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​स्कीम 171 में 29 साल पहले लिया प्लॉट, 18 साल लड़ी कानूनी लड़ाई, अब हक

आईडीए ने अपनी स्कीम 171 में 29 साल पहले प्लॉट अलॉट कर उसका कब्जा भी दे दिया।

मांगीलाल चौहान | Last Modified - Dec 29, 2017, 06:16 AM IST

  • ​स्कीम 171 में 29 साल पहले लिया प्लॉट, 18 साल लड़ी कानूनी लड़ाई, अब हक

    इंदौर .आईडीए ने अपनी स्कीम 171 में 29 साल पहले प्लॉट अलॉट कर उसका कब्जा भी दे दिया। फिर अपात्र बताकर अलॉटमेंट निरस्त कर दिया। लगभग 18 साल की कानूनी लड़ाई के बाद अंतत: हाई कोर्ट ने आईडीए की संपूर्ण कार्रवाई निरस्त कर प्लॉट का हक दिलाया।

    - हाई कोर्ट की इंदौर बेंच में जस्टिस रोहित आर्या की एकल पीठ ने कहा- ऐसी स्थिति में अदालत आंख बंद नहीं कर सकती।

    - प्राधिकरण मनमर्जी से अधिकार का उपयोग या भेदभाव नहीं कर सकता अन्यथा यह संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन होगा।

    - सीनियर एडवोकेट एके सेठी और एडवोकेट प्रतीक माहेश्वरी ने कोर्ट को बताया कि प्राधिकरण ने अदालत द्वारा पूूर्व में निराकृत दो याचिकाओं में अदालत के डायरेक्शन के अनुरूप प्रक्रिया नहीं अपनाई।

    - कोर्ट ने प्राधिकरण की संपूर्ण कार्रवाई निरस्त करते हुए तल्ख टिप्पणी की कि आपने उचित काम नहीं किया। प्लॉट 1988 में आवंटित था तो 18 साल बाद भाव नहीं बदला जा सकता।

    - आईडीए कानून द्वारा स्थापित संस्था है। उससे यह उम्मीद की जाती है कि वह कोई भी उचित और निष्पक्ष कार्रवाई करेगा।

    दो साल बाद कहा- आप इतने बड़े प्लॉट के हकदार नहीं, कोई दूसरा प्लॉट ले लो

    - प्राधिकरण ने नंदू सोलंकी निवासी जनता कॉलोनी को स्कीम 171 में 23 मार्च 1988 को 231.90 वर्गमीटर (2496 वर्गफीट) प्लॉट अलॉट किया था। पहले 10 हजार 147 रुपए जमा कराए और 1156 रुपए प्रति माह किस्त जमा करवाकर 1990 तक 27 हजार रुपए और जमा कराए।

    - अक्टूबर 1990 में प्राधिकरण ने पत्र जारी कर कहा कि इतने बड़े प्लॉट के आप हकदार नहीं हैं। आप 55 वर्गमीटर, 139 या 153 वर्गमीटर का प्लॉट ले लें। याचिकाकर्ता ने इनकार किया तो मार्च 1993 में प्राधिकरण ने फिर पत्र जारी किया कि उक्त तीनों में से एक प्लॉट ले लीजिए अन्यथा लॉटरी से प्लॉट अलॉट कर देंगे।

    - याचिकाकर्ता जून 1993 में हाई कोर्ट गया, जहां कोर्ट ने उसके पक्ष में स्टे दे दिया। दिसंबर 1996 में याचिका निराकृत कर प्राधिकरण से याचिकाकर्ता को सुनवाई का अवसर देकर निराकरण का कहा।

    - सितंबर 1999 में प्राधिकरण ने नोटिस जारी कर फिर वही बात कही। नवंबर 2002 में प्राधिकरण ने पैसे लौटाने के लिए बैंक ड्राफ्ट भेजा, जिसे याचिकाकर्ता ने नहीं लिया। वर्ष 2003 में प्राधिकरण ने नोटिस भेजा कि 2 लाख 14 हजार 482 रुपए और जमा करा दीजिए।

    - याचिकाकर्ता दोबारा हाई कोर्ट गया, जहां कोर्ट ने प्राधिकरण की कार्रवाई पर स्टे कर दिया। आईडीए ने 2008 में प्लॉट का अलॉटमेंट निरस्त कर वर्ष 2009 में शक्ति टिंबर को नए रेट पर अलॉट कर दिया।

    - कोर्ट ने फिर स्टे कर दिया। हाल ही में हुई अंतिम सुनवाई के बाद कोर्ट ने प्राधिकरण की सारी कार्रवाई निरस्त कर याचिकाकर्ता का कब्जा उचित माना।

    हाथों में समस्या से नहीं मिले फिंगर प्रिंट, व्यापमं ने पटवारी परीक्षा से रोका, हाई कोर्ट से मिली राहत

    - पटवारी परीक्षा में एक दावेदार को इसलिए नहीं बैठने दिया जा रहा था कि उसके फिंगर प्रिंट का मिलान नहीं हो पा रहा था। हाई कोर्ट ने मप्र व्यावसायिक परीक्षा मंडल को आदेश दिया कि दावेदार को परीक्षा में बैठने दिया जाए। याचिका का अंतिम निर्णय परीक्षा परिणाम पर प्रभावी रहेगा।

    - छात्र इंद्रजीत सिंह राजावत को परीक्षा में बैठने से रोक दिया था। उसके हाथों में ऐसी समस्या है कि फिंगर प्रिंट का मिलान नहीं हो पाता है, जबकि उसकी आंखों का स्कैन भी किया गया था। इंद्रजीत ने अधिवक्ता आशीष एस. शर्मा के जरिए हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी।

    - जस्टिस विवेक रुसिया की बेंच के समक्ष गुरुवार को यह मामला सुनवाई के लिए लगा था। हाई कोर्ट ने आदेश दिए कि छात्र को परीक्षा में बैठने दिया जाए। छात्र ने हाई कोर्ट में मेडिकल प्रमाण पत्र भी पेश किया।

    - इसमें सत्यापित किया गया था कि छात्र को शारीरिक परेशानी है। पटवारी परीक्षा में इस तरह की समस्या कई छात्रों को आ रही है। फिंगर प्रिंट के अलावा आंखों का स्कैन भी किया जा सकता है, लेकिन परीक्षा बोर्ड नहीं मान रहा है।

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