501 कलश धारण कर गाजे-बाजे के साथ निकले श्रद्धालु

Bhaskar News Network

May 18, 2019, 07:26 AM IST

Bhind News - भास्कर संवाददाता | दौनियापुरा/गोहद ग्राम पंचायत मानहड़ में शुक्रवार को कलश यात्रा के साथ श्रीमद भागवत कथा का...

Gohad News - mp news 501 pilgrims accompanying karan
भास्कर संवाददाता | दौनियापुरा/गोहद

ग्राम पंचायत मानहड़ में शुक्रवार को कलश यात्रा के साथ श्रीमद भागवत कथा का आयोजन प्रारंभ किया गया। कलश यात्रा में 501 श्रद्धालु महिलाओं ने सिर पर कलश धारण किए। आगे गाजे-बाजे के साथ श्रद्धालु भगवान श्रीकृष्ण के भजनों पर नृत्य करके चले और पीछे कथा व्यास राम भद्राचार्य घोड़ी पर सवार होकर निकले। शोभा यात्रा का गांव में जगह-जगह फूलों से स्वागत किया गया। पूरा गांव इस यात्रा में भक्ति के रंग में दिखाई दिया। क्या बच्चे क्या जवान सभी भक्तिमय गीतों पर झूम रहे थे। यात्रा के समापन पर पंडित रामभद्राचार्य महाराज ने पहले दिन श्रोताओं को भागवत का महत्व बताया।

कथा वैष्णव भक्तों का परम धन

गोहद के विजयपुरा में चल रही संगीतमयी श्रीमद भागवत कथा के सातवें दिन शुक्रवार को व्यास कृष्णकांत कौशिक कान्हाजी महाराज ने पांडवों का राजकीय यज्ञ, राजा नृग की कथा, सुदामा चरित्र, परीक्षित मोक्ष और भागवत सार को सविस्तार सुनाया। महाराज ने कथा में कहा कि भागवत की कथा बड़े भाग्य से सुनने को प्राप्त होती है। कथा रसिक वैष्णव भक्तों का परम धन है। ये भागवत की कथा शेरनी के दूध जैसी होती है। शेरनी के दूध की यह खासियत होती है कि उसे या तो शेरनी के बच्चे के पेट में अथवा सोने के कटोरे में रखा जाता है। इसके अतिरिक्त कहीं रखे जाने पर वह खराब हो जाता है। इसी तरह भागवत की कथा है, जिसमें कथा कहने वाले और कथा सुनने वाले पात्र की प्रधानता है। कौशिक महाराज ने कहा कि कथा सुनने वाला और कथा सुनाने वाला कौन है कैसा है यह महत्वपूर्ण बात नहीं है। कथा कर्मनिष्ठ ब्राह्मणों की वाणी में और कथा रसिक एवं भावुक भक्तों के हृदय में ही स्थान बनाती है। इसी से मानव मात्र का कल्याण होता है।

सुदामा जन्म से गरीब थे

कथा में व्यासजी ने आगे बताया सुदामा बचपन से गरीब परिवार में पले बड़े थे। उनका जीवन सदाचार के मार्ग पर रहा। परिवार में बच्चों और प|ी को भूखा देखकर भी उनके मन में कभी लालच नहीं आया। सदैव भिक्षा मांगकर ही जो मिलता उसमें परिवार का भरण पोषण करते थे और प्रभु का गुणगान करते। सुदामा की तरह संसार में प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्तव्य को समझ ले तो कलियुग का अंत हो जाएगा। परंतु निर्गुणी व्यक्ति केवल अपने अहम को आगे रखकर घोर अहंकारी हो गया है। यह अहंकार ही उसके पतन का कारण बन जाता है। कथा के आखिरी दिन श्रोताओं की भीड़ उमड़ी। कथा में कपूरसिंह जादौन परीक्षत रहे।

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