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ये हैं नोबल पाने वाले पहले इंडियन, डिग्री होने के बावजूद नहीं मिली थी नौकरी

डूडल में एक रंगीन और ब्लैक एंड व्हाइट चित्र बनाया गया है जिसमें प्रोफेसर खुराना वैज्ञानिक प्रयोग करते हुए नजर आ रहे हैं।

Dainik Bhaskar

Jan 09, 2018, 10:49 AM IST
भारतीय मूल के वैज्ञानिक थे डॉ भारतीय मूल के वैज्ञानिक थे डॉ

मुंबई. गूगल ने मंगलवार को मशहूर वैज्ञानिक डॉ. हरगोविंद खुराना को उनके जन्मदिन पर याद किया है। गूगल ने उनकी 96वीं जयंती पर एक डूडल बनाया है। डूडल में एक रंगीन और ब्लैक एंड व्हाइट चित्र बनाया गया है जिसमें प्रोफेसर खुराना वैज्ञानिक प्रयोग करते हुए नजर आ रहे हैं और साथ में उनकी एक बड़ी-सी तस्वीर बनाई गई है। इंग्लैंड से डॉक्टरेट की उपाधि लेकर लौटे हरगोविंद खुराना को अपने देश में कोई नौकरी नहीं मिली, जिसके बाद वे आपस विदेश चले गए थे। नोबल पुरस्कार पाने वाले पहले इंडियन...

- भारतीय-अमेरिकी बायोकेमिस्ट डॉ. हरगोविंद खुराना का जन्म 9 जनवरी 1922 को अनडिवाइड भारत के रायपुर (जिला मुल्तान, पंजाब) में हुआ था।

- डॉ खुराना को 1968 में फिजियोलॉजी के लिए नोबेल पुरस्कार मिला था। उन्हें यह पुरस्कार साझा तौर पर दो और अमेरिकी वैज्ञानिकों के साथ दिया गया।

- नोबेल का यह पुरस्कार पाने वाले वह भारतीय मूल के पहले वैज्ञानिक थे।

भारत सरकार से स्कालरशिप पर भेजा विदेश

- पढ़ाई में खुराना की मेहनत और लगन देखकर उन्हें उच्च शिक्षा के लिए भारत सरकार ने छात्रवृत्ति पर 1945 में इंग्लैंड भेजा।

- वहां लिवरपूल विश्वविद्यालय में प्रोफेसर ए.रॉबर्टसन् के अधीन डॉक्टरेट किया। खुराना को इसके बाद भारत सरकार से रिसर्च फेलोशिप मिली और वह ज्यूरिख (स्विट्जरलैंड) के फेडरल इंस्टिटयूट ऑफ टेक्नॉलोजी में प्रोफेसर वी. प्रेलॉग के साथ रिसर्च में लग गए।

देश में काम न मिलने पर विदेश गए

- खुराना भारत में कुछ नया करना चाहते थे। वे आनुवांशिकी विज्ञान में खोज करने के लिए उत्सुक थे। पर दुर्भाग्य से देश में खुराना को अपने योग्य कोई काम नहीं मिल सका, इसलिए मजबूरन उन्हें विदेश वापस लौटना पड़ा।

- खुराना 1960 में अमेरिका के विस्कान्सिन विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के पद पर नियुक्त हुए और उन्होंने अमेरिकी नागरिकता स्वीकार कर ली।

विदेश में भी रहकर नहीं भूले देश को

- खुराना ने विज्ञान के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण काम किए। जिसके लिए उन्हें नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया। वह अमेरिकी नागरिक होकर भी अपनी मातृभूमि भारत को कभी भूल नहीं पाए। जब भी उन्हें वक्त मिलता वह अपने रिश्तेदारों और दोस्तों से मिलने के लिए भारत आते रहते थे।

- एक बार की बात है, वे बहुत लंबे समय बाद अपने रिश्तेदारों के यहां दिल्ली आए। बातचीत के बाद जब भोजन का समय हुआ तो मेज पर पश्चिमी ढंग का खाना लगा देखकर डॉ. खुराना ने आश्चर्य प्रकट किया और इसका कारण पूछा। रिश्तेदारों में से कोई बोला, हमने सोचा कि आप लंबे समय से अमेरिका में रह रहे हैं तो अब तक आप वहां के खाने के आदी हो चुके होंगे।

- तब डॉ. खुराना ने कहा, नहीं भाई, ऐसा बिलकुल भी नहीं है। मैं तो अपने घर, अपने देश को जरा भी नहीं भूला। मुझे पश्चिमी खाना नहीं चाहिए। मुझे तो बाजरे की मोटी रोटी और सरसों का साग ही चाहिए। मैं अपने घर आया हूं। मुझे मेहमान न समझा जाए।'

- पूरी दुनिया में भारत का नाम रौशन करने वाले और जिंदगी को जिंदादिली से जीने वाले डॉ. हरगोविंद खुराना ने इस दुनिया को 9 नवंबर 2011 को अलविदा कह दिया।

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