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कृपाल सिंह महाराज का मनाया जन्मोत्सव, रोपे पौधे

सावन कृपाल रूहानी मिशन संगठन के द्वारा रविवार को राजिंदर आश्रम परिसर सर्किट हाउस के पीछे संत कृपालसिंह महाराज का...

Dainik Bhaskar

Apr 02, 2018, 02:05 AM IST
कृपाल सिंह महाराज का मनाया जन्मोत्सव, रोपे पौधे
सावन कृपाल रूहानी मिशन संगठन के द्वारा रविवार को राजिंदर आश्रम परिसर सर्किट हाउस के पीछे संत कृपालसिंह महाराज का 124वां जन्मोत्सव कार्यक्रम आयोजित किया गया। जिसको श्रद्धालुओं के द्वारा धूमधाम से मनाया गया। इस दौरान संगठन की ओर से आश्रम में पौधा रोपण किया गया। वहीं सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए गए।

रविवार को जन्मोत्सव के अवसर पर सुबह 8 बजे संगठन की ओर आश्रम में फलदार और छायादार पौधे रोपे गए। इस दौरान मुख्यअतिथि रामजीलाल सांखला ने कहा वातावरण को शुद्ध रखने और संतुलन बनाए रखने में पेड़-पौधे अहम भूमिका निभाते हैं। ये मिट्टी का कटाव रोकते हैं और नमी बनाए रखते हैं। जहां पेड़-पौधों की संख्या ज्यादा होती है वहां बरसात में अच्छी बारिश होती है। पेड़ों को जीवन का आधार कहा जाता है। अगर पृथ्वी पर पेड़-पौधे नहीं रहेंगे तो वह वीरान हो जाएगी। लेकिन इन बातों की जानकारी लोगों होने के बाद भी वे पेड़-पौधों को काटने में लगे हुए हैं। यह हमारे लिए दुखद है।

कार्यक्रम

सावन कृपाल रूहानी मिशन संगठन की ओर से कृपाल महाराज के जन्मोत्सव पर सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए गए

सैकड़ों श्रद्धालु शिविर में हुए शामिल

जन्मोत्सव कार्यक्रम के दौरान संगठन की ओर से आश्रम में सुबह 9 से 10 बजे ध्यान शिविर का आयोजन किया गया। इस दौरान सैकड़ों की संख्या में श्रद्धालु शिविर में ध्यान लगाने के लिए शामिल हुए। साथ ही उन्होंने नियमित ध्यान लगाने का संकल्प लिया।

जीवन में नेक काम करना चाहिए

आयोजित कार्यक्रम के दौरान प्रवचन देते हुए संत रामजीलाल सांखल ने कहा कि 84 लाख योनियों के बाद मनुष्य योनी में जन्म मिलता है। इसलिए हम लोगों को अपने जीवन में नेक काम करना चाहिए। इस पृथ्वी पर 84 लाख योनियों का निर्माण किया जिनमें मनुष्य योनि सर्वश्रेष्ठ है। संसार का सुख क्षणिक व अस्थाई है। सभी जीवों का उद्देश्य है सुख आनंद, शांति प्रदान करना वास्तविक सुख के केंद्र तो भगवान हैं। उन्हें प्राप्त करने के साधन कर्म, ज्ञान, योग व उपासना है। इन सभी साधनों में भक्ति सर्व सुलभ व सरल है। उन्होंने चारों युगों के बारे में बताया कि सतयुग में श्री हरि के स्वरूप का ध्यान कर, त्रेता युग में यज्ञ द्वारा, द्वापर युग में भगवान की पूजा अर्चना भगवान की प्राप्ति होती थी और कलयुग में तीनों युगों के साधन अपनाना कठिन है। क्योंकि मनुष्यों की आयु अल्प होती है। द्रव्य व शुद्ध वस्तु का अभाव होता है। इसके बाद संगठन की ओर से सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन हुआ। वहीं अंत में गुरु लंगर में सैकड़ों लोगों ने प्रसादी ग्रहण की।

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