पहले से सोची समझी साजिश थी ‘कोरेगांव भीमा हिंसा’, जांच रिपोर्ट में हुआ खुलासा / पहले से सोची समझी साजिश थी ‘कोरेगांव भीमा हिंसा’, जांच रिपोर्ट में हुआ खुलासा

Dainikbhaskar.com

Sep 12, 2018, 09:46 AM IST

1 जनवरी को भीमा-कोरेगांव में दो गुटों के बीच दंगे हुए थे।

koregaon bhima was pre planned violence says investigation report.

पुणे. भीमा-कोरेगांव में हिंसा की घटना पुलिस की लापरवाही से हुई और यह पूर्व नियोजित थी। संभाजी भिड़े और मिलिंद एकबोटे ने हिंसा भड़काने के हालात बनाए। यह दावा कोल्हापुर आईजी के निर्देश पर गठित सत्यशोधन समिति ने अपनी जांच रिपोर्ट में किया है। समिति ने हिंसा की जांच कर रही पुणे ग्रामीण पुलिस को अपनी जांच रिपोर्ट भी सौंप दी है। 1 जनवरी को कोरेगांव भीमा में दो गुटों के बीच दंगे हुए थे। जिसमें एक युवक को अपनी जान गंवानी पड़ी। इसमें आगजनी, पथराव जैसी घटनाओं को अंजाम दिया गया था।

क्या है सत्यशोधन समिति?
- भीमा-कोरेगांव हिंसा मामले को लेकर कई स्वतंत्रत संस्थाएं जांच कर रही हैं। जिनमें 10 लोगों की सत्यशोधन समिति भी शामिल है। इसे कोल्हापुर आईजी के निर्देश पर गठित किया गया है। इसकी अध्यक्षता पुणे के उप महापौर डाॅ. सिद्धार्थ धेंडे कर रहे हैं। जबकि महाराष्ट्र सरकार ने इस मामले में दो सदस्यीय न्यायिक आयोग का गठन किया है। जिसकी जांच रिपोर्ट आना अभी बाकी है।

जांच रिपोर्ट में यह सामने आया: पुलिस को सौंपी गई रिपोर्ट के मुताबिक, मिलिंद एकबोटे ने महार समाज के इतिहास के साथ छेड़छाड़ करने के लिए 'धर्मवीर संभाजी महाराज स्मृति समिति' का गठन किया था। इसमें हिंसा को लेकर मिलिंद एकबोट और भिड़े गुरूजी को मुख्य आरोपी बनाया गया है। साथ ही कहा गया है कि कुछ पुलिसवालों ने भी उनका साथ दिया था।

जबरदस्ती दिया जा रहा है नक्सल एंगल: सत्यशोधन समिति के अध्यक्ष डाॅ.सिद्धार्थ धेंडे ने बताया कि इसके सबूत बहुत पहले ही पुलिस को सौंप दिए गए लेकिन उस पर पुलिस ने अभी तक कुछ भी नहीं किया है। इस प्रकरण को नक्सल मोड़ देकर जांच की जा रही है, जो गलत है। पुलिस ने जांच की दिशा ही बदल डाली है।

इस आधार पर तैयार की जांच रिपोर्ट: डाॅ. सिद्धार्थ धेंडे ने बताया कि फाइनल रिपोर्ट बनाने से पहले उनकी समिति से जुड़े लोगों ने हिंसा वाले इलाके का दौरा किया। वहां के लोगों से बात की और उनके इंटरव्यू भी रिकॉर्ड किए। यही नहीं उस दौरान ड्यूटी पर तैनात पुलिसवालों के बयान भी रिकॉर्ड किए गए। इन सबके बाद हम इस नतीजे पर पहुंचे कि यह हिंसा पूर्व नियोजित थी। हिंसा में इस्तेमाल पत्थर और लाठी-डंडों का इंतजाम पहले से किया गया था।

राज्य सरकार द्वारा गठित आयोग पर बनाया गया दबाव: डाॅ. सिद्धार्थ धेंडे ने बताया कि राज्य सरकार ने जांच के लिए जो आयोग नियुक्त किया है। उस आयोग के समक्ष मामले के मुख्य आरोपी मिलिंद एकबोटे अपने वकील के साथ बैठते हैं। यह एक प्रकार से आयोग पर दबाव डालने की कोशिश है। डाॅ. सिद्धार्थ धेंडे का आरोप है कि सरकार एकबोटे और संभाजी भिड़े को बचाने की कोशिश कर रही है।

क्या कहना है पुणे ग्रामीण पुलिस का?
भीमा कोरेगांव हिंसा मामले की जांच कर रही पुणे ग्रामीण पुलिस का दावा है कि 1 जनवरी को भीमा-कोरेगांव में हुई हिंसा के पीछे 31 दिसंबर को पुणे के शनिवारवाड़ा में आयोजित यलगार परिषद में हुए भाषण भी एक कारण हैं।इसी साल जून महीने में भीमा-कोरेगांव हिंसा मामले में पुणे ग्रामीण पुलिस ने प्रतिबंधित माओवादी संगठन से जुड़े पांच एक्टिविस्ट शोमा सेन, महेश राऊत, सुरेंद्र गडलिंग, रोना विल्सन और सुधीर ढवले को मुंबई, दिल्ली, हैदराबाद औऱ रांची से गिरफ्तार किया था। इसके बाद इसी मामले में अगस्त महीने में रांची से फादर स्टेन स्वामी, हैदराबाद से वामपंथी विचारक और कवि वरवरा राव, फरीदाबाद से सुधा भारद्धाज और दिल्ली से सामाजिक कार्यकर्ता गौतम नवलाख की गिरफ्तारी हुई है। सभी को सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर अगली सुनवाई तक नजरबंद रखने का आदेश दिया गया है।

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