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चंबल की बाढ़ में रेत में दब गए थे कछुए के अंडे, बचाने किनारों पर ही बना दी हैचरी

Bhind News - भास्कर संवाददाता| भिंड/अटेर चंबल सेंक्चुरी में कछुआ की चित्रा इंडिका और निल्सोनिया गंगेटिका की मादा प्रजाति...

Nov 11, 2019, 06:25 AM IST
भास्कर संवाददाता| भिंड/अटेर

चंबल सेंक्चुरी में कछुआ की चित्रा इंडिका और निल्सोनिया गंगेटिका की मादा प्रजाति सितंबर से अक्टूबर माह के बीच अंडे देती हैं। इन अंडों को कछुआ पालन केंद्र के अधिकारी फारेस्ट कर्मचारियों की मदद से घाट के किनारे रेत से सुरक्षित बाहर निकाल रहे हैं। अंडों से निकले प्रजाति के बच्चों को सुरक्षित जीवन प्रदान करके नदी में छोड़ा जाएगा। अगर बच्चे कमजोर या बीमारी की हालत में बाहर निकलते हैं तो उन्हें पाेषण प्रदान करने के लिए कछुआ अनुसंधान केंद्र में कुछ दिनों तक रखा जाएगा। चंबल सेंक्चुरी में कछुआ प्रोजेक्ट के कॉर्डिनेटर डॉ हरिमोहन मीणा के अनुसार इस वर्ष बाढ़ आपदा अधिक होने से घाटों पर अधिक परिवर्तन आया है। जिससे कछुआ के अंडे रेत के अंदर 1 फीट तक गहराई में दब गए हैं। जिन्हें तलाश करने में टीम को मुश्किल हो रही है।

अंडों की सुरक्षा के लिए नदी किनारे घाटों पर ही इंसेटिव हैचरी(प्राकृतिक सुरक्षा) तैयार की गई है, जिसमें अंडों को रखा जाएगा। अंडों की देखभाल के लिए फाेरेस्ट विभाग के कर्मचारी तैनात किए गए हैं, जो इन अंडों को नष्ट होने से बचाएंगे। सेंक्चुरी में अटेर, बरही, सांकरी, बड़ापुरा, समन्ना आदि घाटों पर अंडे खोजे जा रहे हैं। पिछले साल इन दोनों ही प्रजाति के 2700 अंडों को सुरक्षित निकालकर नदी में छोड़ा गया था। सेंक्चुरी के सभी घाटों से इन अंडों की खोज कर बरोली घाट सबलगढ़ रैंज, बटेश्वर घाट मुरैना, उसैद घाट अंबाह और अटेर के सांकरी में हैचरी बनाकर संरक्षित किया गया था। डॉ. मीणा ने बताया कि इंडिका प्रजाति का मादा कछुआ एक बार में 150 से 202 अंडे देता है। यह प्रजाति सितंबर से अक्टूबर के बीच नदी में आईलेंड या किनारे पर अंडे देती हैं।

चंबल नदी के किनारे रेत में दबे कछुए के अंडों को निकालता वनरक्षक।

नदी के दूषित पदार्थों को नष्ट कर देता है कछुआ

अटेर के बरही घाट पर कछुआ पालन केंद्र बनाया गया है। डॉ. मीणा ने बताया नदी में जल प्रदूषण को दूर करने के लिए कछुआ की विभिन्न प्रजातियां महत्वपूर्ण हैं जो जल में कीटों और सीप के साथ दूषित पदार्थों को नष्ट करने में सहयोगी बनते हैं। इसके लिए कछुआ संरक्षण को बढ़ावा दिया गया है। खुले में कछुआ के 50 फीसदी अंडे हर साल नष्ट हो जाते हैं, जिन्हें बचाने का कार्य अब तेज गति से किया जा रहा है। नदी किनारे दिए अंडों को जैकॉल, कुत्ते, इंसान आदि से खतरा रहता है। सुरक्षा के लिए वनरक्षक राजकुमार ददोरिया जिम्मेदार संभाल रहे हैं।

प्रतिदिन 5 से 6 अंडे मिल रहे


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