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कभी पढ़ाई के लिए नहीं थे पैसे, अब 4000 स्कूलों में खोल चुके हैं लाइब्रेरीज

बिजनेस के साथ सामाजिक दायित्व निभाते हुए देशभर के 4000 स्कूलों में लाइब्रेरीज खोली है, इसका लाभ 10 लाख बच्चों को हुुआ।

DainikBhaskar.com | Last Modified - Nov 14, 2017, 03:30 PM IST

  • कभी पढ़ाई के लिए नहीं थे पैसे, अब 4000 स्कूलों में खोल चुके हैं लाइब्रेरीज
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    प्रदीप अब तक कई राज्यो के सेंकडरी स्कूलों में लाइब्रेरीज खोल चुके हैं।
    पुणे. जो बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं, आम तौर पर गरीब परिवारों से आते हैं और उनके लिए घर में या बाहर एकेडमिक सामग्री के अलावा किताबें नहीं होती। उनके लिए निश्चित रूप से लाइब्रेरी ही ज्ञान और रचनात्मकता तक पहुंचने काल जरिया होता है। लेकिन देश हजारों गांवों के स्कूल में आज भी लाइब्रेरी पाई नहीं जाती। एेसे में पुणे के एक उद्यमी और सामाजिक कार्यकर्ता प्रदीप लोखंडे ने बिजनेस के साथ साथ सामाजिक दायित्व निभाते हुए देशभर के 4000 स्कूलों में लाइब्रेरीज खोली है, इसका लाभ 10 लाख बच्चों को हुआ है। बचपन में प्रदीप के घर की माली हालत काफी नाजुक थी, वे किताबें तक खरीद नहीं पाते थे। एेसे आया लाइब्रेरीज बनाने का आईडिया....

    -पुणे में रहने वाले प्रदीप लोखंडे मूल रुप से सतारा जिले के वाई गांव से हैं। वे रुरल रिलेशन नामक एनजीओ चलाते हैं।
    -प्रदीप कॉमर्स ग्रेजुएट हैं और मार्केटिंग में डिप्लोमा किया है। जॉन्सन एंड जॉन्सन जैसी कंपनियों में काम कर चुके हैं।
    -लोखंडे को नियमित रूप से आईआईएम और दुनियाभर के अन्य मैनेजमेंट स्कूलों से प्रेक्टिकल मार्केटिंग स्ट्रैटजी पर बात करने के लिए बुलाया जाता है।
    मैनेजमेंट की पढ़ाई के लिए नहीं थे पैसे
    -प्रदीप जब 1981 में पुणे आए तो उन्होंने वाडिया काॅलेज से काॅमर्स की डिग्री ली। इसके बाद उन्होंने मार्केट डिप्लोमा करने की सोची।
    -पुणे के एक नामांकित मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट में एडमिशन के लिए वे गए लेकिन उनका गंवारापन और भाषा देख और फीस के लिए पुरे पैसे न जुटा पाने से पहले एडमिशन देने से मना किया गया।
    -उन्होंने संस्थाचालक के यहां कई बार चक्कर लगाए। उनकी जिद देख आखिरकार उन्हें एडमिशन मिल गया। पढ़ाई पूरी होने बाद उन्होंन जाॅन्सन एंड जाॅन्सन ज्वाइन की थी।

    लाइब्रेरी बनाने का एेसे आया आईडिया
    मध्यप्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र के कई गांवों में काम के सिलसिले में घूम चुके हैं। काम के दौरान उन्होंने और उनकी टीम ने कई तरह के डेटा जुटाए।
    -जैसे दुकानों की संख्या, क्या बिक रहा है, कितने टेलीविजन सेट हैं, गांव में इंटरनेट कनेक्टिविटी है या नहीं आदी।ताकि पता चले कि ग्राहकों का व्यवहार क्या है और बाजार में क्या खरीदा जाता है।
    - इससे उनका विश्वास बना कि गांव के लोगों का ज्ञान बढ़ाने के लिए कुछ करना चाहिए और उन्होंने ‘ज्ञान-की इनिशिएटिव’ के तहत गांवों में सेकंडरी स्कूलों में लाइब्रेरी बनवाना शुरू किया। 2001 में इसकी शुरुआत हुई।

    इस वजह से खास है लाइब्रेरीज
    -ज्ञान-की एक विशेष तरह की लाइब्रेरी है। हर लाइब्रेरी एक गर्ल स्टूडेंट मैनेज करती है, जिसे ज्ञान-की मॉनीटर कहा जाता है।
    -2001 से ही उन्हें लोगों और कंपनियों की ओर से इस्तेमाल किए हुए कंप्यूटर मिलने लगे थे और उन्हें गांव के स्कूलों में बुलाया जाने लगा।
    -अब तक महाराष्ट्र, गुजरात, मध्यप्रदेश, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, तेलंगाना, अांध्रप्रदेश और कर्नाटक के 20 हजार गावों में 28 हजार डोनेटेड कंप्यूटर लगाए गए। अब वे या तो नए कंम्यूटर खरीद रहे हैं या आईटी कंपनियों से पुराने कंप्यूटर हासिल कर रहे हैं।
    -आज तक ग्रामीण सेंकडरी स्कूलों में 4000 ज्ञान की लाइब्रेरी स्थापित की जा चुकी हैं। इनसे 8.5 लाख बच्चों को फायदा हो रहा है। हर लाइब्रेरी में कई विषयों की 180 से 200 तक किताबें हैं। करीब 6,25,000 किताबें इन लाइब्रेरियों को दी गई हैं। इनकी कीमत है करीब 2 करोड़ रुपए। इनमें मैनेजमेंट, डिजास्टर मैनेजमेंट, फिजिकल ट्रेनिंग, भारतीय संविधान, नाटक, संगीत, सामाजिक और यहां तक कि सेक्स एजुकेशन की किताबें भी हैं।

    एेसे खुलती है ज्ञान-की लाइब्रेरी
    -लाइब्रेरी स्थापित करने के लिए डोनर को 6,700 रुपए का एक चैक पब्लिशर के नाम लिखना होता है, जो सीधे किताबें पहुंचा देता है। और स्टूडेंट को प्रदीप की टीम ट्रेनिंग देती है।
    -स्टूडेंट किताब पढ़ सकते हैं और फिर सीधे डोनर को या उन्हें पोस्टकार्ड लिखते हैं। प्रदीप लोखंडे, पुणे-13। इस पते पर लेटर पहुंचता है।
    -प्रदीप के पास अब तक देशभर से लाखों स्टूडेंट द्वारा मिले हैं। वे इस काम को और बढ़ाना चाहते हैं।
    आगे की स्लाइड्स में देखें प्रदीप लोखंडे के फोटोज....
  • कभी पढ़ाई के लिए नहीं थे पैसे, अब 4000 स्कूलों में खोल चुके हैं लाइब्रेरीज
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    ज्ञान -की लाइब्रेरी में अलग अलग विषयों की किताबें होती है। जो आम तौर पर स्कूलों में नहीं मिलती।
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    प्रदीप अपने इस काम को और बढ़ाना चाहते हैं।
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    ज्ञान की लाइब्रेरी से देशभर के 10 लाख स्टूडेंट को फायदा हुआ है।
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    प्रदीप को लाखों स्टूडेंट्स लेटर मिले हैं।
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    प्रदीप ने ज्ञान-की लाइब्रेरी की शुरूआत 2001 में की थी।
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