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7 करोड़ रुपए से गोहद के किले का कराया 70% जीर्णोद्धार, पर्यटन को मिलेगा बढ़ावा

Bhind News - गाेहद किला जीर्णोद्धार के बाद सौंदर्य स्थिति में दिखता। भदावर राजाओं ने बनाया था शिव मंदिर किले के अंदर...

Aug 19, 2019, 07:20 AM IST
गाेहद किला जीर्णोद्धार के बाद सौंदर्य स्थिति में दिखता।

भदावर राजाओं ने बनाया था शिव मंदिर

किले के अंदर भगवान शिव का शिवलिंग बरसात में मिट्‌टी धंसकने पर देखने को मिला था। जिसकी स्थापना भदावर महाराज के कार्यकाल में की गई थी। किले का इतिहास काफी उतार चढ़ाव वाला रहा है। इस पर भदौरिया राजाओं का आधिपत्य 34 साल तक रहा है। पुराने किले में परिवर्तन किया गया। 1505 में ग्वालियर के महाराज मानसिंह तोमर ने सिंघन देव को जाट सरदार की जागीर दी थी। 16वीं शताब्दी तक राज इनका रहा। जिस पर 16वीं शताब्दी में भदौरिया ने कब्जा कर लिया था। 1739 में ग्वालियर के मराठा राजाओं के सहयोग से महाराजा भीम सिंह राणा ने किले को दोबारा अपने कब्जे में ले लिया। डॉ. रणधीर सिंह ने बताया महल में की गई शानदार नक्काशी आकर्षक है। पहले यहां बड़ी संख्या में टूरिज्म था, पर देखरेख के अभाव में और विभागीय उदासीनता के चलते धरोहर को ग्रहण लगता जा रहा है।

पूर्व प्रधान मंत्री अटल बिहारी इस किले में संचालित स्कूल में पढ़े हैं

किले में ही जाट राजाओं के समय स्थापित किया गया प्राथमिक विद्यालय आज भी संचालित है। समाजसेवी दिलीप सिंह राणा बताते हैं कि इस स्कूल में भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जैसे महान लोगों ने शिक्षा प्राप्त की है। विद्यालय में सैकड़ों छात्र पढ़ाई करने आते हैं, लेकिन देखरेख के अभाव में असामाजिक तत्व स्कूल में शिक्षा व्यवस्था प्रभावित कर देते हैं। रात के वक्त कभी शैक्षणिक सामग्री को नुकसान पहुंचाते हैं तो कभी किले में उत्पात मचाते हैं। इस संबंध में स्कूल के शिक्षकों ने भी प्रशासन से शिकायत की है, लेकिन उपद्रवियों पर ठोस कार्रवाई नहीं की गई है।

किले से बेसली नदी तक बनी है सुरंग

पुरातत्व विभाग द्वारा इस प्राचीन धरोहर को 7 करोड़ की लागत से नया रूप दिया जा रहा है। यह राशि पांच साल में खर्च की गई है। जिसमें हमाम खाना, हथियापौर, किले के ऊपर की छतरियां, गुम्मठ, किले का परकाेटा आदि पर पुरातत्व विभाग ने हूबहू किले को नए स्वरूप में ढालने का कुशल कारीगरों से काम कराया है। किले में ग्वालियर और धौलपुर पहुंचने के लिए विशेष सुरंग बनाई गई हैं। इसके अंदर ही भारी भरकम सामान को ले जाने के लिए रेल की पटरियां बनी हैं। एक सुरंग किले से सीधे बेसली नदी पर निकलती है। ऐसा बताया जाता है कि जाट राजाओं ने यह सुरंग इसलिए बनाई थी कि जब दुश्मन महल पर कब्जा कर ले तो इस रास्ते से होकर सुरक्षित बाहर निकल जाएं।

जाट, भदौरिया और मराठों के आधिपत्य में रहा किला

किले में सात भंवर, शयन कक्ष, देखने योग्य है। इन कक्षों में तापमान मौसम के अनुरूप, अनाज भंडार गृह, एक कुआं कभी न सूखने वाला, कलाकृति, फूलपत्ति, मेहराब आदि कलाकृतियां, बगीचे का निर्माण, देश का एकमात्र लक्ष्मण मंदिर लक्ष्मण ताल में है। राधा मोहन जी का मंदिर रानी का, लक्ष्मण राजा जी का मंदिर था। मध्य भारत में इस गोहद के किले का अत्यधिक सामरिक महत्व रहा है। किले पर अधिकांशतः जाट एवं भदावर राजाओं और फिर मराठों का अधिकार रहा है। वर्तमान में पुराना किला एवं नया महल मध्य प्रदेश सरकार के पुरातत्व विभाग के अधीन है और पुरातत्व विभाग द्वारा इसका अनुरक्षण कार्य कराया जाता है।

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