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इस गांव में 1000 जमाई, चुनाव में कोई नहीं उतरा:दामाद बोले-इन्होंने अपनी बेटियां ही दे दी, अब सरपंची लेकर क्या करेंगे?

भोपाल5 महीने पहलेलेखक: नीलेंद्र पटेल

मध्यप्रदेश का दामादों वाला गांव नूरगंज। भोपाल से करीब 40 किमी दूर। पंचायत चुनाव में यह गांव अनूठेपन के कारण चर्चा में है। यहां कुल 2500 वोटर हैं। इनमें से 1000 दामाद और उनके परिजन हैं। सरपंच पद के लिए 12 कैंडिडेट मैदान में हैं लेकिन इनमें यहां का दामाद एक भी नहीं है। चुनाव में खड़े न होने के सवाल पर दामादों ने कहा- जब इन लोगों ने अपनी बेटी ही दे दी है तो अब सरपंची लेकर क्या करेंगे? हम उनका हक नहीं छीनेंगे। दैनिक भास्कर के चुनावी रथ और टीम ने इस गांव का जायजा लिया। पढ़िए इस गांव की कहानी...

रायसेन जिले के नूरगंज में करीब 30 साल पहले शादी के बाद ससुराल में बसने की ऐसी परंपरा चली कि 40 प्रतिशत दामाद इसी गांव में बस गए। इसकी आबादी करीब 4 हजार है। चुनावी माहौल में गांव की समस्याओं के साथ घर जमाई भी मुद्दा बने हुए हैं। गांव वाले दबी जुबान से कह रहे कि दामादों ने गांव की सरकारी जमीनों पर कब्जा कर घर बना रखा है। इनके अतिक्रमण की वजह से सार्वजनिक उपयोग की जमीन नहीं बची।

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बेटियों को संपत्ति में हिस्सा देते हैं
नूरगंज के पूर्व सरपंच गोरेलाल वर्मा बताते हैं कि औद्योगिक क्षेत्र मंडीदीप पास ही है। दामाद रोजी-रोजगार के लिए पहले गांव में रुकते हैं। धीरे-धीरे यहीं बस जाते हैं। गांव के विनोद कुमार मालवीय ने दावा किया कि उनके गांव में अधिकतर लोग बेटियों को भी लड़के की तरह संपत्ति में हिस्सा देते हैं। यह भी दामादों के यहां बसने की बड़ी वजह है।
सेना से रिटायर्ड जवान समेत 12 प्रत्याशी
नूरगंज में सरपंच का पद की सामान्य पुरुष के लिए है। पंचायत में सेमरा, इटावा खुर्द गांव भी शामिल हैं। सीट से चुनाव लड़ रहे प्रत्याशियों में सेना से रिटायर्ड राजीव शर्मा, अनिल लोवंशी, कपिल गुर्जर, कुंवर नागर, खरे नागर, जीवन नाथ, राजकुमार लोवंशी, मोहन नगर समेत 12 प्रत्याशी हैं। 39 साल के राजीव दो साल पहले सेना से रिटायर हुए हैं। राजीव बताते हैं कि जब भी वो छुट्टियों में घर आते थे तो गांव कि समस्याएं देखने को मिलती थीं। शिकायत करने पर भी सुनवाई नहीं होती थी, उन्हें लगता था कि सिस्टम के भीतर आकर ही व्यवस्थाएं ठीक होंगी। इसलिए स्वेच्छा से रिटायरमेंट लेकर लौटे हैं। अब सरपंच बनकर गांव वालों की सेवा करना चाहते हैं। 8 जुलाई को गांव में मतदान होगा।

नूरगंज गांव की सड़कें बदहाल हैं। यहां बारिश के दिनों में बहुत परेशानी होती है।
नूरगंज गांव की सड़कें बदहाल हैं। यहां बारिश के दिनों में बहुत परेशानी होती है।

टंक्या से नूरगंज हुआ, अब रूप नगर की मांग
पूर्व सरपंच गोरेलाल वर्मा ने बताया कि नूरगंज से पहले इस गांव का नाम टंक्या था। हमारा गांव भोपाल रियासत का हिस्सा हुआ करता था। तब नवाब ने गांव का नाम बदलकर नूरगंज कर दिया। नूरगंज नाम रखने के पीछे की वजह वे नहीं बता सके। ग्रामीणों ने कहा अब लोकतंत्र है, गांव का नया नाम भी होना चाहिए। उन्होंने नूरगंज नाम बदलकर रूप नगर करने की मांग की है। इसका प्रस्ताव भी जिला मुख्यालय पर भेजा जा चुका है।

गांव वालों का ऐसा प्यार मिला कि यहीं बस गए
नूरगंज में शादी के बाद से ससुराल में जमाई बनकर रह रहे ओम प्रकाश प्रजापति कहते हैं कि यहां के लोगों का प्यार ऐसा था कि शादी के बाद यहीं रहने का विचार बन गया। चुनाव नहीं लड़ने के सवाल पर उन्होंने कहा कि जब इन लोगों ने अपनी बेटी ही दे दी है तो अब सरपंची लेकर क्या करेंगे? हम उनका हक नहीं छीनेंगे। वे अपनी ससुराल से मिली संपत्ति पर रह रहे हैं।

नूरगंज गांव में चुनावी चर्चा करते ग्रामीण।
नूरगंज गांव में चुनावी चर्चा करते ग्रामीण।

अब भी पीने के पानी की समस्या
गांव में पीने के पानी की समस्या सालों से बनी हुई है। दो साल पहले दूषित पानी पीने के चलते सात लोगों की जान चली गई थी। 50 लोग बीमार हो गए थे। इसके बाद शुद्ध पानी के लिए गांव में व्यवस्था शुरू हुई। अक्टूबर 2021 से पाइपलाइन बिछाने का काम शुरू हुआ। पानी की टंकी का ढांचा बना है, लेकिन मोटर अभी नहीं लगी। इससे पानी सप्लाई शुरू नहीं हो सकी। पानी या तो टैंकर से मंगाना पड़ता है, या जिसके घर में बोरवेल है, वहां से भरना पड़ता है। नई पाइपलाइन प्लास्टिक के हैं लेकिन वो भी नाली के भीतर से ही जा रहे हैं।