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DB Exclusive: 5 साल में भर्ती परीक्षाओं के नाम पर लाखों बेरोजगारों से 430 करोड़ फीस ली, नौकरी कितनों को दी रिकॉर्ड नहीं

मध्यप्रदेश में रिटायरमेंट की उम्र 60 से 62 साल करने के आदेश से बेरोजगारों की रही-सही उम्मीदें भी टूट रही हैं।

Danik Bhaskar | Apr 01, 2018, 01:42 AM IST
सरकार ने भर्ती परीक्षाओं को अप सरकार ने भर्ती परीक्षाओं को अप

भोपाल. मध्यप्रदेश में बेरोजगारी की स्थिति साल दर साल भयावह होती जा रही है। इधर रिटायरमेंट की उम्र 60 से 62 साल करने के आदेश से बेरोजगारों की रही-सही उम्मीदें भी टूट रही हैं। प्रदेश में ढाई करोड़ में 50 लाख शिक्षित बेरोजगार युवा 33 से 35 साल की उम्र के हैं। यानी दो साल में नौकरी पाने के लिए जरूरी क्राइटेरिया से बाहर हो जाएंगे। इधर सरकार ने भर्ती परीक्षाओं को अपने मुनाफे का धंधा बना लिया है। बीते पांच साल के व्यापमं के रिकाॅर्ड को खंगाले तो पता चला कि 86 लाख बेरोजगारों ने अलग-अलग भर्ती परीक्षाओं के नाम पर 350 करोड़ की परीक्षा फीस दी है। हालांकि, नौकरी कितनों को मिली, इसका सीधा जवाब सरकार के पास भी नहीं है। आर्थिक सर्वेक्षण में भी सरकार ने इसका कहीं काेई ब्यौरा नहीं दिया है।

2017 : तीन एग्जाम, कहीं परीक्षा रद्द तो कहीं रिजल्ट पर रोक

1) पटवारी परीक्षा

अक्टूबर 2017: 9 हजार पद
फीस- 38 करोड़ रुपए
हुआ क्या- 9 दिसंबर से परीक्षा शुरू हुई। 10.20 लाख परीक्षार्थी थे। दावा था कि जनवरी में रिजल्ट मिल जाएंगे। लेकिन 26 मार्च को रिजल्ट घोषित हुए हैं। नियुक्ति कब मिलेगी, पता नहीं।

2) एमपीपीएससी

12 दिसंबर 2017: 209 पद
फीस- 12 करोड़ रुपए
हुआ क्या- 18 फरवरी 2018 को परीक्षा हुई, लेकिन प्रश्न पत्र के सवालों पर सवाल उठ गए। हाईकोर्ट ने पीएससी प्री के रिजल्ट पर रोक लगा दी। 2.80 लाख छात्रों का भविष्य अधर में है।

3) अपेक्स बैंक

1 मार्च 2017: 1600 पद

फीस- 4.20 करोड़ रुपए
हुआ क्या- 23 फरवरी को हाईकोर्ट के आदेश से परीक्षा रद्द, अब इस परीक्षा में शामिल छात्र सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने की तैयारी कर रहे हैं।

4) पीएससी में पिछले पांच साल में 12 लाख छात्रों ने पांच हजार पदों केे लिए 80 करोड़ रुपए फीस दी है। वहीं, व्यापमं में 71122 पदों के लिए ली गई परिक्षा में शामिल होने 86 लाख परीक्षार्थियों ने फीस के तौर पर 350 करोड़ रुपए

चुकाए।

आखिर कितनी नौकरियां मिलीं?
सरकार ने आर्थिक सर्वेक्षण में नौकरियों की जानकारी नहीं दी है। सरकार ने बताया है कि 2015 में 732 और 2016 में 422 लोगों को रोजगार दिलाया गया। 2017 के रोजगार के आंकड़े नहीं बताए।


प्रशासनिक क्षेत्र में नौकरी की स्थिति
31 मार्च 2017 की स्थिति में राज्य में कुल 739771 कर्मचारी कार्यरत रहे। कुल शासकीय कर्मचारियों में 2016 के मुकाबले 2017 में 0.59 फीसदी की कमी हुई।

कारखानों में नौकरी

- राज्य में कुल 15556 कारखाने पंजीकृत हैं। इसमें नियोजन क्षमता 862012 है। हालांकि, इसमें कितने रोजगार हैं, सरकार के पास इसका कोई रिकार्ड नहीं है।

- एफएमपीसीसीआई के अध्यक्ष आरएस गोस्वामी कहते हैं कि प्रदेश में माइक्रो और स्माल इंडस्ट्री पर सरकार का फोकस ही नहीं है। सरकार चाहे तो सबसे ज्यादा रोजगार इसी सेक्टर में बढ़ सकते हैं। सरकारी नीतियों के कारण बड़ी इंडस्ट्री भी यहां आने में दिलचस्पी नहीं ले रही है। गोस्वामी कहते हैं कि मध्यप्रदेश में छोटी-बड़ी इंडस्ट्रियों में कुल 11 लाख से ज्यादा रोजगार नहीं हैं।

किन विभागों में कितने कर्मचारी?

- शासकीय विभागों में नियमित कर्मचारी- 447262
- सार्वजनिक उपक्रम एवं अर्द्धशासकीय संस्थाओं में- 59634
- नगरीय स्थानीय निकायों में- 85961
- ग्रामीण स्थानीय निकायों में- 138855
- विकास प्राधिकरण एवं विशेष क्षेत्र विकास प्राधिकरण- 1687
- युनिवर्सिटी में- 6372
- अलग-अलग विभागों में खाली पड़े पदों की औसत संख्या 50 फीसदी है।

बेरोजगारी से तंग आकर हर साल 579 युवा कर रहे खुदकुशी

एनसीआरबी की रिपोर्ट को आधार मानें तो वर्ष 2001 में बेरोजगारी के कारण आत्महत्या करने वाले युवाओं की संख्या 84 थी, यह 2016 में 579 हो गई है। बेरोजगारी के कारण खुदकुशी करने वाले युवाओं की संख्या लगातार बढ़ रही है। 15 साल में प्रदेश में कुल 1874 युवाओं ने बेरोजगारी से तंग आकर खुदकुशी की है।

एक्सपर्ट व्यू: संविदा कर्मचारियों के भरोसे सिस्टम

मध्यप्रदेश के मुख्य सचिव केएस शर्मा के मुताबकि, सरकारी विभागों में आधे से ज्यादा पद खाली पड़े हैं। संविदा कर्मचारियों के भरोसे सिस्टम चल रहा है। सरकार की नीतियां और विजन के कारण ऐसा हुआ है। व्यापमं का काम प्रवेश परीक्षाएं कराना था। धांधली और अक्षमता उजागर होने के बाद भी व्यापमं से भर्ती परीक्षाएं करवाना संदेह पैदा करता है। कैडर मैनेजमेंट गड़बड़ा गया है। पहले यह होता था कि कितने पद रिक्त होने वाले हैं, उससे पहले नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू कर दी जाती थी। अब तो कुछ भी कहना मुश्किल है।