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70 साल पहले आजादी के नारे लगाते हुए शहीद हुए 7 युवा, नहीं गिरने दिया तिरंगा

एक वर्ष पहले
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विलीनीकरण आंदोलन का प्रतीक शहीद द्वार।
  • भोपाल विलीनीकरण की आज 70वीं वर्षगांठ है। लंबे आंदोलन के बाद 1949 में भोपाल रियासत भारत में शामिल हुई थी 

भोपाल. 1949 की एक जून का यह दिन भोपाल कभी नहीं भूल सकता। समूचे देश को भले 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजों की गुलामी से आजादी मिली हो, पर भोपाल के लोगों को दो साल बाद आजादी नसीब हुई। इस आजादी के लिए तत्कालीन भोपाल रियासत के नवाब हमीदुल्ला खां की हठधर्मिता के खिलाफ लोगों को विलीनीकरण आंदोलन शुरू करना पड़ा।

 

आंदोलन इस कदर आगे बढ़ा कि इसमें कई लोगों की शहादत तक हुई। आंदोलन में जान गंवाने वाले लोगों में बरेली के पास स्थित बोरास के सात युवा भी थे, जिन्होंने तिरंगा फहराने का प्रयास किया तो नवाब भोपाल की पुलिस ने उन पर गोलियां बरसा दीं। बावजूद इसके ये युवा शहीद होने से पहले झंडा फहराने के अपने मकसद में कामयाब हो गए।

 

भोपाल रियासत के भारत गणराज्य में विलय में लगभग दो साल का समय इसलिए जाया हुआ कि भोपाल नवाब हमीदुल्ला खां इसे अपनी स्वतंत्र रियासत के रूप में ही रखना चाहते थे। ऐसा करने के लिए हैदराबाद निजाम उन्हें पाकिस्तान में विलय के लिए प्रेरित कर रहे थे, जो कि भौगोलिक दृष्टि से असंभव ही था। आजादी के इतने समय बाद भी भोपाल रियासतका विलय न होने से लोगों में रोष बढ़ने लगा था। यह गुस्सा कुछ ही दिनों में भाई रतन कुमार और डा. शंकरदयाल शर्मा की अगुवाई में विलीनीकरण आंदोलन की शक्ल में सामने आया। जिसने आगे जाकर उग्र रूप ले लिया और भोपाल, से लेकर सीहोर और बोरास तक आंदोलनकारी सड़कों पर आकर विरोध प्रदर्शन करने लगे।

 

भोपाल स्वातंत्र्य आंदोलन स्मारक समिति के सचिव डाॅ. आलोक गुप्ता के अनुसार भोपाल रियासत के भारत संघ में विलय के लिए चल रहे विलीनीकरण आन्दोलन की रणनीति और गतिविधियों का मुख्य केन्द्र रायसेन जिला था। रायसेन में ही उद्धवदास मेहता, बालमुकन्द, जमना प्रसाद, लालसिंह ने विलीनीकरण आन्दोलन को चलाने के लिए जनवरी-फरवरी 1948 में प्रजा मंडल की स्थापना की थी। रायसेन के साथ ही सीहोर से भी आंदोलनकारी गतिविधियां चलाई गईं। नवाबी शासन ने आन्दोलन को दबाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। आंदोलनकारियों पर तमाम जगह लाठियां चलवाई गईं। 

 

आज भी लगता है मेला 
डाॅ. गुप्ता ने बताया कि भोपाल रियासत के विलीनीकरण में जिले के बोरास में 4 युवा मौके पर और तीन बाद में शहीद हुए। पहले चारों शहीद 30 साल से कम उम्र के थे। । शहीद होने वालों में धनसिंह (25), मंगलसिंह (30) ,विशाल सिंह (25), छोटेलाल (16) शामिल था। इन शहीदों की स्मृति में उदयपुरा तहसील के ग्राम बोरास में नर्मदा तट पर 14 जनवरी 1984 में शहीद स्मारक स्थापित किया गया। नर्मदा के साथ-साथ बोरास का यह शहीद स्मारक भी शहीदों के प्रति श्रद्धा का केन्द्र बना हुआ है। प्रतिवर्ष यहां 14 जनवरी को मेला लगता है। 

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