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पुणे: देहू से पंढरपुर के लिए रवाना हुई पालकी यात्रा, भक्त पैदल चलेंगे 250 किलोमीटर

यह पालकी यात्रा 8 जुलाई को पुणे पहुंचेगी।

Dainikbhaskar.com | Last Modified - Jul 05, 2018, 04:35 PM IST

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    पालकी यात्रा के दौरान हजारों श्रद्धालु देहू में मौजूद रहेंगे।

    पुणे.देहू से पंढरपुर के लिए जाने वाली तकरीबन 250 किलोमीटर की पवित्र 'पालकी यात्रा' गुरुवार से शुरू हुई। 21 दिवसीय यह पैदल यात्रा पंढरपुर विठोबा मंदिर में आषाढ़ी एकादशी के दिन यानी 22 जुलाई को समाप्त होगी। यह पालकी यात्रा 8 जुलाई को पुणे पहुंचेगी।

    700 साल पुरानी है यह यात्रा
    - कहा जाता है कि पालकी यात्रा आज से तकरीबन 700 साल पहले शुरू हुई थी। पालकी आज रात इनामदार वाड़ा में रुकेगी। इसके बाद कल पिंपरी शहर के लिए रवाना होगी। इस बार इस यात्रा में तकरीबन 350 डिंडीयां शामिल हैं। इसमें महाराष्ट्र समेत देश के कोने-कोने से श्रद्धालु संत तुकाराम और संत ज्ञानेश्वर की पालकी लेकर पंढरपुर आते हैं।

    कई इलाकों में यातायात प्रतिबंधित
    - पालकी यात्रा को देखते हुए शहर के कई इलाकों में कई दिनों तक यातायात प्रतिबंधित रहेगा। लाखों की संख्या में यात्रा में शामिल वारकरी(भक्त) बिना भूख-प्यास की चिंता किए बिना विट्ठल-विट्ठल रट लगाते हुए वे आगे बढ़ते हैं। हर रोज पालकी 20 से 30 किलोमीटर का रास्ता तय करके सूर्यास्त के साथ विश्राम के लिए रुक जाती है। इस यात्रा के दर्शन के लिए पूरे 250 किलोमीटर के रास्ते पर दोनों ओर लोगों की भारी भीड़ होती है।

    पंढरपुर को कहा जाता है दक्षिण का काशी
    - महाराष्ट्र के सोलापुर जिले में भीमा नदी के तट पर महाराष्ट्र का प्रसिद्ध धार्मिक स्थल पंढरपुर स्थित है। पंढरपुर को दक्षिण का काशी भी कहा जाता है। पद्मपुराण में वर्णन है कि इस जगह पर भगवान श्री कृष्ण ने 'पांडुरंग' रूप में अपने भक्त पुंडलिक को दर्शन दिए और उसके आग्रह पर एक ईंट पर खड़ी मुद्रा में स्थापित हुए थे। हजारों सालों से यहां भगवान पांडुरंग की पूजा चली आ रही है, पांडुरंग को भगवान विट्ठल के नाम से भी जाना जाता है।

    पंढरपुर में लगता है बड़ा मेला
    - पंढरपुर में एक वर्ष में चार बड़े मेले लगते हैं। इन मेलों के लिए वारकरी लाखों की संख्या में इकट्ठे होते हैं। चैत्र, आषाढ़, कार्तिक, माघ, इन चार महीनों में शुक्ल एकादशी के दिन पंढरपुर की चार यात्राएं होती हैं। आषाढ़ माह की यात्रा को 'महायात्रा' या 'पालकी यात्रा' कहते हैं। इस में महाराष्ट्र ही देश के कोने-कोने से लाखों भक्त गाते-झूमते पैदल पंढरपुर आते हैं। संतों की प्रतिमाएं, पादुकाएं पालकियों में सजाकर वारकरी अपने साथ लेकर चलते हैं।

    कई जगहों से शुरू होती है पालकी यात्रा
    - संत ज्ञानेश्वर महाराज की पालकी यात्रा जैसी करीब एक सौ यात्राएं अलग-अलग संतों के जन्म स्थान या समाधि स्थान से प्रारंभ होकर पैदल पंढरपुर पहुंचती है। देहू ग्राम से संत तुकाराम महाराज की पालकी निकाली जाती है। जलगांव से संत मुक्ताबाई की, शेगांव से संत गजानन महाराज की, पैठण क्षेत्र से संत एकनाथ महाराज की, सतारा सज्जनगढ़ से समर्थ रामदास जी की पालकी पंढरपुर आती है। यह सारी पालकियां पंढरपुर के नजदीक वाखरी गांव में यात्रा के एक दिन पहले पहुंचती हैं। वहां पर एक बड़ी परिक्रमा का आयोजन किया जाता है। इस दौरान लाखों श्रद्धालु यह परिक्रमा देखने तांता लगाते हैं। इसके बाद पालकियां पंढरपुर पहुंचती हैं।

    शामिल होते हैं विदेशी भक्त
    - इस पालकी समारोह का आकर्षण भारत के ही नहीं बल्कि विदेशों के लोगों में भी आकर्षण है। वारी पर रिसर्च करने के लिए अबतक जर्मनी, इटली जापान, जैसे कई लोग वारी में शामिल हो चुके हैं। हर साल कई विदेशी लोग इस वारी में शामिल होते हैं।

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