सर्जिकल स्ट्राइक / जवानों ने कुत्तों को डराने के लिए किया था तेंदुए के मूत्र का इस्तेमाल

Dainik Bhaskar

Sep 13, 2018, 08:36 PM IST



पुणे में आयोजित एक कार्यक्रम में बोल रहे थे लेफ्टिनेंट जनरल राजेंद्र निंबोकर। पुणे में आयोजित एक कार्यक्रम में बोल रहे थे लेफ्टिनेंट जनरल राजेंद्र निंबोकर।
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पुणे में आयोजित एक कार्यक्रम में बोल रहे थे लेफ्टिनेंट जनरल राजेंद्र निंबोकर।पुणे में आयोजित एक कार्यक्रम में बोल रहे थे लेफ्टिनेंट जनरल राजेंद्र निंबोकर।
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  • सर्जिकल स्ट्राइक के समय नौशेरा क्षेत्र में ब्रिगेड कमांडर थे निंबोकर

पुणे. पाकिस्तानी सीमा में घुसकर सर्जिकल स्ट्राइक करने के दौरान पैरा कमांडो कुत्तों को डराने के लिए तेंदुए का मूत्र और मल साथ ले गए थे। मंगलवार को ये खुलासा लेफ्टिनेंट जनरल राजेंद्र निंबोकर ने किया। वे पुणे में थोर्ले बाजीराव पेशवे प्रतिष्‍ठान द्वारा आयोजित एक समारोह में बोल रहे थे। इस दौरान उन्हें सर्जिकल स्ट्राइक की सफलता के लिए सम्मानित भी किया गया। उस समय निंबोकर नौशेरा क्षेत्र में ब्रिगेड कमांडर थे।

 

राजेंद्र निंबोकर का खुलासा: लेफ्टिनेंट जनरल राजेंद्र निंबोकर ने कहा, "मार्ग पर पड़ने वाले गांवों में हमारे ऊपर भौंकने वाले कुत्तों की संभावना थी। मुझे पता था कि वे तेंदुओं से डरते हैं। हमने तेंदुए का मूत्र अपने साथ ले गए थे। एक रणनीति के रूप में गांवों को पार करते समय पैराकमांडोज ने गांवों के बाहर तेंदुए का मूत्र फेंक दिया था। इसी के भय से कुत्ते टीम के निकट तक नहीं आ सके।" उन्होंने आगे बताया कि इसी का फायदा हमारी टीमों को मिला और उन्होंने पाकिस्तानी क्षेत्र के अंदर 15 किलोमीटर के खतरनाक आॅपरेशन को चुपचाप अंजाम दिया।

 

निंबोकर ने आगे कहा कि हमारी टीम ने लॉन्चपैड से बाहर चल रहे आतंकवादियों के पैटर्न का अध्ययन किया था और आतंकवादी अड्डों पर हमले करने के लिए उचित समय 3.30 बजे का था। इस हमले में आतंकियों के 3 पैड ध्वस्त हो गए थे। तो  वहीं  29 आतंकवादियों को मार गिराया गया था।


ऐसा आया कुत्तों से बचने का आइडिया: निंबोकर ने बताया कि नौशेरा क्षेत्र में रहने के दौरान उन्होंने इलाके की जैव विविधता का विस्तृत अध्ययन किया था। हमको पता था कि उस इलाके के जंगलों में तेंदुए अक्‍सर कुत्‍तों पर हमले कर देते हैं। लिहाजा खुद को बचाने के लिए कुत्‍ते रात में रिहायशी इलाकों के निकट छुप जाते हैं। इसलिए जब सर्जिकल स्‍ट्राइक की रणनीति बनाई गई तो इस बात का भी ख्‍याल रखा गया कि रास्‍ते में पड़ने वाले गांवों से गुजरने के दौरान ये कुत्‍ते आहट पाते ही तेंदुए के खौफ से भौंक सकते हैं और हमला भी कर सकते हैं। ऐसे में उससे बचाव के लिए तेंदुए के मल-मूत्र का सहारा लिया गया। उनको गांवों के निकट फेंक दिया गया। ये रणनीति कारगर रही।"

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