओं को खुले बाल रखने पर प्रवेश नहीं मिलेगा। नोटिस बोर्ड में यह भी लिखा है कि सिर्फ पारंपरिक ड्रेस वाले भक्तों को ही प्रवेश दिया जाएगा।

यह नई बात नहीं

ये ड्रेस कोड या नियम बेंगलुरु के आर आर नगर स्थित श्री राजराजेश्वरी मंदिर प्रबंधन ने तय किए हैं। ये सिर्फ महिलाओं पर ही नहीं, बल्कि पुरुषों पर भी लागू होंगे। पुरुषों के लिए तय ड्रेस कोड के मुताबिक उन्हें धोती या पैंट पहने होने पर ही मंदिर में प्रवेश मिलेगा। जींस-टी शर्ट या बरमूडा पहने होने पर इजाजत नहीं मिलेगी। मंदिर प्रबंधन ने 18 साल से कम उम्र की बच्चियों के लिए भी ड्रेस कोड तय किया है। उन्हें फुल लेंथ का गाऊन पहनने पर ही प्रवेश की अनुमति होगी। मंदिर ट्रस्ट के सदस्य हयाग्रीव कहते हैं कि संस्कृति के पालन के लिए यह बहुत जरूरी है। यह नई बात नहीं है। वहीं स्थानीय निवासी धनंजय कहते हैं, ‘यह गैरजरूरी फैसला है। मौजूदा दौर में महिलाओं को भी पुरुषों के बराबर अधिकार हैं। भगवान की नजर में भी सब एक हैं। इससे फर्क हीं पड़ता कि भक्तों ने साड़ी पहनी है या जींस।