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पोषाहार सप्लाई मामला: एक बेंच के आदेश में संशोधन के लिए दूसरी बेंच में पहुंची सरकार

हाईकोर्ट ने सरकार को कंपनियों से पोषाहार लेने के लिए 6 हफ्ते की और मोहलत दी।

Dainik Bhaskar

Mar 14, 2018, 03:12 AM IST
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भोपाल/इंदौर. प्रदेश में पोषण आहार सप्लाई को लेकर दायर एक एनजीओ की याचिका पर मंगलवार को हाईकोर्ट में सुनवाई हुई। इस दौरान इंदौर बेंच के जस्टिस पीके जायसवाल और जस्टिस वीरेंद्र सिंह की बेंच ने महिला एवं बाल विकास विभाग के 8 मार्च के उस फैसले पर रोक लगा दी है, जिसमें उसने तय किया था कि वह एमपी एग्रो से पोषण आहार की सप्लाई नहीं लेगा। डिवीजन बेंच के मंगलवार के अंतरिम आदेश के तहत सरकार अब एमपी एग्रो से दोबारा सप्लाई शुरू कर सकती है, लेकिन सिर्फ छह हफ्तों तक। इस अवधि में सरकार को नए सिरे से टेंडर भी बुलाने होंगे।

विधानसभा में कंपनियों को फायदा पहुंचाने पर हंगामा

उधर, मंगलवार को पोषण आहार मामले में सरकार के रवैये को लेकर विधानसभा में जमकर हंगामा हुआ। इसी बीच कैबिनेट ने रेडी टू ईट व्यवस्था को जल्द ही महिला समूहों को सौंपे जाने के लिए गठित कमेटी की सिफारिशों को मंजूरी दे दी। जनसंपर्क मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने बताया कि इस व्यवस्था के लागू होने तक पोषण आहार सप्लाई के लिए 10 दिन के भीतर शॉर्ट टर्म टेंडर जारी किए जाएंगे। कैबिनेट बैठक में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि पोषण आहार की नई व्यवस्था के तहत महिलाओं को यह काम सौंपा जा रहा है तो इसका नेगेटिव कैसे प्रचार हो रहा है। उन्होंने मंत्रियों से कहा कि इस तरह का माहौल बाहर कैसे बनाया जा रहा है, इस पर नजर रखी जाएगी।

इंदौर बेंच में नहीं चलेगी अफसरों पर अवमानना

महाभ्युदय स्वैच्छिक संगठन की याचिका पर जस्टिस एससी शर्मा, वीरेंद्र की डिवीजन बेंच ने नई व्यवस्था करने के आदेश दिए थे। सरकार ने इस आदेश में संशोधन की मांग की है। मूल आदेश का पालन नहीं होने पर इस बेंच ने मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव महिला एवं बाल विकास विभाग व अन्य को अवमानना का व्यक्तिगत दोषी माना। उन्हें 2 अप्रैल को इंदौर बेंच में हाजिर होना था, लेकिन ताजा निर्देशों में अवमानना के मामलों को जबलपुर शिफ्ट कर दिया। दोनों मूल याचिकाओं की सुनवाई चीफ जस्टिस करेंगे।

कंपनियों की नहीं हो सकेगी एंट्री
पोषण आहार व्यवस्था में अब तक काबिज कंपनियों की एंट्री रोकने की भी व्यवस्था की गई है। इसमें रेडी टू ईट तैयार करने का काम बीपीएल महिलाओं के स्वसहायता समूहों को दिया जाएगा। गांव में महिलाओं के स्वसहायता समूह बनाए जाने का काम चालू है। 25 से 30 गांवों के बीच एक क्लस्टर समूह बनेगा। पहले साल ये मनोनीत होंगे, बाद में इनके चुनाव होंगे। जिला स्तर पर स्वसहायता समूहों का फेडरेशन बनेगा। इसी फेडरेशन से एक-एक सदस्य रीजनल स्तर पर बने फेडरेशन मंडल में शामिल होगा। कुल 12 सदस्यों का यही मंडल फैक्ट्री का संचालन करेगा। यह फेडरेशन कोऑपरेटिव एक्ट से संचालित होगा।

2 बेंच, 4 निर्देश और सरकार के दांव-पेंच

13 सितंबर 2017: जस्टिस एससी शर्मा-जस्टिस आलोक वर्मा
क्या कहा था: सुप्रीम कोर्ट के आदेशों, फूड सिक्योरिटी एक्ट और केंद्र सरकार के दिशा-निर्देशों के अनुसार नई पॉलिसी लाएं और नए टैंडर जारी करें।

सरकार ने क्या किया: अक्टूबर में पुनर्विचार याचिका लगाकर 30 दिन की मोहलत मांगी। कोर्ट ने कहा कि 13 सितंबर के आदेश का ही पालन कीजिए। मोहलत नहीं दी। सरकार ने कैबिनेट में नए सिस्टम पर निर्णय लिए।

27 फरवरी 2018 : जस्टिस पीके जायसवाल-जस्टिस वीरेंद्रसिंह
सरकार नए सिस्टम पर जो फैसले ले रही थी, उस पर रोक लगा दी।

9 मार्च 2018 : जस्टिस एससी शर्मा-जस्टिस वीरेंद्रसिंह
क्या कहा था: पुरानी व्यवस्था में एक भी दिन सप्लाई नहीं होनी चाहिए। ऐसा लगता है कि सरकार कुछ लोगों को फायदा पहुंचा रही है।

सरकार ने क्या किया: एक दिन पहले ही एमपी स्टेट एग्रो से पोषण आहार की सप्लाई बंद करने का आदेश जारी किया।

13 मार्च 2018 : जस्टिस पीके जायसवाल-जस्टिस वीरेंद्र सिंह
क्या कहा था: सरकार के 8 मार्च के निर्णय पर रोक, जिसमें कहा गया था कि पुरानी व्यवस्था तत्काल प्रभाव से रोक दी गई है।

सरकार ने क्या किया: कैबिनेट में पोषण आहार की नई व्यवस्था को स्वीकृति दी। तब तक शॉर्ट टर्म टेंडर से सप्लाई।

मामले पर क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स?

- हाईकोर्ट के सेवानिवृत जज जस्टिस एनके जैन के मुताबिक, एक ही विषय पर एक ही हाईकोर्ट की दो अलग-अलग बेंचों में सुनवाई सामान्यत: नहीं हाेनी चाहिए। सरकार या कोई भी पक्षकार पहले ही यह आवेदन कर सकता था कि इनकी सुनवाई एक ही जगह हो। चीफ जस्टिस चाहते तो एक बड़ी बेंच में सारे मामले भेज देते।

- इंदौर हाईकोर्ट के वकील आनंद अग्रवाल ने बताया कि दो बेंच में फैसलों से स्थिति विरोधाभासी हो गई है। ऐसी स्थिति में अब चीफ जस्टिस के द्वारा निर्णय लिया जाएगा कि पोषण आहार वितरण पर क्या किया जाए। कई बार जजेस में मतभिन्नता (डिफरव्यू) हो जाती है। ऐसे में तीसरे जज के पास मामला भेजा जाता है। बीआरटीएस के मामले में भी ऐसा ही हुआ था। बसलेन में कार चले या नहीं इस पर इंदौर बेंच की डिवीजन बेंच में ही अलग-अलग विचार थे, यह केस भी जबलपुर भेजा गया था।

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