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बांस की कमी से दम तोड़ रहा समाज का व्यवसाय

जब से शासन ने बांस का राष्ट्रीयकरण किया है और रेंज से बांस मिलना कम हुए हैं तब से बांस से विभिन्न उत्पाद तैयार करने...

Danik Bhaskar | Mar 31, 2018, 03:15 AM IST
जब से शासन ने बांस का राष्ट्रीयकरण किया है और रेंज से बांस मिलना कम हुए हैं तब से बांस से विभिन्न उत्पाद तैयार करने वालों का पुस्तैनी व्यवसाय दम तोड़ता नजर आ रहा है। रही सही कसर प्लास्टिक से बने सूपों एवं डलियों आदि ने पूरी कर दी है। जिस कारण वंशकार लोग मजदूरी कर अपने परिवार का पालन पोषण करने मजबूर हैं।

नगर सहित ग्रामीण क्षेत्रों में बांस से डलिए , सूपे, टोकरियां, पिटारी आदि तैयार करने वाले परिवारों की स्थिति ठीक नहीं है। करीब 5 साल से वन विभाग से भी उन्हें बांस कम मात्रा में उपलब्ध कराया जा रहा है। जिस कारण 10 गुना अधिक दामों पर बांस क्रय कर उक्त वस्तुएं निर्मित की जा रहीं हैं। जिसमें लागत अधिक आ रही है। जहां वन विभाग से एक बांस 25 से लेकर 50 तक मिलता था वह अब बाजार में 50 से 80 रुपए तक मिल रहा है। जहां एक ओर शासन लोगों को स्व रोजगार उपलब्ध कराने के लिए विभिन्न प्रशिक्षण कार्यक्रम चला रही है। वहीं वंशकार समाज अपना पारंपरिक व्यवसाय बचाने के लिए जद्दोजहद कर रहा है। लेकिन उन्हें पर्याप्त मात्रा में बांस नहीं मिल पा रहा। वन कार्यालय में बांस तो आ रहा है पर जिस बांस से यह सामग्री निर्मित होती है वह उपलब्ध नहीं है। बांस से सामग्री तैयार करने वाले हदाईपुर निवासी करोड़ीलाल एवं शिवचरन तथा खिरिया नारायण दास टेकरी निवासी मुन्ना का कहना है कि हमारे परिवारों का पालन पोषण बांस से निर्मित सामग्री के विक्रय से होता है जिसे हम दोनों पति प|ी तैयार करते हैं लेकिन जो बांस हमें चाहिए वह बांस रेंज द्वारा नहीं दिया जा रहा। जिससे महंगा बांस खरीदना पड़ता है। शासन हमें कोई अन्य रोजगार उपलब्ध कराए।