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इस मां ने बेटियों के लिए छोड़ दी हाई प्रोफाइल जॉब, बिन मां के बच्चों को दे रही सहारा

मां सिर्फ वो नहीं होती जो बच्चे को जन्म देती है, इसका एग्जाम्पल हैं स्मृति गुप्ता।

Dainik Bhaskar

May 12, 2018, 06:56 PM IST
बेटी रघुवंशिका के साथ स्मृति गुप्ता। बेटी रघुवंशिका के साथ स्मृति गुप्ता।

पुणे. इंटरनेशनल मदर्स डे पर हर मां को सम्मान दिया जाता है। मां सिर्फ वो नहीं होती जो बच्चे को जन्म देती है। बिन मां के बच्चे का जीवन संवारने वाली महिला भी उतने ही सम्मान के योग्य है। मदर्स डे के मौके पर हम एक ऐसी ही मां से आपको मिलवा रहे हैं।

इंजीनियरिंग जॉब छोड़ बच्चों पर दे रही हैं ध्यान

- 37 साल की स्मृति गुप्ता पुणे में रहती हैं। पेशे से इलेक्ट्रिकल इंजीनियर रहीं स्मृति साल 2014 तक विकीमीडिया फाउंडेशन के लिए यूरोप में जॉब कर रही थीं। लेकिन फिर उन्होंने अपनी लाइफ का सबसे बड़ा कदम उठाते हुए जॉब छोड़ दी और होमटाउन पुणे आकर सैटल हो गईं।
- इस एक्सट्रीम स्टेप की वजह उनकी ममता है। एक इंटरव्यू में स्मृति ने बताया, "मैंने अपने हसबैंड के साथ मिलकर दो बच्चियों को गोद लिया है। मुझे लगता था कि मैं जॉब के साथ दोनों पर ध्यान नहीं दे पा रही। साथ ही मैं उन बच्चों की भी मदद करना चाहती थी, जो अभी भी अडॉप्शन सेंटर में अपने 'मम्मी-पापा' का इंतजार कर रहे हैं। इसलिए चार साल पहले मैंने जॉब छोड़ने का फैसला ले लिया और पुणे सेटल हो गई।"
- हाईप्रोफाइल जॉब छोड़ चुकीं स्मृति पुणे में अडॉप्शन एक्टिविस्ट और काउंसिलर का काम कर रही हैं। वो उन कपल्स की काउंसलिंग करती हैं, जो कि बच्चे अडॉप्ट करना चाहते हैं।

कैसे बनीं अडॉप्शन एक्टिविस्ट

- स्मृति बताती हैं, "मुझे और मेरे हसबैंड को अपनी दोनों बच्चियों को अडॉप्ट करने के लिए लिए अडॉप्शन सेंटर के कई चक्कर काटने पड़े। हम यूरोप से यहां स्पेशली अपनी बेटियों का अडॉप्शन प्रॉसेस पूरा करने के लिए आते थे। फाइनली लीगल प्रॉसेस तो पूरा हो गया, लेकिन इसी दौरान मुझे यह देखने को मिला कि हमारे देश में अडॉप्शन को लेकर आज भी लोगों में कितनी झिझक है। वो जल्दी इन बच्चों को अपनाने को तैयार नहीं होते। तो मैंने इसी फील्ड में बच्चों की मदद करने की ठान ली।"

तीन महीने की बच्ची छोड़ गया था पिता

- स्मृति बताती हैं, "मैं फैमिलीज ऑफ जॉय फाउंडेशन से जुड़ी हूं, जो कि कपल्स में अडॉप्शन को प्रमोट करती है। अडॉप्शन प्रॉसेस कई वजहों से मुश्किल बन जाता है। मेरे सामने की बात है, तीन साल पहले एक पिता अपनी तीन महीने की बच्ची को यह कहकर छोड़ गया था कि मैं इसकी देखभाल नहीं कर सकता। मैं दूसरी शादी कर लूंगा तो इसे ले जाऊंगा। आज तीन साल हो चुके हैं, लेकिन वो कभी बच्ची से मिलने तक नहीं आया। या तो उसने अब तक शादी नहीं की है या बच्ची को भूल चुका है। ऐसे में इस बच्ची को कोई चाहकर भी अडॉप्ट नहीं कर सकता, क्योंकि अब तक इस पर पेरेंट्स के राइट खत्म नहीं हुए हैं।"
- स्मृति के मुताबिक बच्चों की मुश्किलें तब और बढ़ जाती हैं जब उसमें कोई डिसेबिलिटी या डिफॉर्मिटी होती है।
- स्मृति के इस जज्बे की सभी सराहना करते हैं।

Mother who quit job for adopted daughters
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बेटी रघुवंशिका के साथ स्मृति गुप्ता।बेटी रघुवंशिका के साथ स्मृति गुप्ता।
Mother who quit job for adopted daughters
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