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गणतंत्र से पहले ऐसा था मुंबई का हाल, सड़कों पर चलती थीं बैलगाड़ियां

हम आपको अमेरिकन फिल्म मेकर द्वारा 84 साल पहले तैयार की गई शार्ट डाक्यूमेंट्री दिखाने जा रहे हैं।

Dainik Bhaskar

Jan 26, 2018, 09:35 AM IST
ताज होटल के बाहर खड़ी बगी। यह कभी मुंबई में शान की सवारी हुआ करती थी। ताज होटल के बाहर खड़ी बगी। यह कभी मुंबई में शान की सवारी हुआ करती थी।

मुंबई: देश की आर्थिक राजधानी मुंबई (बंबई) अपने विकास और जीवन शैली के लिए वर्ल्ड फेमस है। भारत को गणतंत्र बने पूरे 69 साल हो गए हैं। गणतंत्र के इस जश्न में हर कोई पुराने किस्से, कहानियां याद करता है। आज भले ही लोकल ट्रेन, चकाचौंध कर देने वाली लाइफस्टाइल, उंची इमारते और शानदार सड़के मुंबई की पहचान बन गई हो। लेकिन एक दौर ऐसा भी था जब यहां सड़कों पर बैलगाड़ी चला करती थी। आज हम आपको एक अमेरिकन फिल्म मेकर द्वारा लगभग 84 साल पहले तैयार की गई शार्ट डाक्यूमेंट्री के माध्यम से 1932 की बंबई(मुंबई) को दिखाने जा रहे हैं। वीडियो में यह है खास..

- 'गेट वे टू इंडिया' नाम की इस शार्ट फिल्म को अमेरिकन फिल्म निर्माता जेम्स ए. फिट्ज पैट्रिक ने 1930-32 के बीच तैयार किया था। इस फिल्म का नरेशन(आवाज) भी पैट्रिक ने ही किया है।

- अपनी इस फिल्म में 1932 की मुंबई और उसके आसपास के इलाकों को दिखाया गया है। 8 मिनट की इस शार्ट फिल्म में बंबई में रहने वाले लोगों, स्ट्रीट, बाजार, पब्लिक ट्रांसपोर्ट और कल्चर को दिखाया गया है।

- 1932 के आसपास इस शहर में सिर्फ 10 लाख लोग रहते थे। उस दौर में मुंबई की सड़कों पर इक्का-दुक्का मोटर गाड़ियां(कार) चला करती थीं। लोग ट्रांसपोर्ट के लिए ज्यादातर बैलगाड़ी और घोड़ागाड़ी का इस्तेमाल करते थे।

- डाक्यूमेंट्री में बंबई का फेमस महालक्ष्मी रेस कोर्स, चिड़िया से करतब दिखाता एक कलाकार, मछुआरों का एक गांव और उसमें रहने वाली महिलाओं के बारे में दिखाया गया है।

- फिल्म में मुंबई की सड़कों पर हाथी की सवारी का नजारा, समंदर का किनारा और जुहू बीच भी दिखाया गया है।

200 से ज्यादा शार्ट डाक्यूमेंट्री बनाई

- पैट्रिक 1930 में बंबई आये और उन्होंने दो साल के दौरान बंबई के अलावा बनारस, जयपुर, दिल्ली और आगरा पर भी शार्ट फिल्में बनाई।

- इन फिल्मों के निर्माण में पैट्रिक को कुल 1500 डॉलर का खर्च आया था।

- वे अलग-अलग देशों में 200 से ज्यादा शार्ट डाक्यूमेंट्री फिल्में बना चुके हैं।

- इसके अलावा पैट्रिक 'ट्रेवलटॉक' और द वॉइस ऑफ ग्लोब' टीवी सीरीज के निर्माता, निर्देशक और राइटर भी थे।

- टाइम्स मैगजीन ने फिट्ज को विशेष सम्मान भी दिया था। 1894 में जन्में पैट्रिक का 1980 में कैलिफोर्निया में निधन हुआ।

कैसे पड़ा मुंबई नाम?

- मुंबई का इतिहास पौराणिक काल से जुड़ा है। इसका नाम हिन्दू देवी दुर्गा का रूप, जिनका नाम मुंबा देवी है के नाम से पड़ा है।

- 'मुंबई' नाम के पहले दो शब्द मुंबा या महा-अंबा देवी के नाम से रखा गया है। वहीं आखिरी शब्द आई, जिसे मराठी में 'मां' कहते हैं से पड़ा है ।

- जिसे आधिकारिक रूप से सन 1995 में पहली बार नाम दिया गया।

आगे की स्लाइड्स में देखिए आजादी से पहले की मुंबई की कुछ और फोटोज....

ओल्ड मुंबई में चलती बैलगाड़ियां-फाइल फोटो। ओल्ड मुंबई में चलती बैलगाड़ियां-फाइल फोटो।
उस दौर में बैलगाड़ी ही यातायात का एक मात्र साधन थी। उस दौर में बैलगाड़ी ही यातायात का एक मात्र साधन थी।
मुंबई हार्बर किनारे खड़ी बैलगाड़ियां। मुंबई हार्बर किनारे खड़ी बैलगाड़ियां।
मुंबई का भीड़भाड़ वाला बाजार। मुंबई का भीड़भाड़ वाला बाजार।
सेंट कैथेड्रल चर्च, बंबई(मुंबई)। सेंट कैथेड्रल चर्च, बंबई(मुंबई)।
आजादी से पहले का गेट-वे ऑफ इंडिया (मुंबई)। आजादी से पहले का गेट-वे ऑफ इंडिया (मुंबई)।
आजादी से पहले मुंबई का फेमस होटल ताज। आजादी से पहले मुंबई का फेमस होटल ताज।
मुंबई का बोहरा बाज़ार। मुंबई का बोहरा बाज़ार।
उस दौर में सड़कों पर इक्कादुक्का गाड़ियां चला करती थी। उस दौर में सड़कों पर इक्कादुक्का गाड़ियां चला करती थी।
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ताज होटल के बाहर खड़ी बगी। यह कभी मुंबई में शान की सवारी हुआ करती थी।ताज होटल के बाहर खड़ी बगी। यह कभी मुंबई में शान की सवारी हुआ करती थी।
ओल्ड मुंबई में चलती बैलगाड़ियां-फाइल फोटो।ओल्ड मुंबई में चलती बैलगाड़ियां-फाइल फोटो।
उस दौर में बैलगाड़ी ही यातायात का एक मात्र साधन थी।उस दौर में बैलगाड़ी ही यातायात का एक मात्र साधन थी।
मुंबई हार्बर किनारे खड़ी बैलगाड़ियां।मुंबई हार्बर किनारे खड़ी बैलगाड़ियां।
मुंबई का भीड़भाड़ वाला बाजार।मुंबई का भीड़भाड़ वाला बाजार।
सेंट कैथेड्रल चर्च, बंबई(मुंबई)।सेंट कैथेड्रल चर्च, बंबई(मुंबई)।
आजादी से पहले का गेट-वे ऑफ इंडिया (मुंबई)।आजादी से पहले का गेट-वे ऑफ इंडिया (मुंबई)।
आजादी से पहले मुंबई का फेमस होटल ताज।आजादी से पहले मुंबई का फेमस होटल ताज।
मुंबई का बोहरा बाज़ार।मुंबई का बोहरा बाज़ार।
उस दौर में सड़कों पर इक्कादुक्का गाड़ियां चला करती थी।उस दौर में सड़कों पर इक्कादुक्का गाड़ियां चला करती थी।
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