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पॉकेट डायरियों में चल रहे पोस्ट आॅफिस के खाते, ग्राहकों को एजेंट नहीं देते पासबुक

डाकघर में दस्तावेज जांचते अिधकारी-कर्मचारी। तीन उदाहरण जो बताते हैं कि किस तरह एजेंट पॉकेट डायरियों में चला...

Danik Bhaskar | Mar 04, 2018, 03:10 AM IST
डाकघर में दस्तावेज जांचते अिधकारी-कर्मचारी।

तीन उदाहरण जो बताते हैं कि किस तरह एजेंट पॉकेट डायरियों में चला रहे डाकघर के खाते

1. हाउसिंग कॉलोनी निवासी मनुराज श्रीवास्तव ने अपनी मां अनीता के नाम से चार साल पहले एजेंट के कपूर के माध्यम से डाकघर में एक खाता खुलवाया है। चार साल वे नियमित रूप से प्रति महीने किस्त भर रहे हैं। लेकिन उन्हें आज तक एजेंट ने खाते की पासबुक नहीं दिखाई है। एक पॉकेट डायरी पर एजेंट किस्त के पैसे लेकर हाथ से चढ़ा देता है।

डाकघर घोटाले की जांच में पीड़ित खातेदारों ने बयां की यह पीड़ा

भास्कर संवाददाता | भिंड

डाकघर में खाता खुलवाने वाले ज्यादातर खाताधारकों को एजेंट उनकी असली पासबुक देते ही नहीं हैं। हालत यह है कि खाता खुलने से लेकर मियाद पूरी होने तक खाताधारकों को पासबुक देखने तक को नहीं मिलती। हाल ही में डाकघर में हुए घोटाले में सामने आया कि ज्यादातर खाताधारकों के पास डाकघर से दी जाने वाली पासबुक नहीं है। उनके पास एजेंट द्वारा दी गई कच्ची डायरियां ही हैं। यह बात पीड़ित खाताधारकों ने डाकघर घोटाले की जांच कर रही टीम के सामने भी कही। इसके बावजूद डाकघर के अधिकारी इस ओर गौर नहीं कर रहे हैं।

शहर के गल्ला मंडी डाकघर में हुए घोटाले के बाद जब लोग बयान दर्ज कराने पहुंचे तो अधिकांश के पास खाता नंबर नहीं था। कारण यह था कि उनके पास अपने खाते की पासबुक ही नहीं थी। इस वजह से वे अपने बयान दर्ज नहीं करा पाए। वहीं जब दैनिक भास्कर ने इस मामले में पड़ताल की है तो शहर में डाकघर के 90 प्रतिशत खाताधारक ऐसे सामने आए, जिन्होंने डाकघर में खाता खुलवाने के बाद पासबुक ही नहीं देखी है। वे सिर्फ प्रति महीने एजेंट को किस्त के पैसे दे रहे हैं। पैसा उनके खाते में जमा हो रहा है अथवा नहीं यह भी उन्हें पता नहीं। पूरा कारोबार सिर्फ विश्वास पर चल रहा है। लेकिन यह विश्वास कभी टूटा तो खाता धारकों के पास हाथ मलने के अलावा कुछ शेष नहीं होगा। वजह यह है कि हाल ही में चल रही डाकघर घोटाले की जांच में विभाग के अधीक्षक एसके पांडेय भी यह स्पष्ट कर चुके हैं कि यदि गड़बड़ी विभागीय कर्मचारियों की वजह से हुई है तो विभाग खाताधारकों को पैसा लौटाएगा।

2. कान्हा होटल के समीप कपड़ा व्यवसायी अशोक जैन का भी तीन हजार रुपए महीने का खाता एजेंट शैलेष जैन के माध्यम से डाकघर में पांच साल पहले खाता खुलवाया था। उन्होंने भी आज तक अपने खाते की पासबुक नहीं देखी है। बस उन्हें यह पता है कि उनके खाते की समय सीमा पूरी हो गई है। अब उन्हें भुगतान मिलने वाला है।

3. शहीद चौक निवासी रामू जैन ने चार साल पहले अपने डाकघर में एजेंट आनंद जैन के माध्यम से 1500 रुपए प्रतिमाह खाता खुलवाया था। खाते की पासबुक उनके पास भी नहीं है। हालांकि उनका कहना है कि डेढ़ साल पहले एक बार उन्होंने एजेंट से पासबुक दिखाने के लिए कहा था। तब उसने दिखाई थी। पैसे वह भी पॉकेट डायरी पर हाथ से चढ़ाता है।

यह है नियम: एजेंट को किस्त जमा कर प्रपत्र पर भरना होती है जानकारी

यहां बता दें कि अल्प बचत एजेंट को किसी भी खाताधारक का डाकघर में खाता खुलवाने के बाद जब उसकी किस्त जमा करता है, तब वह निर्धारित प्रपत्र पर उसकी जानकारी भरता है। साथ ही किस्त डाकघर में जमा करने के बाद पासबुक संबंधित खाताधारक को लौटा देता है। वहीं निर्धारित प्रपत्र से एक पावती एजेंट को मिलती है। जो कि वह अपने रिकार्ड में रखता है। जिले में ऐसा नहीं हो रहा है। एजेंट खाताधारकों की पासबुक ही अपने पास जमा रखते हैं।

एजेंट कोई, किस्त लेता है दूसरा

खास बात तो यह है कि डाकघर में अधिकांश पुरुष महिला एजेंट के नाम पर काम कर रहे हैं। कारण यह है कि अल्प बचत एजेंट बनने के लिए महिला को जहां ब्याज में ज्यादा छूट है। वहीं वे एफडी और आरडी दोनों ही कर सकती है। जबकि पुरुष एजेंट को सिर्फ एफडी करने का ही अधिकार है।

ग्राहक को एजेंट से पासबुक मांगनी चाहिए


एजेंट ब्याज पर चला देते हैं पैसा

जानकारों की मानें तो शहर में कई डाकघर एजेंट खाता धारकों से उनकी किश्त का पैसा लेकर डाकघर में जमा करने के बजाए उसे बाजार में ब्याज पर बांट देते हैं। बताया जा रहा है कि डाकघर में 50 पैसा प्रति सैकड़ा का ब्याज खाता धारक को मिलता है। जबकि बाजार में वे दो से ढाई रुपए सैकड़ा के हिसाब से बाजार में ब्याज वसूल करते हैं।