अवैध उत्खनन से नदी किनारे नहीं बची रेत, तरबूज का रकबा 40 हे. पर सिमटा

Betul News - मौसमी फल तरबूज का जायका इस बार लाेगाें काे महंगा पड़ेगा। पानी की कमी से ब्लाॅक में इस बार तरबूज का क्षेत्र अब तक 40...

Bhaskar News Network

Feb 14, 2019, 04:37 AM IST
SHAHAPUR News - mp news the untouched sand the sand of the watermelon is not 40 km away from the illegal excavation but on
मौसमी फल तरबूज का जायका इस बार लाेगाें काे महंगा पड़ेगा। पानी की कमी से ब्लाॅक में इस बार तरबूज का क्षेत्र अब तक 40 हेक्टेयर में ही दिख रहा है।

खेतों में से तरबूज इस बार लगभग गायब है। केवल तवा नदी में ही तरबूज बाड़ियां लगी नजर अा रही हैं। बीते साल में तरबूज का क्षेत्र 150 से 200 हेक्टेयर के बीच रहता था, लेकिन इस बार न खेतों में तरबूज दिख रहा है न माचना किनारे बाड़ियां दिख रही हैं। तरबूज की फसल इस बार पानी से प्रभावित हुई है। इसका कारण पानी की कमी तो है ही, रेत के अवैध कारोबार के चलते नदी किनारों पर रेत नहीं बची, इससे किसान तरबूज की फसल नहीं लगा पा रहे।

ये है तरबूज का गणित

ब्लॉक में मांझी कहार समाज नदियों के किनारे पुश्तैनी रूप से तरबूज की बाड़ियां लगाता था। धीरे- धीरे इसका स्वरूप बदल गया और नदियों के साथ खेतों में भी तरबूज की पैदावार ली जाने लगी। कहार समाज के अलावा आदिवासी और अन्य लोग भी तरबूज की खेती से जुड़ गए।

सरकार से मांगी सुविधा

माझी समाज ने बीते दिनों एक ज्ञापन देकर नदियों में बाड़ियों के पट्टे अाैर खाद-बीज की सुविधा देने संबंधी मांग की है।

शाहपुर। माचना नदी के किनारे नहीं लगी तरबूज की बाड़ी।

प्रति हेक्टेयर हाेती है 30 टन तरबूज की पैदावार

1 हेक्टेयर में तरबूज लगाने पर करीब 30 हजार की लागत आती है। वहीं करीब 30 टन प्रति हेक्टेयर की पैदावार मिलने से किसान की लागत निकल जाती थी और आर्थिक लाभ हो जाता था। इस बार तस्वीर बदल गई है। खेतों में रबी फसलों के लिए पानी नहीं है। नदी में तरबूज की फसल लेने वाले रामकिशोर कहार का कहना है कि रेत के कारोबार से नदी में तरबूज बाड़ियां लगने का काम प्रभावित हुआ है। जहां बाड़ियां लगती थीं, वहां रेत खत्म होने से बाड़ी खत्म हो रही हैं। रेत के अंधाधुंध दोहन से नदी में जल संचय कम हो रहा है। खुद की बाड़ी में पत्थर और गड्ढे हैं।

किसानों को शिकायत पर ही पट्टे दिए जाएंगे


इस बार तरबूज का रकबा हाे रहा कम


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